राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० राजतरंगिणी थे। कन्या का विवाह सातवाहनवंशीय राजा वशिष्ट पुत्र शातकर्णी (पुळयोमी-१ सन् १०७-१३१ ई०) के साथ हुआ था। शिलालेखों के आधार पर साधिकार कहा जा सकता है कि दूसरी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य का उदयकाल आरंभ होता है। इस समय उज्जैन पर शक वंश का राज्य था। उनका विस्तृत विवरण तथा क्रमानुसार राजाओं का निश्चय करना कठिन है। सन् ३४० ई० में रुद्रसेन तृतीय के समय शकों का उत्थान होने लगा था। परन्तु गुप्त साम्राज्य के उत्थान के कारण उनकी उन्नति आकस्मिक प्रमाणित हुई। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने मालवा तथा सौराष्ट्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उदयगिरि के शिलालेख तथा हर्ष चरित्र से यह घटना सत्य प्रमाणित होती है। शक संवत् का व्यापक प्रचार था। मुख्य कारण था। दक्षिण में शक राज्य स्थापित हो गया था। लगभग २०० वर्षों तक वहाँ शक सत्ता स्थापित रही। इस लम्बे काल में शक राजाओं ने शक संवत् का प्रयोग आरम्भ किया था। प्राचीन तथा मध्ययुग में काशी तथा उज्जैन ज्योतिष के मुख्य केन्द्र थे। पंचांग तथा पत्र यहीं तैयार होता था। उनका प्रचार समस्त भारत में होता था। उत्तर भारत में शक संवत् शक राज्य सत्ता के अभाव के कारण प्रचलित न हो सका। किन्तु दक्षिण तथा मध्यभारत में शकराज्य तथा उसका प्रभाव के कारण शक संवत् पूर्णतया प्रचलित था। प्राचीन विक्रमीय संवत् का प्रचलन कम हो गया था। पुराणों के काल तथा उनकी मान्यता के विवाद में न केवल यह कहना अलम् होगा कि पुराणों में शक जाति, उनके आचरण, व्यवहार तथा व्यवस्था का विशद वर्णन मिलता है। भविष्य पुराण में शकों को चार वर्गों में विभाजित किया गया है। तत्र पुण्या जनपदाश्चतुर्वर्णसमन्विताः । मगाश्च मगगाश्चैव गानगा मन्दगास्तथा ॥ मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा मगगाः क्षत्रियाः स्मृताः । वैश्यास्तु गानगा ज्ञेयाः शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः ॥ भविष्य पुराण १ : १३९ ब्रह्म पुराण में शकद्वीप निवासियो को चार वर्णों में विभाजित किया गया है : मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा गमधाः क्षत्रियास्तु ते । वैश्यास्तु मानसास्तेषां शूद्रा ज्ञेयास्तु मन्दगाः ॥ शाकद्वीपे स्थिते विष्णु सर्परूपधरो हरिः । यथोनैरिज्यते सम्यक् कर्मोभिर्निपधात्मभिः ॥ ब्रह्म पुराण २० : ७१-७३ शकद्वीप के ब्राह्मण - मग थे। क्षत्रिय - मगगा थे। वैश्य - मगा तथा शूद्र - मन्दगा थे। मग शब्द ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त किया गया है। शकद्वीप के ब्राह्मण किसी समय बहुत उत्तम कहे गये थे। उत्तर प्रदेश तथा अन्य स्थानों पर शाकद्वीपी ब्राह्मणों की काफी आबादी है। उन्हें शाकलदीपी ब्राह्मण कहते हैं। भारत में शाकद्वीपी ब्राह्मण भगवान श्री कृष्ण के यशस्वी पुत्र श्री शाम्ब द्वारा सूर्य पूजा निमित्त बुलाए गये थे। इसका उल्लेख शाम्ब पुराण में मिलता है। एक मत है कि मग शकों के पुरोहित थे। ब्राह्मणों