भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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परिशिष्ट 'च' ४७

मोचनी एक सरिता जिसका नाम 'अभया' होगा निकलेगी । वह अनवरत प्रवाहित रहेगी । वह पहाड़ी के ढाल से उछलती नीचे नहीं बहेगी । मैने इसे सत्य देखा । सरोवर से कुछ नीचे जल निकलता दिखायी पड़ता है । वहाँ चरणामृत लिया जाता है । उसी स्थान पर जल पुनः पहाड़ी में समाविष्ट हो जाता है । उसका पता नहीं चलता । नीचे जहाँ जल प्रवाह है वहाँ उपरोक्त गन्धक का स्रोत मिलता है । इस शांतस्थान को जल शुद्ध रखने के लिए गूज़रों ने शिलाखण्डों से ढंक दिया था । देवी सरस्वती ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि प्रत्येक मास के तृतीयांश में ही जलधारा प्रवा- हित रहेगी । शेष समय में गंगा स्वर्ग में बहती रहेगी । देवी ने ऋषि से वर माँगने के लिए कहा । ऋषि ने वर माँगा । जल सदा सर्वदा एक रूप प्रवाहित होता रहे । देवी ने वर स्वीकार किया । पुलस्त्य के पास जल निरन्तर बहता रहा । गंगोद्भेद तीर्थ प्रकाश में आया । देवी के दर्शन निमित्त ऋषि पुलस्त्य ने पुनः एक सहस्र वर्ष तक तपस्या की । देवी सरस्वती ने राजहंसी के रूप में ऋषि को दर्शन दिया । ऋषि ने देवी की पूजा चैत्र शुक्ल अष्टमी तथा नवमी को की । देवी ने ६ प्रकृतियों का वर्णन ऋषि से किया । छओ प्रकृतियो के भेदों का वर्णन करने के कारण देवी का नाम ऋषि ने भेद रखा । देवी की पूजा हंस वागेश्वरी भेदा रूप से चैत्र शुक्ल चतुर्दशी तथा पूर्णमासी को होने लगी । गंगोद्भेद माहात्म्य भेदा देवी का उल्लेख करते हुए गोवर्धन धर विष्णु का वर्णन करता है । वह एक आश्चर्यजनक प्राकृतिक अलौकिक थान का वर्णन करता है । गोवर्धनधर के १२५ हस्त दूरी तक कभी तुषारपात नही होता (श्लोक ० ७५, ८७, ८९, ९९, १०३९ ) । उसी स्थान में ऋषि निमित्त थौजस यम की मूर्ति स्थापित हुई । यम की पूजा माघ कृष्ण अर्थात् आश्वयुज १४ होने का विधान निर्धारित किया गया । माहात्म्य यहाँ रामाश्रम, रामुष, सप्त ऋषि आश्रम, वैतरणी नदी आदि तीर्थों का उल्लेख करता है । उनकी यात्रा गंगोद्भेद तीर्थ यात्रा के समय करनी चाहिए । नीलमत पुराण गंगोद्भेद तीर्थ के संदर्भ में भेदा देवी का उल्लेख करता है । नीलमत पुराण अमा- वस्या के दिन, आश्वयुज, नारायण अर्थात् गोवर्धनधर से देवस्थान, रामतीर्थ अर्थात् रामाश्रम, सप्तऋषि तथा वैतरणी का उल्लेख करता है । (नील० 1312-1319) उक्त स्थानो में रामुष स्थान जिसका वर्णन कल्हण ने राजतरंगिणी मे किया है । श्रीनगर सुपियान सड़क पर रामुह ग्राम है (रा० त० २:५५; ८ : २८१३ ) । आइने अकबरी में अबुलफजल वर्णन करता है कि शुकरोह के पास एक नीची पहाड़ी है । उसके शिखर पर एक जल-स्रोत है । वह पूरे वर्ष भर चलता रहता है । इस पर्वत के बाहु मूल पर तुषारपात नहीं होता । शुकरोह अर्थात् वर्तमान शूकरु रामुह से दक्षिण दिशा में मिलता है । वह नाम भेदा गिरि के लिए आइने अकबरी में आया है । (आइने अकबरी : २ : ३६२ ) भेदगिरि पहुँचने पर परिश्रम सार्थक समझा । मार्ग की थकान दूर हो गयी । वहाँ चुपचाप बैठने में एक अभूतपूर्व आनन्द का अनुभव हो रहा था । उस अनुभव का वर्णन करना कठिन है । उसका सम्बन्ध केवल कायिक किंवा इन्द्रियगम्य सुख से नहीं अपितु आत्मा से जैसे था । भेदगिरि शिखर चारों तरफ के स्थानों से ऊँचा है । स्टीन की गणना के अनुसार उत्तर-पूर्व उसे