भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 900, कुल 984 में से

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परिशिष्ट ठ ९३ थे । ( १२ ) गुह्यक लोग यक्षों की एक शाखा थे । ( १३ ) उनका सम्बन्ध भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा तथा पर्वतीय भागों में रहने के कारण असुरों से होना स्वाभाविक था । उनका आचार-विचार प्रारम्भ से ही असुरों से मिलता था । ( १४ ) यक्ष कश्मीर के सीमान्त मेरु के दक्षिण तथा कैलास के पश्चिम अर्थात् कश्मीर की उत्तरी-पूर्वी तथा उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर रहते थे । कल्हण ने यक्षों का विवेचन यहाँ शिल्पी के रूप में किया है । वे सेतु निर्माण करने में निपुण थे । पुराणों में यक्षों को वस्तुपरक माना गया है । कहीं-कहीं उन्हें इतर योनि भी माना गया है । उन्हें आंखों में पड़नेवालों के रूप में भी चित्रित किया गया है । कल्हण ने इन सब कपोल कल्पनाओं को न मानते हुए वास्तविकता का परिचय दिया है । उसने यक्षों को एक जाति के रूप में चित्रित किया है । जिनका मुख्य काम शिल्प था । राज्य में जलाभाव को दूर करने के लिए राजा ने यक्षों द्वारा शासन स्थिर बनाने की योजना बनायी थी । उसका अर्थ बांध बनाना भी माना जाता है । यक्ष राजा दामोदर के समय गुह्यकों के साथ कश्मीर में आबाद थे । गुह्यक और यक्ष दोनों शिल्पी थे । कल्हण ने गुह्यकों का विवरण केवल सेतु निर्माण के सम्बन्ध में किया है और यक्षों का बांध बनाने के सम्बन्ध में किया है । अतएव गुह्यक यदि सेतु बनाने में प्रवीण थे तो यक्ष जलाभाव दूर करने के लिए बांध बनाने में चतुर थे । नीलमत पुराण में यक्षों का उल्लेख निम्न श्लोकों में मिलता है— दनायुषाया वृत्रस्तु भद्रास्तु सुरभेः सुताः । यक्षाश्च राक्षसाश्चैव खसायास्तनयाः स्मृताः ॥ 48 = ७१-७२ × × × देवपत्न्यस्तथा सर्वा देवानां याश्च मातरः । विद्याधरगणा यक्षाः सागरा सरितस्तथा ॥ 152 = २०४ × × × आश्रयानि तथा नद्यश्चक्रस्तीर्थान्यनेकंशः । गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः शैलेन्द्राश्च सगूह्यकाः ॥ 106 = २३९ २४० × × × दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह । वर्जयन्ति च ते मांसं मांसादा दिनपञ्चकम् ॥ 447 = ५५८ × × × वेदोपवेदवेदाङ्गविद्यास्थानानि कृत्स्नशः । नागा यक्षाः पिशाचाश्च तथैव गरुदारुणौ ॥ 586 = ७०७ × × × विद्याधराश्च यक्षाश्च विरमः मत्स्यवर्धनः । मन्द्राशो गजनेत्राश्च कण्टारः कुमुदस्तथा ॥ 922 = १०८८-१०८९

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