राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग १३
स्वर्गीय प्रोफेसर श्री बूह्लर को इस प्रकार के शिलालेख खून मूह (खोन मुश) तथा बारहमूला (वाराह क्षेत्र) में मिले थे । उसी प्रकार के शिलालेख स्वर्गीय ओ स्तास्तोंन को विजभ्रोर (विजयेश्वर) यावन (मार्त्तण्ड) तथा अन्य स्थानों पर प्राप्त हुए थे । कल्हण के समय मंदिर, विहार, मठ, देवस्थानादि अपने पूर्व रूप में मौजूद थे, उसे इस स्रोत से यथेष्ट सामग्री इतिहास रचना और विश्रृंखलित कड़ियों को जोड़ने के लिये मिली थी । मैने काश्मीर के खंडित मन्दिरा; देवालयों, विहारों आदि में खूब भ्रमण किया है । शिलालेखों की खोज की । कुछ मिल नही सका । संभव है । वे यहीं भूमि में गड़े पड़े होंगे । (२) पूर्व भूभूत वस्तु—राजा अपने शासन काल में व्यक्ति, मंदिरों, सार्वजनिक स्थानों तथा दान पत्रों के लिये शिलालेखों, ताम्रपत्रों पर अपना नाम, राज्य काल, दान लेने वाले का नाम-पता, दान का प्रयोजन, मंदिर किंवा सार्वजनिक निर्माण- शाला की स्थापना का समय, उद्घाटन, जीर्णोद्धार आदि खुदवाता था । नाम, समय, स्थान, दान का प्रयोजन, कभी-कभी व्यय द्रव्य की संख्या, देवस्थान, मन्दिर एवं सार्वजनिक स्थानों के नाम, उनकी व्यवस्था, जागीर, भूमिदान किंवा अग्रहार दान, आदि लिखवाता था । कभी-कभी अपनी वंशावली के लेख के साथ, शिला, ताम्र किंवा किसी धातु-पत्र, लकड़ी, धनंकृत पट्ट अथवा पट्टिका, गृह-कार्य योग्य वस्तुओं, जैसे बरतन, रजत पात्रादि, पर नामादि गुदवा कर सम्मानार्थ देता था । इसी प्रकार विशिष्ट नागरिक, सामंत, अमात्य तथा अन्य नागरिक अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने नाम, ग्राम, पद के साथ लेख खुदवाते थे, कल्हण इन्हें पूर्व भूभूत वस्तु कहता है । राजतरंगिणी की लेखन-सामग्री में उसने इन लेखो का संग्रह किया था । जिनके कारण राजाओ, उनके सामंतों, तत्कालीन लोगो के काल, स्थान, राज काल, और दान की गई वस्तुओं को देखकर, उस समय की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक स्थिति का पता लगाया जा सकता था । उस समय की कलाकृतियों को देखकर, तत्कालीन कला का प्रकार तथा उसकी लोकप्रियता का अनुमान लगाकर, कल्हण ने इस ग्रन्थ की रचना की है । (३) प्रशस्तिपट्ट—मन्दिरों तथा सार्वजनिक स्थानों में प्रशस्तिपट्ट, राजाओं, विशिष्ट व्यक्तियों तथा स्थानों की स्तुति में लगाया जाता था । तीर्थ, देवस्थान, राजादि के गौरव अथवा सम्मान में काव्य- मय पद्य में स्तुति उत्कीर्ण की जाती थी । प्रशस्ति का मूल स्रोत वैदिक साहित्य है । स्तोत्रों द्वारा प्रशस्ति गीत तथा काव्य दोनो निकले है । स्तोत्रों में देवताओ की प्रशस्ति किंवा स्तुति की जाती है । प्रशस्ति गान से गौरव गान निकला है । पूर्व काल में केवल देवताओ तक यह सीमित था । तत्पश्चात् लौकिक पुरुष विशेष की प्रशस्ति किंवा कीर्ति लिखी और गायी जाने लगी । पहले उन लौकिक पुरुष विशेष तथा मानवों की प्रशस्ति गायी तथा लिखी जाती थी जिन्होंने देवत्व प्राप्त कर लिया था । इस श्रेणी में साधु, महात्मा, योगी एवं आध्या- त्मिक पुरुष थे । अनन्तर राजाओं आदि के प्रशस्ति गीत लिखे और गाये जाने लगे । कालान्तर में राज कवि होने लगे । वे अपने स्वामी की प्रशंसा में प्रशस्ति गीत और काव्य की रचना करने लगे । प्रशस्ति काव्य के कवि राजाश्रित होते थे । आज- कल अभिनन्दन ग्रन्थ देने की प्रथा चल निकली है । यह किसी को भी समर्पण किया जा सकता था । उसमें व्यक्ति विशेष की प्रशस्ति होती है । पट्ट का अर्थ महीन वस्त्र होता है । लिखने की पटिया, धातु पत्र, चर्म-पत्र, भोज-पत्र की होती थी । जिस पर जन्मपत्री के समान किसी राजा अथवा किसी की वंशावली, वंश के कार्यों का उल्लेख, वंश में उत्पन्न हुए लोगों के जन्म तथा मृत्यु की तिथि आदि लिखी जाती थी । पुरोहित, चारण, भाट, बंदी,