भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 847, कुल 984 में से

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पृष्ठ 847

४० राजतरंगिणी चतुर्दशेऽहनि कर्तव्यं विशाखानां च पूजनम् । पञ्चदशेऽहनि कर्तव्यं स्थाननागस्य पूजनम् । ४।१ = १०२०, १०२१ भारत-बर्मा की सीमा पर नागवासुकी मठ था । उस मठमें नाग वासुकी की मूर्ति थी । उनका शरीर मनुष्य किन्तु मुख फणाकार भयंकर सर्प का था । उसके सम्मुख नरों की बलि दी जाती थी । दक्षिण पूर्व एशिया के इतिहास में नाग जाति का मुख्य स्थान है। कश्मीर के समान आर्यों के प्रवेश के पूर्व वहाँ नाग जाति रहती थी । कम्बुज अर्थात् कम्बोडिया के विषय में चीनी गाथा है—लगभग दो सहस्र वर्ष पूर्व कम्बुज निवासी नंगे रहते थे । शरीर पर गुदना गुदवाते थे । नौकरों तथा सम्बन्धियों को मार कर मृतक शव के साथ कब्रमें गाड देते थे । स्त्री एव पुरुषों में लज्जा का अभाव था । उन का जीवन अरण्यवासी था । वहाँ धर्म एवं मानवीय विचार उत्पन्न नहीं हुए थे । कौण्डिन्य भारतवासी थे । सोम वंशी ब्राह्मण थे । वे जहाज द्वारा कम्बुज उत्तर आये । यहाँ की रानी का नाम सोमा था । वह नाग कन्या थी । चम्बा चम्पा अर्थात् वीतनाम के आलेख में उसका नाम नागिन दिया गया है । कौण्डिन्य का जहाज लूटने सोमा आयी । संघर्ष में सोमा ने आत्म समर्पण कर दिया । कौण्डिन्य की विजय हुई । राजकन्या सोमा के साथ कौण्डिन्य ने विवाह कर लिया । उन्होंने राज्य स्थापित किया । भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता फैलायी । उनके नाम पर देश का नाम कम्बुज पड़ा । भवपुर में अपनी राजधानी स्थापित की । जनता को वस्त्र पहनना सिखाया । अक्षर ज्ञान कराया । उसके वंशजों ने २ शताब्दी तक राज्य किया । उस वंश का अन्तिम राजा वनपण था । एक दूसरी गाथा है । इन्द्रप्रस्थ के राजा आदित्य थे। अपने एक पुत्र से अप्रसन्न हो गये । उसे राज्य से निर्वासित कर दिया । वह कम्बुज आया । कम्बुज में उस समय चम्पा का एक राजा राज्य करता था । राजा को उसने मार भगाया । एक दिन समुद्र तट पर 'नामो' अर्थात् एक नाग कन्या से भेंट हुई । दोनों में अनुराग हो गया । नागी का पिता नाग राजा था । उसका नागी से विवाह हो गया । उसने अपने राज्य की राजधानी इन्द्रप्रस्थपुर अर्थात् वर्तमान एंगकोर बनाया । तमिल काव्य में एक नगर नागपुरम् का वर्णन मिलता है । वह जावा में था । यहाँ के राजा इन्द्रवंशीय भूमिवन्द्र तथा पुत्रराज थे । नागो गाथा कांची के पल्लवो में प्रचलित है। द्रोण के पुत्र अश्वस्थामा ने नामो कन्या से विवाह किया था । उनकी सन्तानें स्कन्दशिष्य नाम से विख्यात हुईं । ये पल्लवो के पूर्वज थे । नवी शताब्दी के शिला- लेख से प्रकट होता है । उत्तरी आरकट से इसका शिलालेख मिला है । उसके अनुसार विरूपाक्ष ने एक नागी से विवाह किया था । उसमें उसे राजचिन्ह मिला । तत्पश्चात् स्कन्द शिव आए । नाग जाति के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है। विश्व के आदि काल में केंग काग ( शेषनाग ) थे । एक पुरुष तथा स्त्री भी थे । भारतीय गाथा के अनुसार महाप्रलय के पश्चात् शेषशायी विष्णु तथा लक्ष्मी शेष रह जाती है । उक्त पुरुष अम्बर का व्यापार करने के लिए पर्यटन आरम्भ किया। उसकी स्त्री का नाम 'री' था । बच्चा का नाम 'एल' था । एकदिन 'री' जंगल में लकड़ी काटने गयी । उसकी कुल्हाड़ी अकस्मात् नाग पर

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