भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 897

९० परिशिष्ट ठ प्रायः देवताओं की मूर्तियों पर यक्षगण नभोपय से उन्हें माला पहनाते, उनपर पुष्प वर्षा करते दिखाये जाते हैं। भगवान् बुद्ध की मूत्ति में भी शिरोभाग दोनों पाश्र्वों में उड़ते यक्ष माला सहित उत्कीर्ण किये मिलते हैं। ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों के अनुसार ये राक्षस तथा खसा की सन्तान थे। ये अपनी माता को खा जाना चाहते थे। अतएव उनका नाम यक्ष पड़ा। उनके आकार का वर्णन किया है। उन्हें चार हाथ तथा चार पैर होते हैं। रात्रि में आहार निमित्त विचरण करते हैं। यमु दनि का रूप धारण कर अप्सरा क्रथस्थला के साथ नन्दन में निवास किया था। उससे रजत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था। यक्ष अपने पुत्र के साथ हिमालय में निवास निमित्त आया। ब्रह्माण्ड पुराण (२·१८ : ३३२ · ३ : ७ : ६०, १००-१७, २२:१४, ४१ : ३०, ७१ : १:१) तथा भागवत आदि पुराणों में यक्षों की उत्पत्ति की एक और कथा है। कश्यप पिता तथा खशा माता का पुत्र यक्ष था। (भागवत २:६:१३, ६:८:२४, १०:६:२७, ६२:१९, ८५:४१; ब्रह्माण्ड पुराण २:३२ : १-२, ३५· १९१, ३६ : ११८।) पुराणों में उन्हें रुद्र के अनुयायी रूप से चित्रित किया गया है। उनके स्वामी का नाम कुबेर है। (भागवत पुराण ११ १६. १६)। मत्स्य पुराण (८.५) के अनुसार ब्रह्मा ने यक्षों का अधिनायकत्व शूलपाणि को दिया था। यक्षों ने कच्चे पात्र में वसुधा का दोहन किया था। मत्स्य पुराण (१० : २२,) के अनुसार वृत्र की सहायता इन्द्र के विरोध में यक्षों ने की थी। दक्ष के यज्ञ में सती के साथ गये थे। यक्ष वृत्र के पक्ष से देवताओं से युद्ध कर रहे थे। (भागवत ६:१०:२० ४:४:४) उनके खेलों का वर्णन भागवत पुराण (१०:९०:९) में किया गया है। हरि की भक्ति के कारण यक्षों का मंगल होता है। (भागवत ७:७:५०)। यक्ष देवों के साथ भगवान् कृष्ण को देखने आये थे। (भागवत ७.८:३८,) रावण ने यक्षों को परास्त किया था। (ब्रह्माण्ड पुराण ३:७:२१५,) यक्ष पित्रों की पूजा करते थे। (भागवत पुराण ३:१०:२८,) मत्स्य पुराण (अध्याय २३) में वर्णन मिलता है। देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के कारण शंकर तथा चन्द्रमा में युद्ध हुआ। उसमें यक्षों के स्वामी कुबेर ने वैशाल, यक्ष, नाग तथा किन्नरों की सेना के साथ शंकर की ओर से युद्ध में भाग लिया था। मत्स्य पुराण (अ० १८०) में यक्षों के विषय में एक रोचक कथा दी गयी है। उससे यक्षों के व्यवहार, आचरण तथा धर्म पर प्रकाश पड़ता है। इसका सम्बन्ध हरिकेश यक्षसे है। पूर्णभद्र यक्षो का राजा था। उसका पुत्र हरिकेश था। हरिकेश शिव का उपासक था। पूर्णभद्र ने अपनी पुरातन परम्परा पर पुत्र का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा—रुद्र की उपासना उचित नहीं है। हमारे धाम मानवों से भिन्न हैं। यक्ष स्वभाव से क्रूर होते हैं। कच्चा मांस खाते हैं। कुत्सित जीवों का भक्षण करते हैं। हिंसक होते हैं। न हि यक्षकुलीनानां मूढ वृत्तं भवत्युत । गुह्यका यत यूयं वै स्वभावात्क्रूरचेतसः ॥ क्रव्यादाश्चैव किंमक्षा हिंसाशीलाइच पुत्रक । मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मना ॥