राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० राजतरंगिणी पाणिनि की अष्टाध्यायी (४:१-१७२-१७६ तथा ४:२:१३०) में इसका वर्णन है। योगिनी तंत्र (२:१, २:७-८) में इसका उल्लेख है। हुएनसांग वर्णन करता है। थानेश्वर वंश का राज्य था। जिसका दक्षिणी राजपूताना तथा कुछ भाग उत्तर प्रदेश का था। सन् ६४८ ई० में एक चीनी राजदूत हर्षवर्धन की राज्यसभा में भेजा गया था। उसके अनुसार सेनापति अर्जुन ने राज्य पर अधिकार कर लिया था। राजा के वंश का लोप हो गया था। थानेश्वर का महत्त्व कायम रहा। परन्तु सन् १०१४ में महमूद गजनो ने इस पर अधिकार कर लिया था। परन्तु सन् १०४३ में दिल्ली के हिन्दू राज्य के अधीन पुनः चला गया। कुरुक्षेत्र का सामरिक महत्त्व है। इस क्षेत्र में महाभारत तथा तीनों पानीपत के युद्ध हुए थे। इन चारों युद्धों ने भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया था। चारा युद्धो के कारण भारत के केन्द्रीय राज्य शासन, वंश तथा प्रणालियों में आमूल परिवर्तन हुआ है। सूर्य ग्रहण के अवसर पर यहाँ के सरोवर में स्नान करने का महत्त्व है। मैं कुरुक्षेत्र गया हूँ। सरोवर कमल से पूर्ण हैं। पानी की कमी नहीं है। मैदान है। पैदावार खूब है। प्राचीन काल में घोड़ा, हाथी, ऊँट के लिए चारा तथा पानी की आवश्यकता होती थी। उस समय इसके गुवास के कारण क्षेत्र का सामरिक महत्त्व था।