भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 872, कुल 984 में से

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पृष्ठ 872

परिशिष्ट ज ६५ उसका मत है कि भारत में जहाँ शक निवास करते थे यह प्रथा प्रचलित थी । शकों के भारत में आबाद होने पर शक तथा भारतीयों मे परस्पर विवाह होने लगा था । दक्षिण भारत में भानजो के साथ विवाह करना शक प्रभाव ही प्रतीत होता है । कनिघम का मत है कि ओक्सस नदी से चलकर शक किपिन अर्थात् कपिशा में आये । वहाँ से वे देश के अनेक भागों में और सिन्ध में फैल गये । (कनिंघम = क्वाइन्स आफ इण्डोसीथियन ४ : २२९) इसका समर्थन हिरोडोट्स के लेखों से भी होता है । पाण्डवों की तरह अनेक भाइयों की एक पत्नी द्रोपदी तुल्य होती थी । यूथ विवाह अर्थात् स्त्री, पुरुषों के एक वृन्द किंवा समूह का विवाह दूसरे वृन्द किंवा समूह अथवा यूथ से हो जाता था । जाति के नेता अथवा राजा की मृत्यु होने पर, उसकी एक पत्नी उसके साथ कब्र में जीवित गाड़ दी जाती थी । भारत में पति के साथ मरने की प्रथा दूसरे प्रकार की थी । राजा की अनेक रानियों में ज्येष्ठा, उसके अभाव में अन्य रानी पति के साथ सती होती थी । पाण्डु की मृत्यु के पश्चात् ज्येष्ठा रानी युधिष्ठिर की माता कुन्ती नहीं सती हुई । नकुल तथा सहदेव की माता माद्री अर्थात् कनिष्ठा रानी पति पाण्डु के साथ सती हुई थी । नेपाल में राणाओं तथा राजाओ के साथ एक स्त्री के सती होने का उल्लेख उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक मिलता है । उदयपुर में दिवंगत राणाओं की छतरियाँ बनी हैं । सती प्रथा के काल तक रानियां सती होती थी । छतरियो में एकलिंग के समान मूर्तियां स्थापित है। उसके समीप ही दूसरी प्रतिमा एक चौखूंटा लिंगाकार शिला की होती है । उस- पर राणाओं के साथ जितनी रानियां सती होती थीं उतनी स्त्री प्रतिमा उत्खनित कर दी गयी है । इससे पता चलता है । किस राणा के साथ कितनी रानियां सती हुई थी । आर्यों में श्राद्ध प्रथा प्रचलित थी । महापात्र को दिवंगत आत्मा की शान्ति तथा सुख के लिए एका- दशाहु के दिन दिवंगत द्वारा प्रयुक्त वस्तुएँ तथा प्रसाधन, धन, वाहन सभी कुछ दिया जाता था । मुझे स्मरण है कि हमारे पिता के नाना श्री हरनारायणसिंह काशी में मरे । मै छोटा था । वे अफीम खाते थे । महा- पात्र की विदाई के दिन उसे अफीम खिलाया गया था । शको में यह प्रथा कुछ दूसरे प्रकार से प्रचलित थी । कब्रों में दिवंगत आत्मा की प्रिय तथा उपयोग की सब सामग्री उसके शव के साथ गाड़ देते थे । शको की यह प्रथा मिश्र के फरोहा अर्थात् फरमून लोगों में कुछ भिन्नता के साथ प्रचलित थी । फरोहा के पिरामिडों में उनके शव के साथ जीवनोपयोगी अथवा दिवंगत आत्मा की सभी प्रिय वस्तुओं को एकत्रित कर दिया जाता था । मिश्र के राजा आजीवन अपने कब्र में रखने योग्य सामानों का संचय करते रहते थे । इस प्रकार की कब्रें काकेशस के उत्तर में प्राप्त हुई हैं । अनुमान किया जाता है । भारतीय उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती पर्वतीय खश जाति शक जाति की एक शाखा से सम्बन्धित थी । उनकी कब्रें लद्दाख से कमायूँ जिलों तक पाई गयी हैं । उनमें जीवनोपयोगी अर्थात् खान- पान तथा अन्य सामग्रियां गडी मिली है । शको में मृतको को समाधि देने अथवा गाड़ने के साथ ही काय शव को वृक्षों पर टांग देने की भी प्रथा थी । पक्षियों के मांसादि खा जाने पर जब केवल अस्थि पंजर शेष रह जाता था तो अस्थि चयन किया जाता था । अस्थियों को एकत्रित कर तत्कालीन संस्कार विधि के साथ उन्हें गाड़ देते थे । हिन्दुओं में यह प्रथा भिन्न प्रकार से प्रचलित है । दाह करने के पश्चात् अस्थियों का चयन किया जाता है । यदि नदी समीप हुई तो उसका प्रवाह किया जाता है । अन्यथा उन्हें ताम्र अथवा मृत्तिका पात्र में प्रवाह के लिए रख देते है । प्रवाह न करने के अभाव में उन्हें गाड़ दिया जाता है । पारसी लोग शव का संस्कार इसी प्रकार करते हैं यद्यपि इसमें कुछ सुधार हो गया है । पारसी ९

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