राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट 'छ' ५९ मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख है— तास्विमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वाश्चैव सजांगलाः । कुरु पांचाल का एक साथ उल्लेख पुराणों में स्पष्ट दिखाई देता है। मत्स्य पुराण में 'तास्विमे कुरु पाञ्चालाः' तथा विष्णु, कूर्म, वायु एवं ब्रह्माण्ड पुराण में भी 'तास्विमे कुरुपांचाल.' का प्रयोग किया गया है । पुराणों के अनुसार वर्तमान मेरठ तथा दिल्ली क्षेत्र कुरु प्रदेश में आता है। पांचाल देश में अहिच्छत्र वर्तमान रामनगर, बरेली, बदायूँ जिला तथा कम्पिला अर्थात् काम्पिल्य ( फर्रुखाबाद जिला उत्तर प्रदेश ) का था । पूर्व में गोमती तथा दक्षिण पश्चिम चम्बल नदी तक क्षेत्र विस्तृत था । पश्चिम में पांचाल की सीमा शूरसेन थी । पांचाल भी उत्तरी तथा दक्षिणी भागों में विभक्त था । संहितोपनिषद् ब्राह्मण में एक स्थल पर प्राच्य पांचाल का भी वर्णन है। इसके तीन भाग भी थे । यह अनुमान इसके लिये त्र्यनीक शब्द के उल्लेख से मिलता है । उत्तर पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र तथा दक्षिण पांचाल की कांपिल्य थी। अहिच्छत्र वर्तमान रामनगर जिला बरेली के खनन कार्य से इसकी प्राचीनता स्पष्ट होती है। कुरुओं तथा पांचालों में उत्तर कुरु को अपने राज्य में सम्मिलित रखने के लिये संघर्ष होते थे। कभी-कभी उत्तर पांचाल को कुरुरट्ठ (कुरुराष्ट्र) में सम्मिलित किया गया है। उसकी राजधानी हस्तिनापुर थी। कभी कंपिल रट्ठ (कंपिल राष्ट्र) में सम्मि- लित हो जाता था । मार्कण्डेय पुराण में एक स्थान पर 'कुरुवंस्तंगणा यसाः' का उल्लेख आया है। यहाँ कुरु से उत्तर कुरु समझना चाहिए । वायु, ब्रह्माण्ड पुराणों में 'कुरुन् समस्तानपि' उल्लेख भी किया गया है। मत्स्य में 'कुरुन् वै भरता- नपि' उल्लेख मिलता है । पुराणों से प्रतीत होता है कि कुरु तथा भरत एक ही जाति के थे । स्कन्दपुराण के देशों की तालिका में कुरु का स्थान ६३ वाँ तथा ग्राम संख्या ४३ हजार दी गयी है। इससे प्रकट होता है। कुरु देश का क्षेत्रफल बहुत बड़ा नही था। शक्ति संगम तन्त्र ( ३:७:२३) में कुरु राष्ट्र कश्मीर आदि से छोटा था। कुरु देश हस्तिनापुर से आरम्भ होकर दक्षिण में कुरुक्षेत्र तक और पांचाल पूर्व दिशा तक विस्तृत था । इसके अनुसार सरस्वती तथा दृषद्वती नदियों के मध्य कुरुक्षेत्र था । अर्थात् दक्षिण में सरस्वती उत्तर दृषद्वती नदियाँ थीं। मनुस्मृति में इस प्रदेश को ब्रह्मावर्त कहा गया है । ( मनु० २:१७ ) दक्षिण कुरु प्रदेश की सीमा पूर्व में पांचाल, दक्षिण में सरस्वती तथा उत्तर में दृषद्वती नदियाँ हो जाती है। वाहीक प्रदेश कुरुक्षेत्र के पश्चिम होना चाहिए । वाहीक अंचल के लिए महाभारत में प्रायः भद्र, यातिक, अरट्ट तथा पंचनद शब्दों का प्रयोग किया गया है। वर्तमान सोनपत, अमीन, करनाल, पानी- पत के जिले कुरुक्षेत्र में माने जा सकते हैं। कुरुजांगल कुरुक्षेत्र का जंगली भाग मालूम होता है। वह उत्तर में काम्यक वन तक फैला था। दक्षिण में कुरुदेश खाण्डव वन तथा सरस्वती के तट तक फैला था। ( महाभारत १:५:३ ) यह क्षेत्र का पूर्वीय भाग था। यह गंगा तथा उत्तर पांचाल के मध्य विस्तृत था । कुरुक्षेत्र के विषय में महाभारत में कहा गया है। यह क्षेत्र पवित्र है। वहाँ की रजस्पर्श से भी मनुष्य को स्वर्ग प्राप्ति होती है। कुरुक्षेत्र में जो सरस्वती के दक्षिण तथा दृषद्वती के उत्तर निवास करते हैं, जैसे स्वर्ग में निवास करते हैं ।