भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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४६ राजतरंगिणी

उस गूजर से मालूम हुआ । पहाड़ी पर एक और नाग है । उसका नाम क्या है । कैसा है । यह बता नही सका । हम लोग खच्चर को छोड़कर पहाड़ी पर चढे । यह पहाड़ी आसपास की भूमि तल से ७५ फिट से कुछ ऊपर ऊँची है । इसके तीन ओर सरिता की धारा बहती है । एक तरफ ढालुआ भूमि है । उसी ढाल से चढ़कर भेदा देवी किंवा गगोद्‌भेद तीर्थ पर पहुँचे । कल्हण ने स्थान की संज्ञा भेडगिर नाम से दी है । तीर्थ का नाम गंगोद्‌भेद कहा है । भेडगिरी, भेदगिर, भैट, ब्राडू, एक ही शब्द के विभिन्न अपभ्रंश है । स्तीन इस स्थान पर सन् १८९५ मे आये थे । उस समय कश्मीर का ब्राह्मण वर्ग तथा अन्य हिन्दू इस तीर्थ को भूल गये थे । यह तीर्थ लुप्त हो गया था । स्तीन ने इसे पुन शारदा तीर्थ तुल्य खोज निकाला है । दूसरी भेदा देवी की स्थापना तथा मार्ग दुर्गम होने के कारण यहा को यात्रा बन्द हो गयी है । मार्ग कष्टसाध्य तथा खतरे से खाली न होने के कारण लोग आना पसन्द नही करते । यहा के रहने वाले गूजरो से मैने पूछा । कभी कोई व्यक्ति या पर्यटक उनकी जानकारी मे यहा आया था ? उन्होने उत्तर दिया । उनकी जानकारी मे कोई नही आया था । उन्हें लगभग ४० या ५० वर्षों की बातें अच्छी तरह याद थी । हमने शंका की । शायद कोई आया हो । उन्होने विश्वास के साथ कहा । ऐसा हो नही सक्ता । हम लोग स्थान छोड़कर कभी हटे नही । स्तीन को अपनी यात्रा के समय इसी प्रकार का अनुभव हुआ था । बुद्धार में उन्हें खैरा नामक ७५ वर्षीय गूजर से मुलाकात हुई थी । वह यहा पर ४० वर्षों से रहता था । उसने स्तीन को बताया था कि उसकी युवावस्था में कभी-कभी ब्राह्मण यहा पर आते थे । स्नान करने के पश्चात् श्राद्ध करते थे । कालान्तर में ब्राह्मणो का आना दुर्लभ हो गया । पाकिस्तान तथा हिन्दुस्तान के बीच कश्मीरी संघर्ष के समय सैनिको द्वारा विभिन्न पथों, जंगलों तथा दरों की खोज हुई । यहाँ भी कुछ लोग आये थे । कुछ दिन पहले मार्ग साफ करते एक जिप आई थी । शायद सड़कों की पैमाइश की बात थी । उसे भी हुए तीन वर्ष बीत चुके थे । सम्भव है राज्य सरकार यहाँ तक शीघ्र ही सड़क बनवाये ।