राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ राजतरंगिणी भारत में आये थे। शकों का भारत में विस्तार यूनानियों को हटाकर हुआ था। जहां यूनानी थे वहां शकों का प्रभुत्व हो गया। प्रारम्भिक शक यूनानी भाषा भी बोलते थे। वे बाह्लीक भाषा अधिक बोलते थे। यह ईरानी भाषा की एक शाखा थी। कालान्तर में उन्होंने संस्कृत भाषा को अपना लिया। उनकी वही एक प्रकार से राजभाषा हो गयी थी। भारतीय प्रभाव काशगर तक फैल गया था। शक मध्य एशिया को एक मन से कहते थे। विष्णु पुराण शकों के भारतीयकरण के विषय में प्रकाश डालता है (२ : ४ : ६९) निस्सन्देह शक विदेशी सभ्यता और संस्कृति भारत में लाये थे। भारतीय तथा शक दोनों सभ्यताएं एवं संस्कृतियों ने एक दूसरे को प्रभावित किया था। शकों की एक शाखा ने महाराष्ट्र, सौराष्ट्र तथा मालवा पर अधिकार कर लिया। शकजातीय राज्य- पालों को क्षत्रप नाम से सम्बोधित किया जाता था। उत्तरी तथा पश्चिमी दो प्रकार के क्षत्रपों का उल्लेख मिलता है। तक्षशिला तथा मथुरा के क्षत्रपों को उत्तरीय तथा महाराष्ट्र, उज्जैन, गुजरात, सिन्धादि के क्षत्रपों को पश्चिमीय क्षत्रप कहते थे। तक्षशिला में अनेक शकराजाओं के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। प्रथम शक राजा माउज अथवा कोनो था। वह पश्चिमी पंजाब का राजा था। उनकी मुद्राएं पूर्वीय ईरान तथा काबुल उपत्यका तक मिली हैं। उसकी राजधानी तक्षशिला थी। उसका राज्यकाल १३५-१४५ ई० पू० कहा जाता है। उसे राजाओं का राजा कहा गया है। कोनो का उत्तराधिकारी अजेस अथवा अजेज प्रथम था। यह शब्द पारसी शब्द अजोज का अपभ्रंश हो सकता है। कुछ विद्वानों का मत है कि माउज के राज्य में कश्मीर राज्य का दक्षिणी अंचल था। सीस्तान अर्थात् शकस्थान का राजा स्पिलिसेस था। दोनों राजाओं की संयुक्त मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। अजोज की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अजिलिसेस राजा हुआ। उसके पश्चात् उसका पुत्र अजोज द्वितीय राजा हुआ। तक्षशिला के शक राजाओं में चार राजाओं का वृत्तान्त ज्ञात है। अनेक शक राजाओं का और पता चलता है। उनका पारस्परिक किस वंशानुगत सम्बन्ध क्या था, कहना कठिन है। मथुरा का प्रथम शक राजा राजुल था। उसकी उपाधि महा क्षत्रप थी। राजुल के पश्चात् उसका पुत्र सोडस राजा हुआ। मथुरा के शिलालेख में उसे महाक्षत्रप कहा गया है। सोडस के पश्चात् उसकी बहन का पुत्र खराम्त राजा हुआ। मथुरा के शकों में एक राजा पतिक भी हुआ है। पतिक और राजुल का क्या सम्बन्ध था अनुसन्धान का विषय है। कतिपय विद्वान् उत्तरी क्षत्रपों को पर्थियन (पल्हव) मानते हैं। किन्तु अधिक झुकाव उन्हें शक मानने की तरफ है। मथुरा के सिंहस्तम्भ पर शकस्थान किंवा सीस्तान शब्द अंकित है। एक मत है कि सिंहस्तम्भ की कला पर ईरानियन कला का प्रभाव है। राजुल क्षत्रप तथा उसका पुत्र सोडास का समय लगभग ७२ तथा ७८ सन् ईस्वी कहा जाता है। एक मत है। स्तम्भ सोडास के अभिलेख से प्राचीन है। मौरसेनिक मथुरा क्षेत्र के निवासी थे। वात्सायन ने (तृतीय शताब्दी) उनकी निन्दा की है। महाराष्ट्र के सातवाहन राजाओं को शकवंशीय क्षत्रपों ने पराजित कर शक राज्य स्थापित किया। इस वंश का प्रसिद्ध राजा नहपान था। उसका शासन काल ११६-१२४ ई० तक था। उपवदत्त उसका जामाता था। उपवदत्त को ऋषभदत्त कुछ विद्वान् मानते हैं। उपवदत्त के शिलालेखों से प्रमाणित होता है कि महाराष्ट्र, उत्तरी कोंकण, उज्जैन तथा अजमेर पर नहपान का राज्य था। नासिक अभिलेख इस पर