भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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१४ राजतरङ्गिणी

[बायाँ स्तम्भ]

सूत के पास पट्टा, मुट्ठे अर्थात् तालिका होती थीं। राजवंशो के पट्ट अलंकृत रखे जाते थे। विशेष पर्वो पर उन्हें निकाला जाता था। उनका पाठ होता था। मिथिला में मैथिल ब्राह्मणो के पास उनके यजमानों की पूरी वंशावली रहती है। ब्राह्मण लोग विवाहादि उसे देखकर ठीक करते हैं। पट्टो के आधार पर वे पता लगा लेते हैं। किस वंश में कितने पुत्र तथा कन्याएँ हैं। उनका गण्य बैठाकर वे विवाह निश्चय करते हैं। ग्रामों में आज भी वह प्रथा प्रचलित है। पाश्चात्य देशो जैसा प्रेम-विवाह भारत मे नगण्य था। आजकल कुछ प्रचलित हो रहा है। सूत, बंदी, भाट, चारण, उत्सव पर उन्हे गाते थे। कुटुंबों में प्रशस्तिपाठ करने की रीति थी। राज्याभिषेक, युद्ध, विजय, के समय उनके पुण्य कार्यों, उनकी वीरता और विशिष्ट कार्यों का गुणगान किया जाता था। इस प्रकार के कवि राजस्थान, गुजरात के राजवंशों से अब भी सबन्धित हैं। उन्हें राजकवि कहा जाता है। उन्हें वाच अथवा वही कहते हैं। भारत की रियासतों, तालुकेदारों तथा बड़े जमींदारों के यहाँ भी कवि रहते थे। वे कविता-पाठ करने के साथ ही साथ वंश का इतिहास कविता मे बना दिया करते थे। मंदिरों तथा कुटुम्बों में चैत्र सुदी प्रतिपदा को इनका पाठ पढ़ा जाता था। कुछ कुटुम्बों में विवाह एवं श्राद्ध के अवसर पर पढ़ा जाता था। मैं भारतीय नव परिवहन मंडल के अध्यक्ष की हैसियत से गुजरात के बंदरगाहो को देखने मई सन् १९६५ ई० में गया था। वड़ौदा संग्रहालय में शिलालेखों पर उत्कीर्ण मुझे प्रशस्ति मिली। देशी राज्यों में भिन्न भिन्न रूप से प्रशस्तियां लिखी जाती थीं। किन्तु उनका विषय वस्तु प्रायः एक ही रहा है।


[दायाँ स्तम्भ]

विजय दशमी, शस्त्रपूजा तथा यात्रा के समय सम्मेलनों अथवा जलूस के आगे आगे उच्च स्वर में चारण, भाट, बंदी, सूत गाते थे। आज भी बारात में आगे आगे ये गाते चलते हैं। बारात में वर और कन्या पक्षों के प्रशस्तिवाचक अपने अपने वंशगौरव की कथा सुनाते हैं। यह प्रथा भारत में प्रायः लोप हो रही है। (४) शास्त्र—कल्हण ने यहाँ पर शास्त्र शब्द का प्रयोग संस्कृत में लिखे ग्रन्थों के लिए किया है। स्वर्गीय प्रोफेसर श्री बूह्लर कल्हण के 'शास्त्र' शब्द का अर्थ धर्मशास्त्र एवं संस्कृत में लिखे गया,-विधि पुस्तको से केवल नहीं लगाते। उनका मत है। शास्त्र शब्द के अन्दर संस्कृत के उन सभी ग्रन्थों का समावेश हो जाता है, जिनमें लेखक ग्रन्थ की समाप्ति अर्थात् अन्त में अपना नाम, रचना काल, लिखकर ग्रन्थ को इति लिखता है। हुएनसांग ने अशोक और कनिष्क की बौद्ध परिषदों का उल्लेख करते समय अभिधर्म शास्त्र शब्द का प्रयोग किया है। इसमें निबन्ध तथा सिद्धान्त ग्रन्थो का समावेश हो जाता है। कल्हण ने शास्त्र शब्द का व्यापक अर्थ लगाया है। आज भी संस्कृत में लिखे ग्रन्थों को जनता शास्त्र समझती है। प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणो, जीवनियों, ऐतिहासिक चरित्रचित्रणों, निबंधों, सिद्धान्त ग्रन्थो, जिनमें कुछ भी ऐतिहासिक सामग्री कड़ी जोड़ने के लिए मिल सकती थी, कल्हण ने शास्त्र स्रोत माना है। प्राचीन समय में ग्रन्थ लिखने की एक प्रचलित शैली थी। ग्रन्थ के अन्त, प्रत्येक सर्ग के अन्त, ग्रंथ के आरम्भ में पुस्तक का नाम, अध्याय प्रसंग, लेखक का नाम, किस राजा के काल में और किस समय रचना की गयी है, इसका उल्लेख किया जाता था। कल्हण ने राजाओं का काल निर्णय करने में इस अमूल्य स्रोत का उपयोग किया था। इससे प्रकट होता है। कल्हण ने राजतरंगिणी लिखने के लिए