भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[Header] परिशिष्ट ज ७१ में श्रेष्ठ थे । मग ब्राह्मण दक्षिण भारत तक पहुँच गये थे । कूर्म पुराण (४८:३६) तथा महाभारत (६:२) के अनुसार शकद्वीप के ब्राह्मण मग कहे जाते थे । सदुक्ति कर्णामृत (सन् १२०१ ई०) छह मग ब्राह्मण कवियों का उल्लेख किया गया है । साम्बः सूर्यप्रतिष्ठां च कारयामास तत्त्ववित् । उदयाचले च संधित्य यमुनायाश्च दक्षिणे ॥ मध्ये कालप्रियं देवं मध्याह्ने स्थाप्य चोत्तमम् । मूलस्थानं ततः पश्चाद् अस्तमानाचले रविम् ॥ स्थाप्य त्रिमूर्ति साम्बस्तु प्रातर्मध्यापराह्निकम् ॥ -साम्ब पुराण २०:३०-३१ कथा है कि साम्ब ने चन्द्रभागा अर्थात् चेनाव के तट पर एक सूर्य मन्दिर स्थापित किया था । नदी के तट पर उसका आश्रम था । मन्दिर बनकर तैयार हो गया । साम्ब ने भगवान् नारद से मन्दिर के पुरो- हित किंवा पुजारी के विषय में सलाह ली । किसे पूजा का भार सौंपा जाय । नारद ने कहा । जम्बूद्वीप के ब्राह्मणों में श्रेष्ठता पूर्व जैसी नही रह गयी है । शकद्वीप से पूजा निमित्त ब्राह्मण बुलाए जाँए । गर्हितं मानवं शास्त्रं प्रशंसन्ति ते द्विजाः । साम्ब पुराण २६:२० न योगं परिचर्यायां जम्बूद्वीपे यमानथ । मम पूजाकर गत्वा शाकद्वीपादिहानय ॥ -भविष्य पुराण १.१३९ नीलमत पुराण में शक जाति का उल्लेख मिलता है । कश्मीर निवासी शक जाति से परिचित थे । यथा : दार्याभिसारगान्धारजुहुण्डुरशकान् खसान् । तङ्गणान् माण्डवान् मद्रानन्तर्गिरिबहिर्गिरीन् ॥ ८० = २२२-२२१ × × × दार्वीभिसारगान्धारजुहुण्डुरशकाः खसाः । तङ्गणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिरिः ॥ १३९ - १८२ × × × इतिहासज्ञ तर्न का सुझाव है कि कुछ समय तक कश्मीर के दक्षिणी भाग पर देमित्रियस राज्य करता था । (तर्न : ग्रीक्स इन बेक्ट्रिया एण्ड इण्डिया: १५५) मिनान्दर अर्थात् मिलिन्द के विषय में भी कतिपय विद्वानों ने उल्लेख किया है कि कश्मीर मिलिन्द के राज्य में था । मिलिन्द पञ्ह का संवाद राजा मिलिन्द तथा नागार्जुन में केवल कश्मीर से बोस योजन दूर पर हुआ था । कश्मीर के इतिहास के ग्रीक तथा मिलिन्द के कश्मीर भूमि के राज्य करने का कहीं उल्लेख नहीं मिलता । प्रसिद्ध राजा तूरमाण शक था । असुर देश अर्थात् असीरिया के सन् ८४३ वर्ष ई० पू० के एक आलेख में 'माद' जाति का उल्लेख मिलता है । उनका पार्स जाति के साथ उल्लेख किया गया है । मग ईरानी पुरोहित वाचक शब्द मगुश का अपभ्रंश है । आगे चलकर यह शब्द अपभ्रंश होकर 'मोवज' रूप से प्रयुक्त होने लगा । मगपति अर्थात् प्रधान पुरोहित