भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 873

६६ राजतरंगिणी शव को रख देते हैं। पक्षियों मांसादि खा जाती है। दीप अस्थि का नयन किया जाता है। उन्हे गाड़ अथवा कूप में डाल दिया जाता है। पारसी जाति ईरान निवासी थी। पह्लव गण मुस्लिवान से ईरान तक फैले थे। शकों की यह प्रथा पारसियों में उनके सम्पर्क से आयी थी अथवा शकों ने ही पारसियों की प्रथा को स्वी- कार किया था। पडोसी जाति होने के कारण एक दूसरे पर सामाजिक, धार्मिक आदि रीतियों का पड़ना स्वाभाविक था। महाभारत में उल्लेख मिलता है। पाण्डवों ने अपना अस्त्र-शस्त्र एक वृक्ष पर रखा था। शस्त्र की रक्षा निमित्त उसी पर एक शव भी टांग दिया गया था। लोग अस्त्र-शस्त्र का पता न पा सकें। समझें कि, शव संस्कार निमित्त वृक्ष पर रखा गया था। यदि यह प्रथा किसी अंश में किसी जाति में प्रचलित न होती तो वृक्ष पर शव टाँगने में कोई हेतु दिखाई नहीं पड़ता। इससे प्रकट होता है। यह प्रथा आर्यों, पार- सियों तथा शकों में किसी न किसी रूप में प्रचलित थी। हिन्दू आर्यों के समान स्त्रियाँ पति के शव के साथ सती होती थी। यह प्रथा रूम में रोमियों के ईसाई होने के पूर्व तक प्रचलित थी। शक लोग दाहक्रिया भी करते थे। उनमें गाड़ने, जलाने तथा पक्षियों को खिलाने की तीनो प्रथाएँ प्रचलित थी। आर्यों में प्रचलित चौथी प्रथा जल समाधि भी उनमें प्रचलित थी या नहीं कहना कठिन है। शकों की नाक लम्बी होती थी। उनके बाल भूरे होते थे। शक नारियाँ रूपवती होती थी। प्राचीन भारतीय शरीर वैज्ञानिको ने शक नारियों के सुन्दर होने का कारण उनका प्याज खाना लिखा है। वाग्भट्ट के 'अष्टांग हृदय' में उल्लेख मिलता है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में शकों के निश्चीकरण सम्बन्ध में कहा गया है कि उनका रंग श्वेत चित्रित करना चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि शक लोग मध्य एशिया के लोगों के समान उज्ज्वल वर्ण होते थे। अल्ताई स्थित शकों के सम्बन्ध में रूस पुरातत्त्ववेत्ताओं ने खोज तथा खनन कार्य किया है। पाजी- रिक घाटी में एक पुरुष तथा स्त्री का मसाला से सुरक्षित शव प्राप्त हुआ है। पुरुष की छाती तथा कन्ध्यो पर गोदना गुदा है। पुरुष का रंग श्याम तथा स्त्री का गौर वर्ण था। शक यदि आर्यों की शाखा थे तो उनके वर्ण तथा रूप में परिवर्तन किस प्रकार आ गया? शव के रूप वर्णन से यह शंका उठ सकती है। कारण सरल है। बोधगम्य है। शकों के निवास-स्थान के पूर्वी तथा उत्तर-पूर्वीय दिशा में मंगोल जाति रहती थी। उनमें उनका सम्पर्क होना सम्भव था। विवाहादि परस्पर होना असम्भव नहीं था अतएव आर्य रंग रूप में सम मिश्रण के कारण अन्तर पड़ जाना स्वाभाविक है। भारत में सम मिश्रण के कारण रंगरूप में अन्तर अधिक हो गया है। आज कहना कठिन है। किसका मूल पुरुष कौन था। जाति क्या थी। महाभारत में शकद्वीप के लोगों का वर्ण श्याम कहा गया है। यह वर्णन चीनी लेखकों तथा प्राप्त शव के श्याम वर्ण से मिलता है। श्याम वर्ण का अर्थ सर्वथा काला रंग से नहीं लगाना चाहिए। (महा- भारत में उल्लेख मिलता है।) उत्तरेण तु राजेन्द्र श्यामो नाम महागिरिः । यतः श्यामत्वमापन्नाः प्रजा जनपदश्वर ॥ ६ : ११ : १९ उत्तर के लोगो का वर्ण चीनी लेखको के अनुसार श्याम मालूम होता है। चीनियो ने उत्तर के रहने वाले शकों के क्षेत्र का नाम एतदर्थ श्याम रख दिया था। आज भी श्याम 'वगलर' तथा श्याम 'उप्रि-