राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ राजतरंगिणी तीर्थैर्देवैश्च ऋषिभिर्गन्धर्वैर्यक्षराक्षसैः । अभिगच्छेत मेधावी जन्मसांपद्वयंशालान् ॥ १३८० - १५९८ वात्स्यायन कामसूत्र में यक्षरात्रि का उल्लेख करता है । यशोधर उस पर भाष्य करते यक्षरात्रि को सुख रात्रि कहता है । वर्ष क्रिया कौमुदी, कृत्य तत्त्व, तथा धर्म सिन्धु दीपमाला नाम सुखरात्रि देते हैं । हेम- चन्द्र देशी नाममाला में जक्खरत्ति को दीपावली का समानार्थक मानता है । दीवाली ही दीपावली है । दीपमाला है । यह नीलमत में वर्णित यक्षरात्रि है । नीलमत दीपमाला अर्थात् दीपावली को यक्षरात्रि अभि- हित कर उस दिन यक्षो की पूजा का विधान किया है । वाराणसी क्षेत्र में नगर से दस मील दूर जखिनी ग्राम है । मैने उसपर पहले ध्यान नही दिया । कुछ चलने पर एक मन्दिर मिला । उसमे दखिनी देवी स्थापित थी । जखिनी शब्द यक्षिणी का अपभ्रंश है । कालान्तर में यक्ष लोगों के मूल स्वरूप को लोग भूलकर उन्हें मायाकालीन देवता मानने लगे ।