भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 850, कुल 984 में से

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पृष्ठ 850

परिशिष्ट 'च' ४३ के लिए तैयार नहीं हो रहा था। मुझे धोती चट्टी नंगे सर देखकर कौतूहल के कारण ग्रामीण यहां एकत्र हो गये थे। हाजी साहब तथा गाँव वाले उसे समझाने लगे। मार्ग मे एक घुडसवार गुलाम मुहम्मद शाह साकिन मथवादा मिले। हम कुछ दूर तक चले थे। वे कभी आगे और कभी पीछे रुक जाते थे। कभी आगे निकल जाते थे। हमारी कार उनके टट्टू से भी मन्द गति से चल रही थी। वे मेवे के व्यापारी थे। एक जगह उन्हें हमने रुका देखा। मध्याह्न काल था। व्यवहार पटु थे। तुरन्त अपने लडकों से नाक मंगाया। वे इतने मीठे तथा रसदार थे कि हाथों से नाक काटते ही रस चूने लगा। निकटवर्ती एक वृक्ष से उनका लडका नाक तोड रहा था। उन्होने बड़े मुहब्बत तथा आत्मीयता के साथ हमें अपना मेहमान बना लिया। हमें भूख और प्यास दोनों लगी थी। इस समय नाक अमृत फल प्रतीत हुआ। उनकी बहुत शुक्रिया अदा किया। हमारा उद्देश्य जानकर उन्होंने अपने पुत्र अली मुहम्मद शाह को साथ कर दिया। वह ब्रिजवरारी तथा 'भेदा देवी' का स्थान जानता था। वह सहर्ष तैयार हो गया। उसमें युवक जन्य उत्साह था। उसमें मानवीय समवेदना थी। सड़क बहुत खराब थी। पत्थर के टुकड़े सड़क में पड़े थे। पत्थरो को हटाकर बार- बार चढ़ना-उतरना पड़ता था। अली मुहम्मद पत्थरों को उठाकर रास्ता बनाते पैदल चलने लगा। उसे इस काम में जैसे अद्भुत रस मिलता था। बेलरमाशपुर मे हाजी साहब तथा अली मुहम्मद के प्रयास से काफी किराया देने पर खच्चर ठीक हो गया। शर्त ठहरी। थापमी मे केवल एक मील खच्चर हमें पहुँचाकर लौट जायेगा। शेष मार्ग पैदल वापस आना होगा। कोई दूसरा उपाय नही था। विवश होकर तैयार होना पड़ा। जंगली सड़क भेदगिर अर्थात् गंगोदभेद तीर्थ तक जाती है। जिप गाड़ी वहाँ अभी नहीं पहुँच पाती। मार्ग में मीलो दूर पीछे रह जाती है। विरानो नदी की उपत्यका से चलना पड़ता है। कुछ दूर चलने पर गाँव नहीं मिलते। केवल गूजरो के लकड़ी के बने मकान यत्र-तत्र मिलते हैं। गूजर गाय, भेड़ तथा बकरी पालते हैं। बड़े परिश्रमी होते हैं। उनका जीवन संकट तथा तूफानों के बीच गुजरता है। गूजरो के मकान नहीं होते। जंगली लकड़ियों की शहतीर काट लेते हैं। उन्हें चारों ओर खड़ाकर द्वार विहीन घोंखुटा, तीन तरफ से बन्द स्थान कोठरीनुमा बना लेते हैं। छत लट्ठे से पाटकर उस पर मिट्टी रख देते हैं। मिट्टी पर घास जम जाती है। मिट्टी और घास के कारण वर्षा काल में जल कोठरी में चूता नही। इस प्रकार वर्षा से रक्षा कर लेते हैं। एक ही कोठरी में पशु, घास तथा स्वयं रहने की व्यवस्था करते हैं। मक्का की रोटी और दूध अथवा मक्का की रोटी मिर्च लगाकर खाते हैं। उपत्यका देवदार के वृक्षों से भरी है। सरिता जल कल-कल करता चिर गीत गाता, प्रवाहित रहता है। आदि काल से उपत्यका वह गीत सुनती आई है। प्रलय काल तक सुनती रहेगी। इस गीत को सुनते न तो उपत्यका थकी है और न गाने वाला प्रवाह कभी गतिहीन हुआ है। उपत्यका की हरियाली, शान्त निस्तब्ध वातावरण, उत्तुंग मंदिराकार देवदार तरुओं का चुपचाप प्रकृतिक़ी सुन्दरता निरखते-निरखते शता- ब्दियों तक खड़े रहना। फिर गिर जाना। फिर अपने आप उगना। यह क्रम विश्व के इस कोने में जारी है। जारी रहेगा। मनुष्य इन निरीह वृक्षों का अपने लिए नाश कर उनकी ज्योति में अपना घर उजाला करने का प्रयास करेंगे। अनेक विचार आते-जाते हृदय पर विचित्र प्रभाव डालते थे। उपत्यका के दोनो पाशर्वो में ऊँचे पहाड़ हैं। उनकी ढालों पर कहीं-कहीं गूजरों के आवास हैं। उपत्यका में जहाँ कही झुको समतलभूमि मिल गयी थी उन्होंने कुछ खेती कर ली गयी थी। मेरी यात्रा के समय गूजरों