भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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यन' का अर्थ उत्तरीय तथा उत्तरी 'उग्रियन' जाति के लिए प्रयुक्त होता है। महाभारत में (६ : ११ : २६) में शक के लिए श्याम शब्द का प्रयोग किया गया है। महाभारत में शकों के धर्म के विषय में उल्लेख है। महाभारत (६ · १२ : २६) से प्रकट होता है कि शंकर की पूजा शकद्वीप में होती थी। महाभारत में शंकर शब्द भास्कर के लिए प्रयोग किया गया है। जिसका अर्थ सूर्य होता है। शकों में सूर्य पूजा प्रचलित थी। स्लेव जाति में सूर्य महादेव माना जाता था। इसकी पूजा में लालरोटी मक्खन के साथ अर्थात् पूड़ी खाते थे। यही कारण है कि साम्ब को शक द्वीप से सूर्य पूजक लाने को कहा गया था। सिकन्दर के अभियान काल में यूनानी लेखकों ने शकों का चरित्र चित्रण किया है। तथा स्वरूप दिया है। वह शको के आवरण एवं रूप से मिलता है। उनकी आँखें नीली होती थी। उनका बाल लाल होता था। ये खाल पहनते थे। कच्चा मांस खाते थे। मनुष्य का रक्त पीते थे। खेमे में निवास करते थे। अत्यन्त शक्तिशाली थे। संख्या में बहुत थे। भगवान की आपदा तुल्य थे। शव समाधि स्थान में नमदा पर समृद्धि देवी का रंगीन चित्र बना है। उसके करकमलों में जीवन तरु है। उनके सम्मुख श्यामरंग अश्व पर घुंघराले केशों वाला युवक अश्वारोही है। नमदा के समीप मखमल की एक कालीन मिली है। इस पर अश्वरोही, सिंह, हिरन, श्येन अर्थात् वाज पक्षी तथा अन्य विचित्र पशुओं के चित्र बने हैं। अश्वरोही का रूप प्राचीन ईरानी राजाओं के वेशभूषा तथा रूप से मिलता है। ईरानी राजाओं की मुद्राओं, चित्रों आदि पर अंकित वेशभूषा के तुल्य है। यह काल ईसा पूर्व ४०० या ५०० वर्ष माना जाता है। यहीं पर एक चीनी का बना दर्पण मिला है। शव समाधि स्थान के पार्श्व में १४ अश्व अपनी पूर्ण रण सज्जा के साथ समाधिस्थ मिले हैं। अश्वों पर जीन है। जीन की लकड़ी पर नक्काशी की गयी है। उस पर सुवर्ण पत्तर लगे हैं। घोड़ों के लबादे तथा चीनी रेशम द्वारा निर्मित ओहार अर्थात् चादर भी मिला है। यह शव लेनिनग्राड के एर्मीताज संग्रहालय में रखा है। इससे स्पष्ट है। मिस्र तुल्य शक भी मृतक के साथ उसके उपयोग तथा काम की वस्तुएं गाड़ देते थे। मसगित (महाशक), सक्रोका (शकयान), दाह, खस, कुरुन, पूर्वी, शक जातियों की मुख्य आबादियों का उल्लेख रूसी विद्वानों ने किया है। खश को गिलगित त्रिताल में कसकर, कश्मीर में खस, कासगर में खशगिर तथा कश्मीर तथा नेपाल के मध्य खश कहते हैं। हूणों द्वारा उद्वासित किये जाने पर शक दक्षिण की ओर चले। आमू अर्थात् वक्षु उपत्यका होते हुए, उन्होंने पार्थिया (पल्हव) तथा बैक्ट्रिया (बाल्हीक) पर आक्रमण किया। शक उन्हें पराजित कर आगे बढ़ते गये। भारत की सीमा बोलन दर्रा तक पहुँच गये। किपिन अर्थात् पंजाब तथा कश्मीर के भागों पर जिसे प्राचीन गान्धार कहा जा सकता है। शकों ने अधिकार कर लिया। कालान्तर में ये तक्षशिला तथा मथुरा में अपनी सत्ता स्थापित करने में समर्थ हुए। एक मत है। भारत में शक ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में आबाद हो गये थे। चाहे उनकी संख्या कम ही क्यो न रही हो। उनकी यह आबादी धुर उत्तर पश्चिम भारत अर्थात् अफगानिस्तान, सीमान्त पश्चिमोत्तर प्रदेश पश्चिमी उत्तरी पश्चिम पाकि- स्तानी पंजाब तथा दक्षिणी कश्मीर था। प्रोलिमी का उल्लेख है कि शक कश्मीर के वालतिस्तान तक फैले थे। एक मत है कि कश्मीर मार्ग से ये ईसा पूर्व ५७ वर्ष में तथा पूर्वी ईरान से प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व