भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 871, कुल 984 में से

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पृष्ठ 871

६४ राजतरंगिणी शिमोर्ट भी दी गयी है । मुख्यतः फरेक क्षेत्र के दक्षिण पूर्व मे मिलते हैं । अब तक यह घुमन्तू जाति है । आधुनिक काल में ईख तथा धान की खेती करने लगे हैं । एक मत और है । श्याम अर्थात् थाईलैण्ड की मीकांग (मातु गंगा) नदी के तट पर बसी हुई शक अथवा शुक जाति को शक जाति का मूलस्थान मानकर श्यामको शक द्वीप कुछ विद्वान् मानते हैं । इसी प्रकार वरमा देश के थेक किंवा शक जाति को शक मानने का प्रयास किया गया है । यह धारणा विष्णु पुराण वर्णित शाक वृक्ष, शक स्थान आदि से होती है । विद्वानों ने विष्णु पुराण वर्णित शाक वृक्ष को मैशक अर्थात् सागवान वृक्ष माना है । वर्मा, श्याम, कम्बोडिया तथा इण्डोनेशिया में सागवान वृक्ष अधिक पाये जाते हैं । अतएव इस भूखण्ड को शकद्वीप मानने का एक प्रयास किया गया है । शक द्वीप के साथ क्षीरोद सागर किंवा क्षीरार्णव का वर्णन मिलता है । श्याम कम्बोडिया के दक्षिण तथा मलय प्रायद्वीप के पूर्व जो समुद्रीय जल-खण्ड चीन सागर को मिलाता है उसका प्राचीन नाम केदरेन्दज अथवा करन्देन्दज है । भाषाविद् विद्वान् केदेरेन्दज को क्षीरोद शब्द का अपभ्रंश मानते हैं । परन्तु यह मत भ्रामक है । भविष्य पुराण में क्षीरोद शब्द आया है उसी के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है । लवणोदात्परे पारे क्षीरोदेन समावृतः । जम्बूद्वीपात्परे यस्माच्छाकद्वीप इति स्मृतः ॥ महाभारत (६ . १२ : ९) में क्षीरोद का उल्लेख किया गया है। इन्हीं शब्दों के उल्लेख पर श्याम तथा कम्बोडिया को शक द्वीप प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है । आर्य तथा शक जाति के रूप, आकारादि में विभिन्नता नगण्य है । ई० पू० छठीं तथा पांचवी शताब्दी में यूनानी इतिहासकारों ने पारसी सम्राट् 'दारियोस' अर्थात् 'दारियस' की सेना में शकों का उल्लेख किया है । उन्होने वर्णन किया है कि शकों के देश में लोहा तथा चांदी नहीं होता । उन धातुओं का प्रयोग वे नहीं करते थे । किन्तु स्वर्ण तथा ताम्बा का प्रयोग वे करते दिखायी देते थे । उस समय शकों में सुवर्ण तथा ताम्र दोनो धातुओ का प्रयोग देखा गया था । ई०पू० ५१३ वर्ष में दारयोस ने कृष्ण सागर के तटवर्ती क्षेत्र दाकों पर आक्रमण किया था । ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में उत्तर पश्चिम भारत मे तथा उसके सीमान्त पर शासन करने वाले अनेक यूनानी शासकों का शक नाम था । ईसा पूर्व १२८ वर्ष में एक चीनी सैनिक पर्यटक चाइच्बान शकों के नगर वारन्तर में गया था । उसने उन्हें तम्बुओं में निवास करते देखा था । उनका जीवन निर्वाह पशु-पालन पर निर्भर था । शक परम्परा कहती है । उक्त आक्रमण के १००० वर्ष पूर्व शकों में राजा हुए थे । उनके गणतन्त्र शासन प्रणाली प्रचलित थी । सख्यात अथवा सर्वभान उनके गणतन्त्र का नाम था । शकों के सामाजिक जीवन में स्त्रियो का प्रमुख स्थान होता था । युद्ध में पति के दिवंगत होने पर वे विधवा होकर बैठती नहीं थीं । स्वयं सेना का संचालन करती थीं । शक जाति का मुख्य भोजन मास तथा दूध था । वे युद्ध भूमि में शत्रु का रक्त पीते थे । वे अपने शत्रु की खोपड़ी का कटोरा बनाते थे । कापालिक की तरह उसे पान तथा भिक्षा पात्र की तरह प्रयोग करते थे । शकों की स्त्रियों में बहुपति प्रथा प्रचलित थी । दाको में बहु पत्नी प्रथा प्रचलित थी । इसका

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