भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 898

, परिशिष्ट ४ ९१ पिता की बात न मानकर, हरिकेश काशी आकर, तपस्या करने लगा । तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने हरिकेश से वर मांगने के लिए कहा । हरिकेश ने शिव भक्ति का वर मांगा । शिव ने प्रसन्न होकर यक्ष को वरदान दिया—'यक्ष, तुम पूज्यगणों के स्वामी तथा धनपति होगे । प्राणियों से अजेय होगे । अन्नदाता होगे । क्षेत्रपाल होगे । उद्भ्रम तथा संभ्रम नामक दो गण तुम्हारे सेवक होंगे । तुम दण्डपाणि होगे ।' काशी तथा मथुरा दोनों स्थानों पर यक्ष लोग अपने पुरातन धार्मिक परम्परा के स्थान पर शिव उपासना करने लगे । यक्षों ने लौकिक किंवा जातीय धर्म तथा रीतियों के स्थान पर शैव मत स्वीकार कर लिया । उन्हें कालान्तर में शिव के गणों में सम्मिलित कर लिया गया । वे शिव के भक्त तथा अनुयायी हो गये । भागवत ( २ : ६ : १३ ) में विराट् पुरुष के वर्णन के प्रसंग में देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, यक्ष, मृग, गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, भूत, प्रेत, विद्याधर सर्पादि को एक वर्ग में रखकर उन्हें विराट् पुरुष माना है। भागवत ( ६ : ८ २४ ) में नारायण कवच के वर्णन में—कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेतादि को कौमोदकी गदा से नष्ट करने की प्रार्थना की गयी है । देवराज इन्द्र के विरुद्ध आते हुए यक्षों का वर्णन मिलता है । दैत्य, दानव, यक्ष, राक्षस सुवर्ण के साज सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की सेना की बाढ़ रोकने के लिए आ गये थे । ( भा० : १० : २० । ) नृसिंह अवतार के समय भगवान् के समीप जय-जयकार करने आने वालों में—सिद्ध विद्याधर महा- नाग, मनु, प्रजापति, गन्धर्व, अप्सराऐं, चारण, यक्ष, किंपुरुष, वैताल, सिद्ध, किन्नर और सुनन्द तथा कुमुद आदि विष्णु के सभी पार्षद यहाँ आये । ( भागवत ७ : ८ : ३८ ) यहाँ पर विष्णु के पार्षद रूप में यक्षों का वर्णन किया गया है । रेवत ने कुशस्थली नामक नगर बसाया था । वहाँ से वे आनर्तादि देशों पर राज्य करते थे । उनके पुत्र ककुद्मी थे । शारपाणि के पुत्र अनर्त थे । अनर्त के पुत्र रेवत थे । रेवत के एक शत पुत्र थे । उनमें ककुद्मी ज्येष्ठ था । ककुद्मी की कन्या रेवती थी । रेवती का विवाह दोपावतार स्वरूप बलदेव के साथ किया गया था । वे ब्रह्मा से भेंट करने गये थे । लौटकर अपने नगर में आये । देखा कि उनके वंशजों ने यक्षों के भय से नगर त्याग कर दिया था । ( भागवत पुराण ९ : ३ : ३५ । ) भागवत ( १० : ६ : २७ ) में यक्षों को भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस और विनायक के वर्ग में रखा गया है । भागवत पुराण ( १० : ३२ : १६ ) में यक्षों को पुनः देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, पन्नग, दैत्य, विद्याधर तथा मनुष्य के साथ वर्णन किया गया है । भागवत पुराण ( १० : ९० : ९ ) में भगवान् अपनी पत्नियों के साथ विहार करने की उपमा यक्षराज कुबेर का यक्षिणियों के साथ विहार करने से दी गयी है । उद्धव के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कृष्ण ने अपने विराट् स्वरूप का वर्णन किया है । 'मैं दैत्यों में दैत्यराज प्रह्लाद, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ओषधियों में सोमरस एवं यक्ष राक्षस में कुबेर हूँ ।' ( भागवत ११ : १६ : १६ ) यक्षों को धनकृपण कहा गया है ? 'जो मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति, भाई, कुटुम्बी और धन के भागीदारों को उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उपभोग करता है वह यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला कृपण है ।' ( भा० ११ : २३ : २४ ) ।