राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतूरान तथा ईरान की मध्यवर्ती सीमा लिखता है। पारसी लोग आमू दरया के पारवर्ती देश के निवासी थे । उसे मर्ज-ए-तूरान कहते थे । अरब भौगोलिक तुर्कों का मूलस्थान सीर दरया के पूर्वोय क्षेत्र को मानते हैं । वोल्गा नदी को रूस में एक समय नहर तूरान कहते थे। वोल्गा तक का क्षेत्र रूसियों की दृष्टि में तुर्कों का निवास-स्थान था। तूरान, राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी अर्क-ढघ थी। इसे यूराल पर्वत कहा जाता है। तूरान देश को कैस्पियन सागर, ईरान अधित्यका, सीर दरया का उद्गम स्थान तथा उसकी पर्वतमाला, इरतिश एवं अकमोलित्स की अधित्यका के मध्यवर्ती क्षेत्र को शकदेश मानते हैं। इस प्रकार निष्कर्ष निकलता है कि ईरानी तूर अर्थात् जिसे शक कहते थे, वे कैस्पियन सागर के चारों तरफ सीर तथा आमू दरया से लेकर कैस्पियन सागर और वल्गा तथा डान नदी तक फैले थे । प्रश्न उपस्थित होता है। उक्त नदियों का वर्तमान नाम क्या है। उन्हें कैसे पहचाना जा सकता है । यदि उक्त नदियां शकद्वीप में मिल जांय तो शकद्वीप के मानचित्र का वास्तविक पता महाभारत के अनुसार प्राप्त हो सकता है। साथ ही महाभारत वर्णित शक देश की सत्यता सिद्ध हो जाती है। शकद्वीप स्थान क्षेत्र निर्विवाद हो जाता है । सीता नदी चीनी सीतो नदी है। उसे इस समय सीर दरया कहते हैं। इश्क, कुलसर, थटनशाह के दक्षिणी अधित्यका से निकलती है। यह पश्चिम बहती है। मणिनला नदी वर्तमान जरफशा नदी है । जरफशाम का अर्थ होता है जर अर्थात् सोना फैलाने वाली । वह नदी जबल अलबुत्तम पर्वतमाला से निकलती है। पर्वतमाला की ढाल पर सोना, चांदी, लोहा, ताम्बा, आदि की खानें हैं। यह नदी एक जप अथवा जनसर से निकलती है। पजोकंथ, समरकन्द, बोखारा बहती ह्वारिजम के समीप पश्चिमोय मरुभूमि के उथली दलदलीय सर में गिरती है । यह महाभारत वर्णित नदी मणिनल है । क्योंकि इसके जल में स्वर्ण, रजतादि के साथ मणि मिलते हैं। इसीलिए इसका नाम मणिनल रखना पडा है। इसके दक्षिण में वक्षु अथवा आमू दरया है। इस नदी की अनेक शाखा नदियां हैं। वकक्षाव इसकी एक शाखा नदी है। यह पामीर पर्वत से निकलती है। यह हजारो मील की यात्रा करती पूर्वकाल में कैस्पियन सागर तथा इस समय अरल सागर में गिरती है। चीनी भाषा में इसे पोत्सू तथा अलइदडीसी इसे बकक्षाव कहता है। वक्षु नदी के दक्षिण सघानियन जिला है। यह वर्तमान शर-एर- अशया है। सघानियन नदी के ऊर्ध्व भाग पर यह आबाद था। यह आमू की एक शाखा नदी है। इसे नहर जमील कहते हैं। कैस्पियन सागर में पश्चिम तथा उत्तर से गिरने वाली नदियों में वोल्गा है। प्टोलमी ने 'र' नदी कहा है। ईरानियन इसे 'रन्हा' कहते हैं। यूनानी अरस्तू इसे 'अर्स' या 'अरक्ष' कहते हैं। हिरो- डोट्स ने इसके लिए 'अर्जैस' शब्द का प्रयोग किया है। मूल शक शब्दावली में 'अरस' या 'अर्स' का अर्थ महान् होता है। अरब भौगोलिक विद्वानों ने वोल्गा को 'इत्तिल' कहा है। बलगार जाति इसके तट पर आबाद हो गयी। अतएव इसे वोल्गा कहा जाने लगा। पश्चिमी विद्वानों का मत है। वोल्गा का अर्थ आर्य स्लेवोनिक भाषा में महान् अथवा बड़ा होता है। एक ओर मत है। वोल्गा शब्द संस्कृत दन्द द्रकू का अप- भ्रंश है। रूसी लोग इसे वोल्गा न कहकर वोल्फा कहते हैं। 'व्रक' किंवा 'वृक' का अर्थ भेड़िया होता है। इसकी मुख्य शाखा नदी 'कम' है। अनुमान लगाया गया है। कम तथा 'र' मिलाकर इसका नाम कुमारो रखा गया था । कुमारी नदी का सप्त नदियों में उल्लेख है। शक भाषा के शब्द 'अर' का अर्थ कुमारी होता है। 'अर' का अपभ्रंश किंवा समानार्थक शब्द 'अर्स' अथवा 'अरक्ष' है। यह वोल्गा का प्राचीन नाम कहा जाता है ।