भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 845

३८ राजतरंगिणी मटोर कर लिखी गयी है। कृष्ण के समय जबसे कश्मीर का इतिहास प्रारम्भ होता है नाग जाति का प्रभाव राजनैतिक तथा सामाजिक क्षेत्र में पाया जाता है। पुराणो से ज्ञात होता है। नाग वंशी नरेश विदिशा, पद्मावती, मथुरा एवं कांतिपुर में राज्य करते थे। गुप्त वंश के उत्थान के पूर्व एवं कुषाण राज्य के अन्तिम चरण में विभिन्न राजवंशों का शासन उत्तर एवं मध्य भारत में था। दूसरी तथा चौथी शताब्दी के अन्तर्गत नागो का उत्तर भारत में राज्य समृद्धि पर था। वाकाटक एवं गुप्त वंशी अभिलेखों एवं मथुरा के समीपवर्ती भूखण्ड से प्राप्त मुद्राओं के अध्ययन से नाग वंश के राजाओं तथा उनके विभिन्न स्थानों पर प्रकाश पड़ता है। उनसे प्रकट होता है। ईशा पूर्व प्रथम शती से चौथी शताब्दी तक उत्तर भारत में नाग वंश राज्य करता था। वाकाटक के अभि- लेखो में नाग के लिये भारशिव शब्द प्रयुक्त किया गया है। पूना ताम्र पत्र से ज्ञात होता है कि भारत सम्राट् द्वितीय चन्द्रगुप्त के समय नागवंश से सम्बन्ध था। चंपक ताम्र पत्र से ज्ञात होता है कि वाकाटक राजा भारशिव महाराज भव नाग का दौहित्र था। उस लेख से ज्ञात है कि नागराजा भवनाग शिवलिंग को मूर्धा पर रखता था। शिव का भार वहन करने के कारण 'भारशिव' नामकरण हो गया था। नागवंश विदिशा से लेकर कांतिपुर, उत्तरप्रदेश तक शासन करता था। वायु पुराण से प्रकट होता है कि पद्मावती में नव नाग शासन करते थे। मुद्राओ के अभिलेखो से दश नाग राजाओ के काल पर प्रकाश पडता है। उनमे विभु नाग, भीम नाग, देव नाग, व्याघ्र नाग आदि का नाम मुद्राओ से ज्ञात होता है। गणपति तथा नागसेन का नाम प्रयाग के स्तम्भ पर अंकित है। हर्षचरित में भी नागसेन का उल्लेख मिलता है। नागसेन को समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। पद्मावती नाग शाखा का वह अंतिम राजा था। पद्मावती के नाग राजाओ में भव नाग का विस्तृत इतिहास ज्ञात है। उसका राज्य काल सन् ३०५-३४० के मध्य था। उसकी कन्या का विवाह वाकाटक युवराज गौतमौपुत्र से हुआ था। मथुरा में नाग मुद्रायें दो वर्गों की मिली है। राजाओं के नामांत में 'मित्र' शब्द है जैसे गोमित्र, सूर्य्यमित्र, विष्णुमित्रादि। वे मुद्रायें ईशा पूर्व प्रथम शती की है। द्वितीय प्रकार की मुद्राओं पर राजाओं का नामाग्त 'दत्त' शब्द से यथा-पुरुषदत्त, उत्तमदत्त, रामदत्त आदि से होता है। वे मथुरा के शक राजाओं के समकालीन थे। द्वितीय शताब्दी में नाग वंश राजाओं की स्वतन्त्र स्थिति ज्ञात होती है। उनका राज्य बुंदेलखण्ड तथा वाराणसी तक विस्तृत दिखाई देता है। कुषाण राजाओं की अवनति के साथ नाग राजाओं की उन्नति होने लगी थी। प्रथम नाग सम्राट् वीरसेन अन्तिम कुषाण तथा क्षत्री राजाओ को पराजित किया था। उसकी मुद्रायें उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में प्राप्त होती है। मध्य चौथी शताब्दी में गुप्त सम्राट् समुद्रगुप्त ने उत्तरी भारत में नाग राज गणपति नाग तथा नाग- सेन को पराजित किया था। नागो से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने के लिये समुद्रगुप्त ने द्वितीय चन्द्रगुप्त का विवाह नागकन्या कुबेरनाग से किया था। उससे उत्पन्न राजकुमारी प्रभावती गुप्ता का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन से हुआ था। पाँचवी शताब्दी के एक लेख से पता लगता है कि शर्व नाग सम्राट् स्कन्दगुप्त के काल में अतर्वेद के किसी अंचल का सामन्त था। मेरे निवासस्थान दशाश्वमेघ-घाट वाराणसी का नामकरण वाकाटक अभि- लेख से पता चलता है कि नाग भारशिव ने कुषाणों को नष्टकर वहाँ दश अश्वमेघ यज्ञ कराया था।