भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पड़ी । नाग ने कुल्हाड़ी ले ली । री ने अनुनय विनय किया । नाग इस शर्त पर कुल्हाड़ी वापस करने के लिए तैयार हुआ कि री उसके साथ विहार करेगी । री ने शर्त मान ली । उनकी सन्तान नाग जाति कहलाई । कम्बुज में विवाह के समय वर तथा कन्या को राजा तथा नागिन का अभिनय करना पड़ता है । चारों ओर बान्धव बैठते हैं । एक तस्तरी में जलती मोमबत्ती आती है। बैठे लोग एक दूसरे को थाली पास करते हैं । नागिन देवी का गीत गान होता है । दक्षिण तथा मध्य भारत में नाग वंश, नागजाति तथा उनके सबल राज्यों का उल्लेख चौदहवीं शताब्दी तक मिलता है । सेन्द्रक वंश का राज्य बम्बई से मैसूर तक मिले भूखण्ड पर पांचवी शताब्दी से ७ वीं शताब्दी तक फैला था । प्रथम ये कदम्ब तत्पश्चात् पश्चिमी चालुक्य वातापी के नियन्त्रण मे थे । ये अपने को भुजेन्द्र वंशीय कहते थे । दक्षिण में सिन्द का राज्य १० वीं से १२ वीं शताब्दी तक कायम रहा । उनकी तीन शाखाएँ मगल- कोट के सिन्द येलगबर्गी के सिन्द तथा एलपुरम के सिन्द हो गयी थी । मध्यप्रदेश स्थित बस्तर के राजा कश्यप गोत्रीय छिन्दक वंश के नाग जातीय राजा थे । उनकी राजधानी वारसुरू अर्थात् वर्तमान बरसर स्थान है । इस राज्य का सन् १३२४ ई० तक ऐतिहासिक अस्तित्व मिलता है। इसी प्रकार बेल्लारी का नाग वंश तथा जाति प्रसिद्ध हैं ।