भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 863

५८ राजतरंगिणी हैं। सम्भव है उसी स्थान पर शेरशाह ने नवीन किला बनवाया होगा। यह किला इण्डिया गेट से दिखाई पड़ता है। हस्तिनापुर कालान्तर में महत्त्वहीन हो गया। इन्द्रप्रस्थ आज भी भारत की राजधानी है। कुरु देश का दूसरा नगर उत्तराध्ययनसूत्र के अनुसार इसुकार, उसुयार किंवा इशुगार था। यह अत्यन्त समृद्धिशाली नगर था। उसकी तुलना स्वर्ग से की गयी है। बौद्ध साहित्य में कुरु से सम्बन्धित अनेक कथाएं मिलती हैं। कुरुधम्म जातक में बोद्धिसत्त्व को कुरु राजा धनंजय का पुत्र इन्द्रप्रस्थ में होना लिखा है। कलिंग में एक बार अवर्षण हुआ। कारण बताया गया। कुरुधम्म का पालन नहीं किया जाता। अतएव अवर्षण हुआ है। कलिंग से ब्राह्मण कुरु देश में धर्म ज्ञान प्राप्ति निमित्त आये। तत्पश्चात् कलिंग में कुरुधर्म का पालन किया जाने लगा। वर्षा हुई। राजा धनंजय कौरव्य का अनेक जातकों में उल्लेख मिलता है। धनंजय को युधिष्ठिर वंशीय कहा गया है। भगवान् बुद्ध उत्तरापथ में आकर शिक्षा दिये थे। कुरु देश में वे विशेष निवास किये थे। एक कथा में कुरु के राजा के मन्त्री का नाम रायरेथ दिया गया है। एक स्थान पर विधुर दिया गया है। कुरु का राज्य ९०० मील विस्तार में बताया गया है। कुरु में राजतंत्रीय शासन व्यवस्था थी। परन्तु कौटिल्य काल में यहाँ गणतन्त्र प्रणाली प्रचलित हो गयी थी। उनके लिए उपजीवी शब्द का व्यवहार किया गया है। अर्थात् सभी नागरिक राजा थे। उनका समाज में स्थान समान था। नवीं शताब्दी, में पता चलता है, धर्मपाल ने चक्रायुध को कन्नौज के राज्य पर बैठाया था। पुराणों में कुरु जाति का वर्णन बहुत मिलता है। वे प्रायः एक जैसे हैं। कुरु क्षत्रिय थे। मगध सम्राट् जरासन्ध के पराजय के पश्चात् उत्तरापथ में कुरु अत्यन्त शक्तिशाली हो गये थे। कुरु राजा शान्तनु के दो पुत्र चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य थे। दोनो पुत्रहीन मर गये। अतएव नियोगद्वारा विचित्रवीर्य की पत्नी से धृतराष्ट्र तथा पाण्डु हुए। धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्र दुर्योधनादि हुए। उन्हें कौरव कहा गया। पाण्डु के पुत्र युधिष्ठिर आदि हुए। उन्हें पाण्डव कहा गया। धृतराष्ट्र अन्धा होने के कारण राजसिंहासन पर नहीं बैठ सके। अतएव कनिष्ठ भ्राता पाण्डु राजा हुए। पाण्डु की अकाल मृत्यु के कारण धृतराष्ट्र राजा तथा युधिष्ठिर उपराजा हुए। परन्तु धृतराष्ट्र के पुत्रों को यह बात पसन्द न आई। वे स्वयं अपने पिता के पश्चात् उत्तराधिकारी होना चाहते थे। अतएव एक ही कुरुवंश की दो शाखा कौरव तथा पाण्डवों में महा भयंकर महाभारत युद्ध हुआ। नीलमत पुराण में कौरव तथा कौरव्य शब्दों का उल्लेख मिलता है। यह कुरु वंश के लिए प्रयुक्त किया गया है। कौरव : ततः सा सुषुवे पुत्रं बालगोन्मदसञ्ज्ञितम्। बालभावात् पाण्डुसुतैर्नानीता कौरवेन वा ॥ १० = २९ कौरव्य : गन्धसोमस्तथा गर्व्यः इवितिर्मिनिटिस्तथा । ऐरावतः स कौरव्यो माषादः कुमुदप्रभः ॥ १/२ = १०७८