राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट 'ज' शक ( तरंग : १ : ५२ : पृष्ठ ९६; २ : ६ पृष्ठ ३८० तथा ३ : १२८ ) ऋग्वेद ( ११ : १३२ : ५ ) में शक्रपूत शब्द एक राजा के लिए आया है। अथर्ववेद ( ३ : २४ : ४; २० : १३१ : १६ ) में गोमय के अर्थ में शक्रपूत शब्द का प्रयोग किया गया है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी ( ४ : १ : १७५ ) में शक देश का उल्लेख किया है। बृहद् संहिता में ( १४ : २१ ) में शक- द्वीप को शक जाति का निवास स्थान कहा गया है। मनुस्मृति ने ( ११ : ४३, ४४ ) शकों का यवन के साथ उल्लेख कर उन्हें शूद्रों की श्रेणी में पतित क्षत्री कहकर रखा है। पाणिनि ने ( ४ : १ : १७५ ) कम्बोज- आदि गणों में शकों का उल्लेख किया है। मनु ने ( १० : ४ ) बर्बरों को शक, शवर, यवन आदि में गिना है। वायु पुराण में उल्लेख आता है : 'शका हृदा कुलिन्दाश्च', 'शकाः हृदाः कुणिन्दाश्च' तथा 'शका- द्विहा रुलिताश्च'। ब्रह्माण्ड पुराण में 'शका हूणाः कुलिन्दाश्च', मत्स्य पुराण में 'शका द्रुह्याः पुलिन्दाश्च' उल्लेख मिलता है। सिरीन्ध्रान् कुकुरांश्चीनान् बर्बरान् यवनान् शकान् । रूपाणांश्च कुणिन्दाश्च अंतलोकवरांश्चवान् ॥ वायु पुराण में 'बर्बरान्, यवनान् द्रुहान्', ब्रह्माण्ड पुराण में 'बर्बरान् यवनान् द्रुहान्', मत्स्य पुराण में 'बर्बरान् यवनान् खसान्'; बर्बरान् यवनान् खसान्', 'बर्बरान् यवनांश्छकान्', 'बर्बरान् यवनान् द्रुहान्।' उल्लेख मिलता है। शकों का मूल निवास स्थान सीर तथा आमू दरिया की उपत्यका माना जाता है। एक और उल्लेख मिलता है। अथ चीनमरूंश्चैव तंगणान् सर्वशूलिकान् । साभ्रांस्तुषारान् लम्प्याकान् पह्लवान् पारदान् शकान् ॥ वायु पुराण में—'पह्लवान् दरदान् शकान्', मत्स्य पुराण में—'पह्लवान् पारदान् शकान्; ब्रह्माण्ड पुराण में—'पह्लवान् दरदान् शकान् ।" आदि का उल्लेख मिलता है। इसी पुराण ( २ : १६ : ४८ ) में उसे उदीच्य का एक देश माना गया है। वायु पुराण ( ९९ : ३१०-३२४ तथा ३६१ ) के अनुसार पच्चीस शक राजाओं को शिशुनाग, ऐक्ष्वाक, पांचाल, हैहय, कलिंग राजाओं का समकालीन कहा गया है। उनका राज्यकाल ३८० वर्ष कहा गया है। मत्स्य पुराण ( २७२ : १८ ) अट्ठारह शक राजाओं का उल्लेख करता है। वहाँ पर उनका उल्लेख सात आन्ध्र, दस आभीर तथा ७ गर्दभिल्लों के पश्चात् किया गया है। विष्णु पुराण ( ४ : २४ : ५२ ) में