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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

९४ राजतरंगिणी तीर्थैर्देवैश्च ऋषिभिर्गन्धर्वैर्यक्षराक्षसैः । अभिगच्छेत मेधावी जन्मसांपद्वयंशालान् ॥ १३८० - १५९८ वात्स्यायन कामसूत्र में यक्षरात्रि का उल्लेख करता है । यशोधर उस पर भाष्य करते यक्षरात्रि को सुख रात्रि कहता है । वर्ष क्रिया कौमुदी, कृत्य तत्त्व, तथा धर्म सिन्धु दीपमाला नाम सुखरात्रि देते हैं । हेम- चन्द्र देशी नाममाला में जक्खरत्ति को दीपावली का समानार्थक मानता है । दीवाली ही दीपावली है । दीपमाला है । यह नीलमत में वर्णित यक्षरात्रि है । नीलमत दीपमाला अर्थात् दीपावली को यक्षरात्रि अभि- हित कर उस दिन यक्षो की पूजा का विधान किया है । वाराणसी क्षेत्र में नगर से दस मील दूर जखिनी ग्राम है । मैने उसपर पहले ध्यान नही दिया । कुछ चलने पर एक मन्दिर मिला । उसमे दखिनी देवी स्थापित थी । जखिनी शब्द यक्षिणी का अपभ्रंश है । कालान्तर में यक्ष लोगों के मूल स्वरूप को लोग भूलकर उन्हें मायाकालीन देवता मानने लगे ।

✕ परिशिष्ट 'ङ' पिशाच ( तरंग १ : १८४ पृष्ठ १२५ ) नीलमतपुराण पिशाचों का कश्मीर में निवास बताता है। आज कल पिशाच का अर्थ भूत, प्रेत तथा राक्षस लगाया जाता है । पिशाच शब्द का यह अर्थ भ्रामक है । : नीलमत बालुकार्णव में पिशाचों के निवास का वर्णन करता है। उनके राजा का नाम निकुम्भ था । ✕ : ✕ ✕ ✕ " निकुम्भो नाम धर्मात्मा कुबेरेण तु योजितः । चैत्र्यां याति सदा योद्धं पिशाचैर्बहुभिः सह ॥ 205 = २७८ ✕ ✕ ✕ ✕ पञ्चकोटयः पिशाचानां निकुम्भस्यानुयायिनाम् । गत्वा निकुम्भस्तैः सार्धं षण्मासान् योध्यते सदा ॥ 207 = २७८ ✕ ✕ ✕ ✕ तत्रापि कोटयः पञ्चैव पिशाचानां दुरात्मनाम् ॥ 207 = २८० ✕ ✕ ✕ ✕ निकुम्भः पुनरायाति पञ्चकोटिवृतो बली । शुक्लाश्वयुक्पञ्चदश्यां नित्यं देवप्रसादतः ॥ 201 = २८२ ✕ ✕ ✕ ✕ दत्तेति सहितस्तेन ससैन्येनेह वत्स्यथ । षण्मासान् मानवैः सार्धं निकुम्भो निसंते सदा ॥211 = २८४ ✕ ✕ ✕ ✕ रज्जुबद्धेन तु यथा पक्षिणा नृपदारकाः । कल्पमानाः पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ॥ 327 = ४२७-४२८ ✕ ✕ ✕ ✕ एतस्मिन्नेव काले तु नीलो नागपतिर्विभुः । सेव्यमानो निकुम्बेन पिशाचेन महात्मना ॥ 330 = ४३१ ✕ ✕ ✕ ✕ अश्वयुज्यां निकुम्भस्तु निर्भयमायाति काश्यप । हत्वा पिशाचान् संग्रामे बालुकार्णवगान् बहून् ॥ 376 = ४८३ ४८४ : ✕ ✕ ✕

९६ राजतरंगिणी ततः पूजा निकुम्भस्य कर्तव्या पूजारेण तु । आदित्यपुत्रो रेवन्तः साश्वैः पूज्यश्च मानवैः ॥ ३४२ = ४८९ x x x x तस्मिन्नहनि पूर्णार्द्धे निकुम्भस्यानुयायिनः । आविशन्ति नरान् सर्वान् पिशाचा घोरदर्शनाः ॥ ३१२ = ४९९-५०० x x x x तस्यां विप्र चतुर्दश्यां निकुम्भः शंकरं सदा । संपूजयति धर्मात्मा सानुयात्रो महाबलः ॥ 553 = ९०५-१०६ x x x x पूजनीयो निकुम्भस्तु पिशाचाधिपतिर्बली । पिशाचानां च दातव्या बलयश्च सुसंस्कृताः ॥ 355 = ६०७-१०८ x x x x चैत्रमासि सिते पक्षे पञ्चदश्यां द्विजोत्तम । योद्धुं याति निकुम्भस्तु पिशाचान्वालुकार्णवे ॥ 659 = ७८१ x x x x पिशाचं मृण्मयं कृत्वा काक्षं च द्विजसत्तमः गन्धैर्माल्यैस्तथा वस्त्रैरलङ्कारैश्च पूजयेत् ॥ भक्ष्यैश्च लोपिकापूपैर्मांसैः पानैस्तथैव च ॥ 66 = ७८३-७८४ x x x x निकुम्भे निर्गते ह्यद्य तथा चैवाप्यनागते । षण्मासमध्ये कर्तव्या यात्रा देवगृहे नृपैः ॥ 810 = १०१२-१०१३ x x x x अक्षोटनागपटकश्च श्येनो वह्लिकाध्वरी । क्षीरकुम्भो निकुम्भश्च विकुम्भः समरप्रियः ॥ 953 = ११०१-११०२ वर्णन आता है कि ये ६ मास हिमालय तथा ६ मास शाद्वल अर्थात् हरित भूमि में रहते थे । पिशाच का दैत्यों से सहयोग था । वे ६ योजन लम्बे बालुकार्णव के ओसिस में रहते थे । वर्णन किया गया है कि कुबेर ने पिशाचराज निकुम्भ को उक्त पिशाचों को नियन्त्रण में रखने के लिये आदेश दिया । निकुम्भ अपने पाँच कोटि पिशाचों के साथ उनसे युद्ध करता था । शेष समय वह हिमालय पर निवास करता था । कश्यप के शाप के कारण पिशाच ६ मास तक कश्मीर उपत्यका में निवास करते थे । चारों युगों के बीत जाने के पश्चात् वे कश्मीर उपत्यका से उत्पाटित हो गये और यहां नाग तथा मानव निवास करने लगे । हिमाचले तु षण्मासान् स सदा वसते सुखी । नी० ११० = २८३ नानादेशसमुत्थैस्तु ततः प्रभृति मानवैः । षण्मासान् वसते देशः षण्मासान् पिशिताशनैः । नी० २२७ = ३०२-३०३ राजतरंगिणी (४ : ७१०) में आश्वयुज का उल्लेख कल्हण ने किया है । पूर्णमासी के दिन करता

परिशिष्ट ङ ९७ हैं। नीलमत में इस दिन के सम्बन्ध में एक प्रथा मिलती है। इस दिन लोग एक दूसरे पर कीचड़ फेंककर परिहास उत्सव मनाते थे कि पिशाच भय से भाग जाय। क्योंकि पिशाच इस दिन मानव घर में प्रवेश करना चाहता है। यह प्रथा लोग भूल गये हैं। लोप हो गयी है। कल्हण ने अश्वाज गाली प्रथा का उल्लेख (७ : १५५१) में किया है। अलबेरूनी ने एक प्रथा का उल्लेख किया है। इसको 'पुहपो' कहते थे। उस दिन लोग परस्पर परिहास करते थे। पशुओं से खेलते थे। श्री स्टीन ने प्रकट किया है। 'पुहपो' शायद पिशाच का अपभ्रंश बन गया है। ऋग्वेद में पिशाची शब्द का उल्लेख एक बार किया गया है। अथर्व वेद में पिशाच शब्द का उल्लेख प्रेत के अर्थ में किया गया है। उसे मानव शत्रु रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया है। (२:१८:१-५; २:१८:४; ४२०:६-९; ४: ३६ : ४; ४ : ३७ : १०; ५: २९: ४, ५, १४; ६ : ३२: २; ८ : २ : १२; १२ : १ : ५०) अथर्व वेद (१ : २५ : ९) में पिशाचों को मांस भोजी बताया गया है। गोपाद ब्राह्मण ( : १: १ : १०) में पिशाचों के सम्बन्ध में पिशाच वेद तथा आश्वलायन श्रौत सूत्र (१० : ७:६) में पिशाच विद्या का उल्लेख है। उन्हें किमिदिन तथा यातुधान अथर्व वेद में कहा गया है। तैत्तिरीय संहिता में वर्णन मिलता है। पिशाचों का उल्लेख असुरों तथा राक्षसों के साथ किया गया है। काठक संहिता (२७ : २४) में भी इसी प्रकार उल्लेख मिलता है। उन्हें देवों, मनुष्यों तथा पितरों का विरोधी बताया गया है। देवा मनुष्याः पितरस्तेऽन्यत आसन्न सुर । रक्षांसि पिशाचास्तेऽन्यतः । — तैत्तिरीय संहिता काण्ड २ प्रपाठक ४ अनुवाक १ जैमिनी ब्राह्मण में पिशाच को स्पष्ट मानव रूप की संज्ञा दी गयी है। इक्ष्वाकु राजा त्रयारुण की माता पिशाच कन्या थी। पिशाची वा इयं त्र्यारुणस्य जाया। यही बात पंचविंश ब्राह्मण तथा शातायन ब्राह्मण में मिलती है। बृहद्देवता में उन्हें मानव माना गया है। ये आर्यों के साथ विवाह सम्बन्ध करते थे : अविन्दन्त पिशाची तां जाया तस्य च भूपतेः। ५:१० पिशाचीमदहत्त्वां स यत्र चोपविवेश ॥ ५:२२ पुराणों में पिशाच वर्णन मिलता है। उन्हें राक्षस गन्धर्व और नाग जाति के साथ रखा गया है। ब्रह्माण्ड पुराण में उनके रूप तथा चरित्र का वर्णन किया गया है : कपिशायाञ्च कूष्माण्डाज्जज्ञिरे च पुनः पुनः । मिथुनेन पिशाचांश्च वर्णेन कपिशेन तु ॥ कपिशत्वात् पिशाचास्ते सर्वे च पिशिताशना.। युग्मानि षोडशाद्यानि चक्ष्मानस्तदन्यः ॥ (ब्रह्माण्डपुराण : ३ : ७ : ३, ४५) मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराण में नदियों के उल्लेख के। समय एक 'पिशाचिका' नदी का भी उल्लेख आया है। यह नदी कहां थी अभी निश्चय नहीं हो सका है। राक्षस, गन्धर्व, दैत्य एवं १३

५८ राजतरंगिणी पिशाच एक वर्ग के माने जाते थे । उनमें तथा आर्य मानव में मुख्य भेद उनके रहन-सहन तथा व्यवहार में था । पिशाच जाति घुमन्तू जाति थी । उसका कोई निश्चित स्थान नही था । वे पशुओ के खाल पहनते थे । उनके केश लम्बे होते थे । वे खानाबदोश पर्वतीय जाति थे । उनके आचरण के विषय में ब्रह्माण्ड पुराण में उल्लेख मिलता है । हीना देवैस्त्रिभिः पादैर्गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः । गन्धर्वैस्त्र्यस्त्रिभिः पादैर्हीना गुह्यकराक्षसाः । ऐश्वर्यहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः । एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ।। ( ३ : ७ : १६७-१६८ ) पिशाचों ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था । पिशाचा दरदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह । मद्रका लडकाश्चैव सगणाः परतंगणाः । बाह्लिकाश्चिनिराश्चैव चोलाः पाण्ड्याश्च भारत । एते जनपदा राजन् दक्षिणं पक्षमाश्रिता ।। ६ : ५६ : ४९-५० । राजा दुर्योधन के पक्ष में पिशाच थे । त्रीणि सादिसहस्राणि दुर्योधनपुरोगमाः । शकाः काम्बोजबाह्लीका यवनाः पारदास्तथा । कुणिन्दास्तंगणाश्चैवाः पैशाचाश्च समन्दराः । अभ्यद्रवन्त शैनेयं शलभाः पावकं यथा । युक्ताश्च पर्वतीयानां रथाः पाषाणयोधिनाम् । शूरा पञ्चशते राज्ञा शैनेयं समुपाद्रवन् ।। ८ : ९० : १३ : १५ । द्वितीये दिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवो युधि । आसुरानकरोद् व्यूहान् पैशाचानथ राक्षसान् ।। ६ : १०४-११८ । प्रश्न उत्पन्न होता है । पिशाचों का जन्म स्थान तथा उनका प्रदेश कहाँ था । उनके निवास स्थान और जन्म भूमि के विषय में यथेष्ट प्रमाण प्राप्त हैं । उनसे उनके देश किंवा प्रदेश का निश्चित रूप प्रकट हो जाता है । वायु पुराण पिशाचों का स्थान मेरु पर्वत के दक्षिण दिशाचक्र निश्चित करता है : उनका सम्बन्ध कुबेर से स्थापित किया गया है । तामेरू, फारमोरक औरमिक के साथ पिशाचों का उल्लेख इसे प्रमाणित करता है कि ये इन्हीं क्षेत्रों के समीप के रहने वाले थे । एष शृंगो महा... गन्धर्वैर्पिशाचकाः । यक्षशैलोऽथ वै... । इत्येते देवचरिता... । दिक्पाला दक्षिणे .. ।। वायु पुराण ।

परिशिष्ट ड ९९ पिशाचके गिरिवरे हर्म्यप्रासादमण्डितम् । यक्षगन्धर्वचरितं कुबेरभवनं महत् ॥ वायु० ३९ : ५० मत्स्य पुराण भी महाभारत के समान पिशाचों का स्थान हिमवत् अर्थात् हिमालय मानता है । महा- भारत उन्हें पंजाब तथा उत्तरीय हिमालय का निवासी मानता है । रक्षःपिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमवतस्तु ते । ११४ : ८२ मत्स्य पुराण पिशाचों को कश्यप एवं कद्रू की सन्तान मानता है । ( मत्स्य १७१ : ६१ ) पाणिनि सूत्र के परिशिष्ट गण पाठ में अन्य ग्यारह जातियों के साथ पिशाचों का उल्लेख किया गया है । एक मत है कि राक्षस लोग उत्तरी बलूचिस्तान के चगायी जिला के रहने वाले राशनीस है । भरूत जाति इसी प्रकार बन्नू जिले की तहसील मरावत के निवासी थे । अशनी तथा कर्पपाण जातियाँ शिनिवारी तथा करशबुन पूर्वीय हिन्दुकुश क्षेत्र की रहने वाली कही गयी हैं । ब्रह्माण्ड पुराण तथा वायु पुराण क्रोधा की कन्या कपिशा का उल्लेख करता है । उसका अपर नाम क्रोधवशा है । वह पुलह की पत्नी थी । उसी की सन्तान पिशाच हैं । पिशाचों का स्थान ब्रह्माण्ड पुराण भी हैमवत मानता है । पिशाचों के सोलह गणों का वर्णन मिलता है । किन्तु उनका वर्णन काल्पनिक प्रतीत होता है । ( ब्रह्माण्ड ३ ७:३८१ ) उनके आकृति वर्णन से वे पर्वतीय प्रतीत होते हैं । ( वायु : ५९ : २९२-९६ ) पुराणों में राक्षस, दैत्य, गन्धर्व, नाग जातियों के साथ उनका उल्लेख किया गया है ( मत्स्य: १५२ : ८ ) वे राक्षसों से हीन श्रेणी के धन, सौन्दर्य, आदि में कहे गये हैं । ( ब्रह्माण्ड : ३ ७ १६७-१६८ ) महाभारत उनके स्थान के विषय में कहता है कि पिशाच लोग सरस्वती तट पर तपस्या निमित्त ठहर गये । यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशांपते । एते चान्ये च बहवो योगसिद्धाः सहस्रशः । तस्मिंस्तीर्थे सरस्वत्याः शिवे पुण्ये वत्तियः । महाभारत युद्ध में पिशाच कौरव तथा पाण्डव दोनों के पक्षो से युद्ध किये थे । उनके एक युद्ध का नामकरण उन्हीं के नामपर हुआ था । उनके विवाह प्रथा की महाभारत ने निन्दा की है । उनके धार्मिक कर्म काण्ड की भी निन्दा की गयी है जिसमें जीवित प्राणियों का वध किया जाता था । कुछ पिशाचों ने सरस्वती के तटपर तपस्या कर हिंसक प्रवृत्ति का त्याग किया था । महाभारत से प्रतीत होता है कि वे पंजाब तथा उत्तरी हिमालय क्षेत्र में रहते थे । पिशाचों के साथ महाभारत में वर्णित सभी जातियों का ऐतिहासिक अस्तित्व ऐतिहासिकों ने मान लिया है । कोई कारण नहीं प्रतीत होता कि पिशाचों को भी क्यों न ऐतिहासिक जाति माना जाय । पिशाचों के साथ दरद, पुण्ड्र, तंगण, परतंगण, बाह्लीक, चोल, पाण्ड्य, शक, कम्बोज, यवन, पारद, कुनिन्द, अम्बष्ठ आदि जातियों का उल्लेख मिलता है । राजतरंगिणी ( ५ : ४६९ ) में उल्लेख मिलता है कि उनके नाम पर पिशाचपुर स्थान था निस्सन्देह उक्त स्थान पर पिशाचों की प्रचुर आबादी रही होगी । उक्त प्रमाणों से निश्चय होता है कि ये मेरु पर्वत के दक्षिण में रहते थे। उनका निवास स्थान हिमालय पर्वतीय खण्ड था। ब्रह्माण्ड पुराणसे पता चलता है कि पिशाचक पर्वत मेरु के दक्षिण में है। मेरु वर्तमान पामीर

१०० राजतरंगिणी है। कश्मीर का पुराण इस दिशा का नीलमत है। अतएव उसमें वहां के रहने वाले पिशाचों का अत्यधिक मौलिक वर्णन होना स्वाभाविक है। इसलिये नीलमत के पिशाच मानव थे।' अन्य प्रमाणों ने उन्हें गाथा कालीन तथा काल्पनिक व्यक्ति अनभिज्ञता के कारण बना दिया है। मेरु पर्वत के विषय में तीन पर्वतों का नाम लिया जाता है। वर्तमान पामीर पर्वत, अफगानिस्तान का मरव पहाड़ी प्रदेश तथा उत्तरी ध्रुव । मरुत को मरवत कहते हैं। यह जिला बन्नू में मरवत तहसील है। हिन्दुकुश के पूर्वीय भाग में मरुत जाति का रहना कहा जाता है। मरवत तहसील की मरवत जाति प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित मरुत जाति है। राक्षसों का निवास स्थान धड़की जिला बलूचिस्तान की उत्तर दिशा में था। उत्तरी बलूचिस्तान में रक्षानी एक बड़ा कबीला है। प्राचीन राक्षस वंश की संतानें हैं। कपिशा पिशाचों की मातृ-भूमि कही जाती है। काफिरिस्तान तथा उसके समीपवर्ती देश में उनके निवास का वर्णन मिलता है। यशई काफिरिस्तान का एक कबीला है। यशई शब्द पिशाच का अपभ्रंश मालूम होता है। पंजाब के वाहीक पिशाचों के वंशज माने जाते हैं। मिलिन्द पन्ह से भी प्रकट होता है कि पिशाचों का निवास स्थान गान्धार कश्मीर उत्तर-पश्चिम भारत था। उनके निवास स्थान के विषय में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उत्तर कुरु, हिमवन्त, काश्मीर, पंजाब, काफिरिस्तान, पामीर पर्वत के दक्षिण तथा पूर्वीय हिन्दूकुश पर्वत माला में रहते थे। पिशाच मानव थे। सुर तथा असुर योनियों में पिशाच जाति को 'देवयोनयः' अमर कोशकार ने माना है । विद्याधराप्सरो - यक्ष - रक्षो - गन्धर्व - किन्नराः । पिशाचो गुह्यको सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः । अमरकोश १ : १ : ११ देवताओं की जाति के १० भेद माने गये हैं। वे हैं— ( १ ) विद्याधर, ( २ ) अप्सरस्, ( ३ ) यक्ष, ( ४ ) रक्षस्, ( ५ ) गन्धर्व, ( ६ ) किन्नर, ( ७ ) पिशाच, ( ८ ) गुह्यक, ( ९ ) सिद्ध, ( १० ) भूत । असुरों के १० भेद माने गये हैं : असुरा दैत्य-दैतेय-दनुजेन्द्रारि-दानवाः । शुक्रशिष्या दितिसुताः पूर्वदेवाः सुरद्विषः । अमरकोश १:१:१२ ( १ ) असुर, ( २ ) दैत्य, ( ३ ) दैतेय, ( ४ ) दनुज, ( ५ ) इन्द्रारि, ( ६ ) दानव, ( ७ ) शुक्रशिष्य, ( ८ ) दितिसुत, पूर्व देव, ( १० ) सुरद्विप । पिशाचों को असुर वर्ग में नहीं मानकर उन्हें देव वर्ग में रखा गया है। प्रश्न उपस्थित होता है। मानव मे पिशाच लोग हीन क्यों माने जाने लगे । ( १ ) पिशाच लोगों की विवाह प्रथा तिरस्कृत मानी गयी है। उसे दूषित कहा गया है। आठ प्रकार के विवाह—ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, तथा पिशाच—स्मृतियों ने माना

परिशिष्ट ङ १०१ हैं। प्रथम चार प्रकार के विवाह विहित तथा शेष चार अविहित माने गये हैं। पिशाच विवाह अत्यन्त हीन तथा निकृष्ट कहा गया है। पति धोखा द्वारा कन्या को प्राप्त कर लेता है। कन्या को धोखा देकर विवाह करना सभी अवस्थाओं में अनुचित माना गया है। पिशाच विवाह की परिभाषा महाभारत आदि पर्व (७३:९-१२) में दी गयी है। कन्या को चुरा कर विवाह कर लेना पिशाच विवाह कहा गया है। · स्कन्द पुराण के विवाह संस्कार अध्याय बलपूर्वक कन्या का अपहरण कर विवाह करना पिशाच विवाह माना गया है। ब्रह्माण्ड पुराण कहता है : हीना देवा स्त्रिभिः पादै गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः । गन्धर्वैभ्यस्त्रिभिः पादैर्हीना गुह्यकराक्षसाः । ऐश्वर्यैहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः । एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ॥ ३·७·१६७-१६८ · आधुनिक लमगान प्राचीन लम्पक के पड़ोसी पश्राई काफिर रहते थे। पिशाच भूमि कफ़रिस्तान में कुछ समय पूर्व तक कन्या भगा ले जाकर विवाह करना प्रचलित था। वे विवाह में अश्लील शब्दों का प्रयोग करते थे। तोरणों को तोड़ देते थे। उनके इन चरित्रों के कारण आर्य होते हुए भी शेष आर्यों ने उन्हें पिशाच की संज्ञा दी। मैने पर्यटकों द्वारा लिखित उन्नीसवीं तथा बीसवी शताब्दी के प्रथम दशक की सचित्र पुस्तकें देखी है। उनमें काफ़रिस्तान तथा चित्रराल के रहने वालो की तस्वीरे हैं। उनके रूप विचित्र है। लम्बे-लम्बे बाल हैं। वस्त्र मैला है। निसंदेह यह लोग प्राचीन पिशाचों की संतान है। श्री एम. सी. दास का कहना है कि तिब्बत में अनेक स्थानों पर लड़कियोँ को पकड़कर विवाह करने की प्रथा प्रचलित थी। (एम. सी. दास जे. एम. एस. बी ४२.९ (२) पैशाची भाषा में पुत्र वधू को 'हनेवे' कहते है। उसका शाब्दिक अर्थ होता है मारखाने वाली औरत। महाभारत उन्हें न करने योग्य कामो को करने वाला कहता है। विहित कर्म यज्ञ पिशाच नहीं करते थे। पैशाचश्चासुरंश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन । १३:२४१२; १:२९९५ (३) पिशाचों को पितरों का विरोधी बताया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि वे पितरों का श्राद्धादि कर्म नही करते थे। अपितु श्राद्धों को नष्ट करते थे। · (४) पिशाच लोग युद्ध में शत्रुओं का रक्त पीते थे। उन्हें नरमास भक्षी कहा गया है। शत्रुओ के रक्त पीने की प्रथा तिब्बत में भी किसी समय प्रचलित थी। पिशाचों का देश तिब्बत की सीमा पर था अत- एव यह प्रथा तिब्बत के प्रभाव के कारण पिशाचों अथवा पिशाचों के प्रभाव के कारण तिब्बत में प्रचलित हो गयी थी। भारतीय आर्य इस प्रथा को अत्यन्त घृणित मानते थे। पिशाच कच्चा मास खाते थे। सीमान्त प्रदेश के दरदिस्तान तथा चित्राल पिशाचों का स्थान थे। वे कच्चा मांस खाते थे। डाक्टर लीतनर का कहना है। दो काफ़िरिस्तान के काफिरों ने स्वीकार किया था कि उनकं वहाँ यह रिवाज था कि शत्रु को मारकर उनका वे रक्त पीते थे। (ओ. डब्लू. लोतनर : लैगुवेज एण्ड रेसेस आफ दर्पिस्त ।) (५) उनका यौन सम्बन्ध अनुचित होता था। · (६) पिशाच भाषा आर्य भाषा थी। महाकवि गुणाढ्य ने पैशाची भाषा में वृहत्कथा की रचना की थी। कश्मीरी महाकवि सोमदेव भट्ट ने उसे संस्कृत में कथासरित्सागर के नाम से लिखा है। · · ·

१०० राजतरंगिणी है। वश्मीर का पुराना ढंग दिशा का नौलम्त है। अतएव उनमें बसने वाले पिशाचों का अलौकिक मौलिक वर्णन होना स्वाभाविक है। इसलिये नीलमत में पिशाच मानव थे। अन्य ग्रन्थों में उन्हें माया कालीन तथा काल्पनिक व्यक्ति अनभिज्ञता के कारण बना दिया है। मेरु पर्वत के विषय में तीन पर्वतों का नाम लिया जाता है। वर्तमान पामीर गांठ, अफगानिस्तान का मरव पहाड़ी प्रदेश तथा उत्तरी ध्रुव । मरुत् को मरवत कहते हैं। यह जिला यलू में मरवत तहसील है। हिन्दुकुश के पूर्वीय भाग में गरुत्त जाति का रहना कहा जाता है। मरवत तहसील की मरवत जाति प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित मरुत्त जाति है । राक्षसों का निवास स्थान पषूफी जिला बलुचिस्तान की उत्तर दिशा में था। इसही बलूचिस्तान में रक्षासो एक बड़ा कबीला है। प्राचीन राक्षस वंश की संतानें हैं। कपिशा पिशाचों की मातृ-भूमि कही जाती है। काफिरिस्तान तथा उसके समीपवर्ती देश में उनके निवास का वर्णन मिलता है। यश्र्कई काफिरिस्तान का एक कबीला है। यश्र्कई शब्द पिशाच का अपभ्रंश मालूम होता है। पंजाब के वाह्लीक पिशाचो के वंशज माने जाते हैं। मिलिन्द पन्ह से भी प्रकट होता है कि पिशाचों का निवास स्थान गन्धार कश्मीर उत्तर-पश्चिम भारत था। उनके निवास स्थान के विषय में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उत्तर कुरु, हिमरन्त, काश्मीर, पंजाब, काफिरिस्तान, पामीर पर्वत के दक्षिण तथा पूर्वीय हिन्दुकुश पर्वत माला में रहते थे । पिशाच मानव थे। सुर तथा असुर योनियों में पिशाच जाति को 'देवयोनयः' अमर कोषकार ने माना है। विद्याधराप्सरो - यक्ष - रक्षो - गन्धर्व - किन्नराः । पिशाचो गुह्यको सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः । अमरकोश १ : १ : ११ देवताओं की जाति के १० भेद माने गये हैं। ये हैं- (१) विद्याधर, (२) अप्सरस्, (३) यक्ष, (४) रक्षस्, (५) गन्धर्व, (६) किन्नर, (७) पिशाच, (८) गुह्यक, (९) सिद्ध, (१०) भूत । असुरों के १० भेद माने गये हैं : असुरा दैत्य-दैतेय-दनुजेन्द्रारि-दानवाः । शुक्रशिष्या दितिसुताः पूर्वदेवाः सुरद्विषः । अमरकोश १:१:१२ (१) असुर, (२) दैत्य, (३) दैतेय, (४) दनुज, (५) इन्द्रारि, (६) दानव, (७) शुक्रशिष्य, (८) दितिसुत, पूर्व देव, (१०) सुरद्विष । पिशाचो को असुर वर्ग में नही मानकर उन्हें देव वर्ग में रखा गया है। प्रश्न उपस्थित होता है। मानव से पिशाच लोग हीन क्यों माने जाने लगे । (१) पिशाच लोगों की विवाह प्रथा तिरस्कृत मानी गयी है। उसे दूषित कहा गया है। आठ प्रकार के विवाह-ब्रह्म, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, तथा पिशाच-स्मृतियों ने माना

परिशिष्ट ङ १०१ हैं। प्रथम चार प्रकार के विवाह विहित तथा शेष चार अविहित माने गये हैं। पिशाच विवाह अत्यन्त हीन तथा निकृष्ट कहा गया है। पति धोखा द्वारा कन्या को प्राप्त कर लेता है। कन्या को धोखा देकर विवाह करना सभी अवस्थाओं में अनुचित माना गया है। पिशाच विवाह की परिभाषा महाभारत आदि पर्व (७३:९-१२) में दी गयी है। कन्या को चुरा कर विवाह कर लेना पिशाच विवाह कहा गया है। स्कन्द पुराण के विवाह संस्कार अध्याय बलपूर्वक कन्या का अपहरण कर विवाह करना पिशाच विवाह माना गया है। ब्रह्माण्ड पुराण कहता है : हीना देवा स्त्रिभिः पादै गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः । गन्धर्वेभ्यस्त्रिभिः पादैहींना गुह्यकराक्षसाः । ऐश्वर्यहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः । एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ॥ ३:७:१६७-१६८ आधुनिक लमगान प्राचीन लम्पक के पड़ोसी पसाई काफिर रहते थे। पिशाच भूमि कफरिस्तान में कुछ समय पूर्व तक कन्या भगा ले जाकर विवाह करना प्रचलित था। ये विवाह में अश्लील शब्दों का प्रयोग करते थे। तोरणों को तोड़ देते थे। उनके इन चरित्रों के कारण आर्य होते हुए भी शेष आर्यों ने उन्हें पिशाच की संज्ञा दी। मैंने पर्यटकों द्वारा लिखित उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक की सचित्र पुस्तकें देखी हैं। उनमे काफ़रिस्तान तथा चित्राल के रहने वालों की तस्वीरे हैं। उनके रूप विचित्र हैं। लम्बे-लम्बे बाल हैं। वस्त्र मैला है। निसंदेह यह लोग प्राचीन पिशाचों की संतान है। श्री एम. सी. दास का कहना है कि तिब्बत में अनेक स्थानों पर लड़कियों को पकड़कर विवाह करने की प्रथा प्रचलित थी। (एम. सी. दास जे. एम. एस. बी ४२ ९ (२) पैशाची भाषा में पुत्र वधू को 'हुनेवे' कहते हैं। उसका शाब्दिक अर्थ होता है मारखाने वाली औरत। महाभारत उन्हें न करने योग्य कामों को करने वाला कहता है। विहित कर्म यज्ञ पिशाच नहीं करते थे। पैशाचश्चासुराश्चैव न कर्तव्या कदाचन । १३:२४१२; १:२९१५ (३) पिशाचों को पितरों का विरोधी बताया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि वे पितरों का श्राद्धादि कर्म नहीं करते थे। अपितु श्राद्धो को नष्ट करते थे। (४) पिशाच लोग युद्ध में शत्रुओं का रक्त पीते थे। उन्हें नरमांस भक्षी कहा गया है। शत्रुओं के रक्त पीने की प्रथा तिब्बत में भी किसी समय प्रचलित थी। पिशाचों का देश तिब्बत की सीमा पर था अत- एव यह प्रथा तिब्बत के प्रभाव के कारण पिशाचों अथवा पिशाचों के प्रभाव के कारण तिब्बत में प्रवृत्तित हो गयी थी। भारतीय आर्य इस प्रथा को अत्यन्त घृणित मानते थे। पिशाच कच्चा मांस खाते थे। कौलन्द प्रदेश के दरदिस्तान तथा चित्राल पिशाचों का स्थान थे। ये कच्चा मांस खाते थे। डाक्टर लीटनर का कहना है। दो काफ़िरिस्तान के काफिरों ने स्वीकार किया था कि उनके यहां यह रिवाज था कि शत्रु को मारकर उनका ये रक्त पीते थे। (जो. डब्लू. लोतनर : लेंगुवेज एण्ड रेसेज आफ़ डार्डिस्टैन्ड ।) (५) उनका यौन सम्बन्ध अनुचित होता था। (६) पिशाच भाषा आर्य भाषा थी। महाकवि गुणाढ्य ने पैशाची भाषा में वृहत्कथा की रचना की थी। कश्मीरी महाकवि सोमदेव भट्ट ने उसे संस्कृत में कथासरित्सागर के नाम से लिखा है।

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ११ भाषाओं की मूल पैशाची भाषा थी । प्राकृत भाषा के वैयाकरणों ने पैशाची को भूत भाषा कहा है । पैशाची भाषा की गणना संस्कृत तथा पाली भाषाओं से किया है । षड् भाषा चन्द्रिका तथा शेषकृष्ण की प्राकृत चन्द्रिका में एकादश भेद बताये गये हैं । प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा तुल्य पैशाची भाषा की कवियों ने प्रशंसा की है । राजशेखर ने सारस्वतेय पुरुष का वर्णन काव्य मीमांसा में किया है और शरीर की तुलना निम्न- लिखित रूपक के साथ किया है : शब्दार्थ—शरीर संस्कृत—मुख प्राकृत—बाहु अपभ्रंश—जघन पैशाची—पाद चातुर्वर्ण का वर्णन करते हुए उपमा दिया है कि ब्राह्मण मुख, क्षत्री बाहु, वैश्य उदर तथा शूद्र पाद है उसी प्रकार राजशेखर ने संस्कृत की ब्राह्मण, प्राकृत की क्षत्री, अपभ्रंश की वैश्य तथा पैशाची की शूद्र से उपमा दी है । संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ तथा पैशाची को निम्नकोटि की भाषा में रखा है । उक्त चारों भाषाओं को एक ही शरीर का विभिन्न अंग माना है । इस शरीर की आत्मा मूल आर्य वैदिक भाषा है । अहो श्लाघनीयासि शब्दार्थो ते शरीरं संस्कृतं मुखं । प्राकृतं बाहू, जघनं अपभ्रंशः पैशाचं पादौ ॥ भाषा का प्रयोजन अन्तर भावना को अभिव्यक्ति करना है । भाषा विचार का पात्र मात्र है । भाषा प्रयो- जन मानव विचार को समझना है । एक ही अर्थ विभिन्न भाषाओं में विभिन्न उच्चारणों द्वारा प्रकट किये जाते हैं । उनका कार्य मानसिक भावना, विचार तथा प्रयोजन को प्रकट करना है । शरीर की उपमा शब्दार्थ से इसीलिए दी गयी है । शब्द किसी भाषा किसी लिपि में लिखा जाकर अर्थ का द्योतक होता है । अतएव, राजशेखर ने शब्दार्थ को शरीर माना है । पैशाची भाषा को सरल भाषा की कोटि में रखा है । 'सुभव्योऽपभ्रंशः सरलरचनं भूतवचनम् ।' इसी प्रकार गुणाढ्य कृत वृहत्कथा की भाषा के विषय में कहा गया है—भूतभाषामयी प्राहुरद्भुता तां वृहत्कथाम् ।' मूलग्रन्थ इस समय उपलब्ध नहीं है । इसकी निकटवर्ती पस्तो तथा दरद भाषायें हैं । अपभ्रंश कवि 'अब्दुर्रहमान' ने 'संदेह रासक' में पैशाची भाषा की कविता का आदर पूर्ण शब्दों में उल्लेख किया है । अवहट्ठय सक्कय पाइडअम्मि पेसाइ अम्पिभासाए लक्खणछन्दारहणो सुकइत्तं भूतियं जेहि - । भूत शब्द राक्षस तथा पिशाच के साथ जोड़ा गया है । 'भूत वचन' 'भूतभाषित' 'भौतिकी' आदि शब्द पैशाची भाषा के पर्याय स्वरूप वर्णन किये गये हैं । भोजदेव ने उत्तम पात्रों को पैशाची भाषा बोलने का निषेध किया है—'नाद्युत्तमपात्रप्रयोज्या पैशाची । धनिक धनंजय ने 'दशरूपक' में पैशाची को नीच पात्रों द्वारा बोली जाने वाली भाषा कहा है । पिशेल किंवा पिशाच भाषा को जनता द्वारा बोली जाने वाली भाषा कहा गया है । मालूम होता है । पंडित तथा सुसंस्कृत सभ्य समाज की भाषा संस्कृत मानी जाती थी । पश्चिम उत्तर हिमालय पर्वताश्रयी

परिशिष्ट ङ १०३ प्रदेशों में बोलचाल में प्रयुक्त होने वाली ग्रामीण भाषा पैशाची थी । आजकल राष्ट्रभाषा हिन्दी का रूप वह नहीं है जो भोजपुरी, मगधी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के ग्रामों में बोली जाती है । देश के अनुसार भाषा स्थानीय रूप ले लेती है । यह अवस्था मूल वैदिक भाषा की कालान्तर में हो गयी । वह विभिन्न स्थानों में विविध रूप लेकर स्थानीय रंग के साथ रंग पकड़ने लगी । पैशाची भाषा को दरद भाषा भी कहा जाता है। यह उचित ही मालूम पड़ता है । नाग लोग कश्मीर के मूल निवासी थे । पिशाच कश्मीर के उत्तर-पश्चिम से आये थे । दरदिस्तान इस दिशा में पड़ता है । अतएव भाषा का पैशाची से साम्य,होना स्वाभाविक है । पैशाची रूप चूलिका पैशाची है । पांचाल पैशाची तथा शौरसेनी पैशाची है । वररुचि ने प्राकृत प्रकाश में 'प्रकृतिः शौरसेनी' कहा है । शौरसेनी को पैशाची भाषा का आधार माना है । शौरसेनी भाषा ब्रज मण्डल अर्थात् मथुरा के समीपस्थ प्रदेश में बोली जाती थी । आधुनिक खड़ी बोली की एक प्रकार से जनक मानी जाती है । शौरसेन में प्रचलित प्राकृत भाषा संस्कृत की अपभ्रंश के अतिरिक्त और क्या हो सकती है । पैशाची भाषा में संस्कृत शब्दों की बहुलता है । पुरुषोत्तम कहते हैं संस्कृत शौरसेन्यो विकृति :- ( १९: ३) । संस्कृत और शौरसेनी भाषा का प्रकृत रूप पैशाची भाषा है । पैशाची भाषा के अक्षरों के उच्चारण में किंचित् अन्तर हो जाता है । पैशाची भाषा में 'ण' के स्थान पर 'न' का प्रयोग करते हैं । गुण को गुन, गणना को गनना कहते हैं । शुद्ध संस्कृत से पैशाची प्रच- लित हिन्दी के बहुत समीप आ जाती है । संस्कृत के 'इव' के स्थान पर 'यिव' हो जाता है । 'ष' का 'स', 'क' का 'ग', 'च' का 'ज', 'ज्ञ' का 'ञ्ज', उच्चारण होने लगता है । चण्ड ने प्राकृतिक लक्षण में 'ण' के स्थान पर 'न' तथा 'र' के स्थान पर 'ल' होने का प्रयोग किया है । 'अरे' का 'अले', 'र्म' के स्थान पर 'म्म' प्रयुक्त होता है । जैसे 'धर्म' के स्थान पर 'धम्म' । 'गत्वा' के स्थान पर 'गन्तू' पांडित्य के स्थान पर 'पंडितून' । इसी प्रकार 'क्ष' के स्थान पर 'ख' हो जाता है । 'फल' का 'फर' हो जाता है । पिशाचराज निकुम्भ का वर्णन नीलमत पुराण में आता है । उसे कश्मीर के राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन में हाथ बँटाते देखते हैं । पिशाचराज निकुम्भ से तथा चन्द्रदेव ब्राह्मण से सम्बन्ध अच्छा था । मम वाक्यमनादृत्य यस्मादृष्टं प्रभाषथ । तस्मात्पिशाचैः सहिता वत्स्यध्वं नात्र संशयं ॥ 201 = २६७ २६८ × × × तत्र सन्ति पिशाचा ये दैत्यपक्षाः सुदारुणाः । तेषां तु निग्रहार्थाय पिशाचाधिपतिर्बली ॥ 204 = २७७ २७८ × × × तत्र कोट्यश्च पञ्चैव पिशाचानां दुरात्मनाम् । 207 = २८० × × ×

१०४ राजतरंगिणी न पिशाचैस्तु वत्स्यामो दारुणैर्दाह्यप्रियैः । एवं ब्रुवति नागेन्द्रे नीलं विष्णुरभाषत ॥ 213 = २८६ x x x अल्पवीर्या पिशाचाश्च भविष्यन्तीह सर्वदा । वीर्योपेता गमिष्यन्ति षण्मासं यातुज्ञानेवम् ॥ 215 = २८८ x x x पिशाचैः सह संपर्कस्तत्र नित्यं यदा नृणाम् । तदा तेषां मतिः पापात्सततं नापसर्पति ॥ 244 = ३३१ x x x रज्जुबद्धेन तु यथा पक्षिणा नृपदारकाः । कल्पमानाः पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ॥ 327 = ४२८ x x x हिमेन शीतेन तथा पिशाचैः संपीड्यमानो द्विजवृद्धवर्यः । यग्राम तत्रैव विमूढचेता श्रमन्ययौ यत्र स नागराजः ॥ 328 = ४२९ x x x दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह । वर्जनीयं तदा मांसं प्रयत्नादपि काश्यप ॥ 447 = ५५८, ५५७ x x x वेदोपवेदवेदाङ्गविद्यास्थानानि कृत्स्नशः । नागा यक्षाः पिशाचाश्च तथैव गुरुदासणी ॥ 586 = ७०७ x x x पूज्याः पिशाचाश्च तथा बलिपूर्वेण कर्मणा । देशानुसारः कर्तव्यो जनः कार्यः स्वधिष्ठितः ॥ 837 = १०००-१०१० पुराणो में निकुम्भ को इक्ष्वाकुवंशीय हर्यश्व राजा का पुत्र माना गया है । विष्णु पुराण ४ : २ : १३; वायु पुराण ८८ : ६२; भागवतपुराण ६ : ९ : २४-२५; मत्स्य पुराण १२ : ३३; पद्म पुराण : ८ । महाभारत निकुम्भ को प्रह्लाद का तृतीय पुत्र (आदि पर्व ६५ : १९) तथा एक विख्यात दानव (आदि पर्व ६५ : २६) और हिरण्यकश्यप के कुल में उत्पन्न सुन्द उपसुन्द के पिता रूप में चित्रित करता है । (आदि पर्व २०८ : २-३), शल्य पर्व (४५ : ५६) के अनुसार यह स्कन्द का एक सैनिक था । रामायण में निकुम्भ एक राक्षस योद्धा था । इसका वध नील ने किया था । (वाल्मीकीय रामायण युद्ध काण्ड ७३) । निकुम्भ नाम के अनेक व्यक्तियों का उल्लेख पुराणों में आया है । परन्तु इक्ष्वाकुवंशीय

परिशिष्ट ङ १०५ निकुम्भ के स्थलों के अतिरिक्त सभी राक्षसादि वर्ग में रखे गये हैं। कश्मीर के नीलमत पुराण ने उसे पिशाचवंशीय माना है । पिशाच आर्य जाति की एक शाखा है । पर्वतीय प्रदेशो में निवास करती थी । हिन्दुकुश, कपिशा, कफरिस्तान, गान्धार, चितराल, कश्मीर के उत्तर तथा पामीर के दक्षिण बिखरे हुए थे। उनके रूप का वर्णन तथा उनका चित्र पर्यटकों ने उक्त क्षेत्रों के लोगों का उन्नीसवी तथा बीसवी शताब्दी के आरम्भ में लिया है । उसे देखने से स्पष्ट होता है कि वे प्राचीनकालीन पिशाच जाति के वंशज हैं। उनका लम्बा बाल रखना, धर्म के प्रति कम आस्था, स्नानादि से दूर रहना, अश्लील शब्दो का विवाह काल में प्रयोग, कन्या को भगा ले जाकर विवाह कर लेना यह सब बातें कुछ दिन पूर्व तक प्रचलित थी। वे खाल के नमस्तीन आदि पहनते हैं । पोस्तीन अर्थात् भैंड़ों के कोमल बाल वाले खालों के वस्त्र तथा टोपी साधा- रणतया प्रयोग करते हैं । कच्चा मांस पूर्वकाल में खाते थे । घुमन्तू जाति थे। जानवरों को पालना मुख्य उद्यम था। मैं अक्टूवर मास में कश्मीर दो बार इसका अध्ययन करने के लिए गया। मैंने देखा कि नीलमत में वर्णित प्रथा अभी तक चली आती है। बकरियों, भैंड़ों, जानवरों और टट्टुओं पर समस्त गृहस्थी रखे वे शीत ऋतु में पर्वतों से नीचे मैदान में उतरते हैं। उनके बाल लम्बे होते हैं। मुसलमान धर्म स्वीकार कर लेने के कारण उनके पूर्व जीवन में विशेष परिवर्तन हो गया है। परन्तु उनका रहन-सहन, उनका व्यवहार, उनकी भाषा पैशाची से मिलती है । पिशाच जाति आर्यों की शाखा होने पर भी अपने कर्मों के कारण, सभ्य समाज से दूर होने के कारण, शेष भारत से कालान्तर में सम्बन्ध न होने के कारण, दुर्गम शीत प्रधान उपत्यकाओ में रहने के कारण आर्य धर्म पालन में तथा युग के साथ चलने में असमर्थ हो गयी । उनके कर्मों के कारण उनका नाम पिशाच रख दिया गया । वायु पुराण (अ० ९७ : ५५) के अनुसार—ब्रह्मा ने सर्व प्रथम देव, असुर, पित्र तथा प्रजा नामक चार प्रकार की सृष्टि की । स्थावर-चरादि अन्यान्य भूतों को उत्पन्न किया । यक्ष, पिशाच, नर, किन्नर, अप्सरा, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी, पशु, मृग, उरग, अव्यय, व्यय, स्थावर, जंगम आदि समस्त पदार्थों को बनाया । भगवान् शंकर देवी पार्वती के साथ कैलास पर थे। वहां विविध रूप धारण करने वाले नाना प्रकार के भूत, भयंकर मायावी पिशाच, अनेक प्रकार के अस्त्रों से सुसज्जित अग्नि तुल्य दीप्त भगवान् की सेवा कर रहे थे। वायु पुराण (अ० ३१) में देव वंश का वर्णन है। उसमें असुर, सुपर्ण, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, उरग, राक्षस, पित्र तथा नासत्य आठों को देव योनि माना गया है। वायु पुराण (३९:५७) में पिशाच नामक गिरि का वर्णन किया गया है। उस पर कुबेर का भवन है। उसने कोठे तथा छत थे । यक्ष तथा गन्धर्व विचरण करते थे । अध्याय ४२:३१ में पिशाचक पर्वत का वर्णन पुनः अलकनन्दा नदी के प्रसंग मे किया गया है। अलकनन्दा समुद्र की ओर हिमालय से गिरती, बहती जाती है। नदी का रंग इस यात्रा में स्थान भेद से परिवर्तित हो जाता है। वह ताम्राभ से श्वेतोहर, सुमूल, वसुधा, हेमकूट, देवशृंग, शैलश्रेष्ठ पिशाचक, पंचकूट, देव निवास, कैलास के शिखर कन्दरामय पार्श्व देश से बहती; अचलोत्तम हिमालय पर गिरती; शैलो, स्थलों को सींचती, वनों एवं कन्दराओ को आर्द्र करती, दक्षिण समुद्र में गिरती है । १४

१०६ राजतरंगिणी पिशाचों के रंग रूप तथा आचरणों पर वायु पुराण (६९ ∙ २५७-२७९) प्रकाश डालता है— 'पिशाचों का जन्म कपिशा कूष्माण्डी तथा कूष्माण्ड के संयोग से हुआ था। पिशाचों का रंग कपिल अर्थात् भूरा था। कपिश वर्ण होने के कारण उन्हें पिशाच कहा गया। वे मांसाहारी थे। अन्य सोलह पिशाच दम्पति हैं। उनके वंश वर्तमान हैं। ये सब कूष्माण्ड के कुल के हैं। इन कुलों में उत्पन्न होने वाले पिशाच जाति के हैं। 'उनकी आकृति बीभत्स है। निंद्य कर्म करने वाले हैं। उनके शरीर पर बाल होता है। नेत्र गोल होते हैं। दांत तथा नख कड़े होते हैं। अंग टेढ़े-मेढ़े होते हैं। मनुष्य का भक्षण करते हैं। उनका मुख झुका रहता है। 'कूष्माण्डिक जाति के पिशाच को केश नहीं होता। उनके शरीर पर रोमावलियां नहीं दिखाई पड़तीं। चमड़ा, चर्बी आदि वस्त्र की जगह लपेटे रहते हैं। मांस तथा तिल का आहार करते हैं। वक्र जाति के पिशाचों के अंग, हाथ, पैर टेढ़े होते हैं। चलने समय वह टेढ़ीमेढ़ी चाल चलते हैं। वक्रगामी हैं। इच्छानुसार रूप धारण करते हैं। निगुन्दर जाति के पिशाचों की नासिका उठी रहती है। पेट लम्बा होता है। शरीर छोटा होता है। सर छोटा होता है। हाथ छोटा होता है। तिल भक्षण करते हैं। उनके कान सुन्दर होते हैं। अतर्क पिशाच बौने होते हैं। बहुत बोलते हैं। उछल-उछलकर चलते हैं। वृक्षों पर निवास करते हैं। वृक्षों पर ही आहार करते हैं। पांशु पिशाच ऊर्ध्व धातुवारी होते हैं। रोम ऊपर उठे होते हैं। आवास ऊपर उठे होते हैं। अंगों से धूल गिराते चलते हैं। उपवीर पिशाच सूखे होते हैं। मूंछ-दाढ़ी रखते हैं। चीर धारण करते हैं। श्मशानों में निवास करते हैं। उलूखल पिशाचों की आँखें निश्चल होती हैं। उनकी जिह्वा लम्बी होती है। जीभ से ओठ चाटते रहते हैं। हाथी तथा ऊंट की तरह उनका सिर मोटा होता है। विरत तथा समूह बांधकर झुण्ड में चलते हैं। कुम्भपात्र पिशाच विना देखे अन्न का भोजन करते हैं। सूक्ष्म आकृति वाले होते हैं। शरीर पर रोमावली होती है। पीत वर्ण होते हैं। निपुण पिशाचों के मुख कानों तक फैले होते हैं। भौंहें लम्बी होती हैं। नाक मोटी होती है। पूरण पिशाच शून्य भवनों में निवास करते हैं। शरीर मोटा होता है। हाथ-पैर बहुत छोटे होते हैं। बाँह पृथ्वी पर लगी रहती हैं। बालकों का भक्षण करते हैं। सूतिका गृहों का सेवन करते हैं। मासभक्षी पिशाचगण के हाथ-पैर पीछे की ओर झुके रहते हैं। कद छोटा होता है। वायु के समान वेगशाली होते हैं। युद्ध भूमि में रक्त का पान करते हैं। स्तम्बी पिशाच नग्न रहते हैं। खानाबदोश होते हैं। उनके केश लम्बे होते हैं। पिण्डाकार प्रतीत होते हैं। अन्य पिशाचगण उच्छिन्ननासी होते हैं। पिशाचों के रहन-सहन तथा जीविका का उल्लेख वायु पुराण (६९ : २८०-२८८) करता है— 'विभिन्न आकृति एवं गुण-दोष युक्त पिशाचगण अल्प बुद्धि तथा दीन थे। ये प्रातः तथा सायंकाल विचरण किया करते थे। गिरे पड़े, खण्डहरों, जहाँ बहुत कम लोग रहते हैं, जहाँ दुष्ट निवास करते हैं, जो मकान लीपा पोता नहीं जाता, बेमरम्मत रहता है, वहाँ वे निवास करते हैं।

परिशिष्ट ढ १०७ वायु पुराण (१०१-२८) में सर्प, भूत, पिशाच, नाग एवं मनुष्यों को पृथ्वी लोक का निवासी बताया गया है। राजमार्ग, वीथियों, गृह समीपस्थ उपवन, चौराहा, चबूतरा, द्वारदेश, निर्भय अट्टालक, एकान्त आवास, पथ, नदी, तीर्थ, देवी तथा देवताओं के कल्पित निवास, वृक्ष, महापथ अर्थात् स्मशान मार्ग आदि पिशाचो के निवास स्थान हैं। अधार्मिक, वर्णाश्रम, मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले, वर्णसंकर, शिल्पी हैं। देवताओं ने इनके कर्मों की आजीविका पिशाचों के हेतु बनाया है। चोरी, विश्वासघात, कुत्सित साधनों द्वारा धनोपार्जनादि कर्म पिशाचों के कहे गये हैं। मधु, मास, दही, तिल, चूर्ण, मदिरा, आसव, धूप, हरिद्रा, खिचड़ी, तेल, मोघा, गुड़, भात, काला वस्त्र, धूम तथा पुष्पों द्वारा पर्वों की संधियों के अवसर पर पिशाचों को बलि देना चाहिए अर्थात् उक्त खाद्य पदार्थ पिशाचों के प्रिय हैं। पिशाचों का प्रलय काल मे किस प्रकार नाश होगा इसका वर्णन वायु पुराण (११:१५९) में किया गया है। प्रलय काल में महान् संवर्तक की ज्वालाएं सहस्रों, अरबों योजन ऊपर उठती है। गन्धर्वो, पिशाचों एवं राक्षसो के आश्रमों को सर्वशंतः भस्म करने के उपरान्त गोलोक को भी यह भस्म कर देती हैं। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार पिशाच राक्षसो से तीन स्थान निम्न थे अर्थात् राक्षस पिशाचो से तीन स्थान ऊँचे थे। राक्षसों में उतनी आचरण तथा आचारहीनता नही थी जितनी पिशाचों मे थी। (३: ७:३७६-४११; २:३२:१-२; ३५:१९१) पिशाच श्राद्ध तथा पितृ पूजन विरोधी थे। ब्रह्माण्ड पुराण (३:११:८१) में वर्णन मिलता हैं कि ये श्राद्धों को नष्ट करते थे। इसी पुराण (३:७:२:५६) में वर्णन है कि रावण ने पिशाचों को पराजित किया था। पिशाचों के स्वामी शिव कहे गये हैं। ब्रह्माण्ड पुराण (२:३२:१-२, ३५, १९१) में इसका उल्लेख मिलता है। मत्स्य पुराण (८:५) कहता है कि जगत् पितामह ब्रह्मा ने जिस समय सृष्टि की रचना समाप्त की तो पृथ्वी मण्डल राजा पृथु को दिया। उन्होंने किसी न किसी को सबका अधिनायक किंवा स्वामी बनाया। पिशाच, राक्षस, भूत, प्रेत, वैताल तथा यक्षों का अधिनायक किंवा स्वामी शूलपाणि को बनाया। भागवत पुराण (१:१५:४३) में चीर वस्त्र धारण, मौन, केश खोलकर बिखेर लेने की उपमा जड, उन्मत्त पिशाच से दी गयी है। भागवत में विराट रूप का वर्णन ( : ६ : ४३ ) करते हुए प्रेत, पिशाच, भूत, कूष्माण्ड का उल्लेख एक साथ कर उन्हें एक वर्ग में रखा गया है। कूष्माण्ड पिशाचो से अलग नही किन्तु वायु पुराण की तरह पिशाचों की एक शाखा है। (६:८:२५)। यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस को एक ही वर्ग में रखा गया है तथा उन्हें भयावना कहा गया है। (१०:६:२७) डाकिनी, राक्षसी, कूष्माण्ड को बालग्रह कहा गया हैं। वायु पुराण में पिशाचो का वर्णन करते हुए कहा गया है कि ये शिशुओ के शत्रु होते है। उसी के लिये भागवत ने 'बालग्रह' शब्द का व्यवहार किया है। यहाँ भी भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस, विनायक एक ही वर्ग में रखे गये है। भागवत पुराण (१०:८५:४१) में दैत्यराज बलि ने कृष्ण को कहा है—'हम और हमारे समान अन्य दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत, प्रमथनायक आदि आपसे प्रेम करना दूर रहा सर्व दृढ़ वैर भाव रखते हैं।' यहाँ पर बलि ने स्पष्ट कहा है कि पिशाच कृष्ण किंवा विष्णु भक्त नही थे।

१०८ राजतरंगिणी इस मत की पुष्टि भागवत पुराण (१० : ६३ : १०-११) से होती है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने धनुष के तीखे नोकवाले बाणो से शंकर जी के अनुचरों-भूत, प्रेत, प्रमथ, गुह्यक, डाकिनी, यातुधान, बेताल, विनायक, प्रेतगण, मातृगण, पिशाच, कूष्माण्ड एवं वज्रराक्षसों को मार कर खदेड़ दिया था। पिशाच शंकर के अनुचर थे। शंकर की सेना में थे। श्रीकृष्ण तथा शंकर के युद्ध में शंकर के पक्ष से श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया था। भागवत पुराण (१२ ३ : ४०) में कलियुग काल की समानता पिशाचों से करते हुए कहा गया है—'कलियुग में प्रजा शरीर ढँकने के लिए वस्त्र, पेट की ज्वाला शान्त करने के लिए रोटी, तृष्णा तृप्त करने के लिए जल, शयन निमित्त २ हाथ भूमि से भी वंचित हो जाती है। उसे दाम्पत्य जीवन, स्नान, आभूषण, पहनने तक की सुविधा नहीं रहती। लोगों की आकृति प्रकृति तथा चेष्टाएँ पिशाचों के समान हो जाती हैं।' स्कन्द पुराण काशी खण्ड के पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध दो भाग हैं। उत्तरार्द्ध में पिशाच का वर्णन आता है। काशी में पिशाच मोचन तीर्थ है। इसमे पिशाच के सम्बन्ध में एक कथा दी गयी है। यह स्कन्द, कुम्भज तथा पिशाच के प्रश्नोत्तर रूप में है। कर्पटीश्वर में एक तपस्वी थे। वे हेमन्त ऋतु में एक समय कर्पटीश्वर लिंग के समीप पूजा कर रहे थे। उन्हें विमलोदक कर्पटीश्वर सरोवर के तट पर एक भयंकर मूर्ति का दर्शन हुआ। भयंकर मूर्तिधारी पिशाच ने सानुनय तपस्वी से कहा—प्रतिष्ठान नामक एक देश है। मैं यहाँ का तीर्थ पुरोहित था। वृक्ष-जलहीन मरुस्थल में बहुत समय व्यतीत किया। तीर्थों में दान लेने के कारण पिशाच योनि में जन्म हुआ। मैंने मरुभूमि में एक बालक को देखा। मैं उसके शौचहीन, सन्ध्या कर्मविहीन देह में भोगेच्छा के कारण प्रविष्ट हो गया। वही बालक कनकाशा से काशी आया। काशी में पिशाच का प्रवेश नही हो सकता था। मुझे बालक का शरीर त्यागना पड़ा। मैं उस बालक की प्रतीक्षा में काशी के बाहर बैठा था। मैने एक काषायधारी संन्यासी देखा। इच्छा हुई। उसे मारकर अपनी क्षुधा शान्त करूँ। उसने शिव का नामोच्चारण किया। शिव का नाम कान में पड़ते ही मेरे पूर्व संचित पाप धुल गये। मैं काशीपुरी में प्रवेश करने योग्य हो गया। संन्यासी के साथ अन्तर्गृहो की सीमा में पहुँचा। संन्यासी ने भी भीतर प्रवेश किया। मैं यहाँ रुका। तपस्वी ने पिशाच को कर्पटीश्वर तीर्थ म स्नान करने के लिए कहा। उत्तर दिशा जलाधिष्ठाता देव उसको सर्वदा रक्षा करते थे। अतएव वह स्नान करने में असमर्थ हुआ। तपस्वी ने उसे भस्म लगाकर स्नान करने के लिए कहा। भस्म धारण कर पिशाच ने स्नान किया। वह दिव्य देहधारी हो गया। 'उस दिन से उस तीर्थ का नाम पिशाच मोचन तीर्थ हो गया। उसने कहा। यहां स्नान करने से पिशाच योनि छूट जायगी। यहां श्राद्ध करने से पितर उत्तम योनि को प्राप्त होगे। अगहन सुदी चतुर्दशी के दिन पिशाच मोचन में स्नान करने वाले कभी पिशाच योनि को प्राप्त नही होंगे। इस कथा से दो बातें सिद्ध होती हैं। पिशाच से दिव्य मनुष्य हुआ जा सकता है। उसके लिए शिव की आराधना तथा भक्ति आवश्यक है। भस्म धारण करना शैव धर्म का सबसे बड़ा चिह्न है। भस्म धारण करने के पश्चात् अर्थात् शैवमत ग्रहण करते ही पिशाच पापों से मुक्त हो जाता है। उसके लिए अपना आच- रण बदलना आवश्यक होता है। यहां स्नान, नरमांस भक्षण तथा पितृ श्राद्ध तीन बातों पर जोर दिया गया है। पिशाच अफ्रीका की अनेक मानव जातियों की तरह मांस भक्षण करते थे। स्नान न करने के कारण गन्दे रहते थे। तथा पितृ श्राद्ध को नहीं मानते थे। इन तीनों कर्मों के त्याग पर पुनः दिव्य मनुष्य योनि प्राप्त कर

सकते थे। उनका योनि सम्बन्ध भी दूषित था। वे विपरीत मिथुन करने के कारण भी पिशाच माने गये थे जिसका निषेध शास्त्र करता था। यही कारण है कि पिशाच काशी में प्रवेश अपने आचरण के कारण नहीं कर सका। अग्नि पुराण (५१ : १८ ) पिशाचों की प्रतिमा-लक्षण का वर्णन करता है। हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व अध्याय ७९ तथा ८० में पिशाचो के आचार व्यवहार, भाषा तथा जाति का वर्णन है। हरिवंश पुराण में वर्णन मिलता है— पिशाच विकृतानन थे। उनके रोम पिंगल वर्ण थे। जिह्वा दीर्घ थी। महा हनु थे। लम्बा केश थे। विरूपाक्ष थे। ही-ही-ही कहकर बात करते थे। मांस पिटक खाते थे। बहुत रुधिर पीते थे। विशालकाय 'थे। कृशोदर थे। शूलों में मुण्ड धारण किये हुए थे। अपने भुजाओं से यत्र-तत्र शव खींच लाते थे। वे प्राकृत बोलते थे। दांत कटकटाते थे। कुत्तों का झुण्ड उनके साथ रहता था। प्राणियों की हत्या पर तुले रहते थे। ( हरिवंश पुराण भविष्य पर्व ७८ : १-६ तथा १७-१९ ) 'भगवान् श्रीकृष्ण हिमालय स्थित बद्री नारायण के पुण्य क्षेत्र मे थे। उनके सम्मुख मासभक्षी दीपि- काधारी, महाघोर पिशाच आया। भगवान् ने उसका परिचय पूछा। घण्टाकर्ण ने अपना परिचय देते हुए कहा—'मै घण्टाकर्ण नामक पिशाच हूँ। मैं हिंसक हूँ। मैं मासभक्षी हूँ। मैं विकृतान हूँ। रुद्र के सखा कुबेर का अनुचर हूँ। मेरे साथ मेरा अनुज है। पिशाचो की सेना मेरी है। कुत्तों का समूह मेरा है। भूतसेवित कैलास है। मै यहाँ आया हूँ। मेरे कर्णों में घण्टा है। उससे ध्वनि होती रहती है। इसी कारण मेरा नाम घण्टाकर्ण पड़ गया है। मै शंकर की आराधना करता हूँ।' ( हरिवंश : भविष्य खण्ड ८० : १, २४-२७ ) 'कृष्ण के प्रश्नों का उत्तर देकर घोर रूप विकृतानन पिशाच ने बहुत रुधिर पीकर इच्छानुसार मांसादि भोजन किया। अपने पार्श्व में अत्तडियों का विशाल मांम रख लिया। कृष्ण आसन पर जल छिड़- कर शुद्ध किया। समीपवर्ती कुत्तापालक वह पिशाच वहा से कुत्तों को दूर हटाकर समाधि लगाने का प्रयास करने लगा। (हरिवंश पुराण : भविष्य खण्ड ८० : ५४-५७ ) सर्व श्री अल्डेन वर्ग, मेकडोनेल, कीथ, लकोटे, तथा स्टेन कोनो पिशाच शब्द का अर्थ असुर, दैत्य तथा राक्षस लगाते है। मेकडोनेल तथा कीथ का मत है कि कालान्तर में पिशाच शब्द विरोधी जाति के लिये प्रयुक्त किया जाने लगा था। श्री ए० हिले ब्राट का मत है कि वह शत्रु जाति थी जो आगे चलकर परम्परा- गत भूत हो गयी थी। पारजिटर का मत है कि उनकी असुर तथा पैशाची किंवा राक्षसी प्रकृति उनके वास्तविक रूप का विपर्यय है। श्री ग्रियर्सन का मत है कि वे एक जाति थे जो उत्तर पश्चिम में निवास करते थे।

किन्नर परिशिष्ट 'ढ' ( तरंग १ : १९९ : पृष्ठ २५९ )

हिमाचल प्रदेश में किन्नर क्षेत्र है। कनौरी, गलचा, लाहोली, भाषा है। इन्हें देव एवं मनुष्यों के मध्यवर्ती या एक प्राणी बनाकर प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक जाति का रूप दे दिया गया है। पुराण तथा महाभारत में उनका वर्णन मिलता है। महाभारत में उन्हें गन्धर्व विशेष कहा गया है अतएव किन्नर जाति गन्धर्व, विद्याधर, सिद्धादि वर्ग की है। 'किन्नर' शब्द के अर्थ से स्पष्ट होता है। उनकी योनि तथा आकृति पूर्णतया मनुष्य सदृश नहीं होती थी। उन्हें अश्वमुख तथा तुरंगवक्त्र कहा गया है। कादम्बरी आदि में उनके चरित्र निवास, क्रिया कलाप का वर्णन मिलता है। मंगोल तथा आर्य रक्त मिश्रण के कारण कालान्तर में उनके रंग रूप में अन्तर पड़ता गया है। मंगोल जाति के मुखपर बाल प्रायः नहीं होते। तिब्बत के स्त्री तथा पुरुषों में आकृति से पहिचान लेना कि कौन पुरुष तथा स्त्री है कठिन हो जाता है। दलाई लामा के तिब्बत से चीन द्वारा निष्कासित किये जाने पर तिब्बती शरणार्थी भारत में आने लगे। उनके प्रबन्ध से मैं सम्बन्धित था। उनमें स्त्री पुरुष दोनों चोटी रखते थे। उनका पहनावा एक सा था। उन्हें पहिचानने में कठिनता होती थी। कौन पुरुष और कौन स्त्री है। लद्दाख प्रदेश की प्रथम यात्रा में सन् १९५३ में मुझे इसी प्रकार का अनुभव हुआ। वहाँ पर स्त्री पुरुष एक प्रकार का वस्त्र पहनते है। चोटी रखते हैं। अतएव पहचानना कठिन हो जाता है। परन्तु अपनी दूसरी सन् १९६३ की यात्रा में देखा कि आधुनिक जगत् की हवा लद्दाख क्षेत्र तक पहुँच गयी है: पुराने वस्त्रों के स्थान पर नवीन वस्त्र स्त्री तथा पुरुष पहनन लगे हैं। पुरुष प्राय चोटी नहीं रखते। अतएव स्त्री पुरुष का भेद आसानी से अब किया जा सकता है। पुराणों के आख्यान में सत्यता प्रगट होती है कि मनुकी पुत्री इला किम्पुरुष रूप में परिवर्तित हो गयी थी। इस पौराणिक गाथा को इस प्रकार स्पष्टीकरण किया जा सकता है। इला का रूप किन्नरों जैसा था। वह दिन में पुरुषों की वेश भूषा में पुरुष तथा रात्रि में स्त्रियों की वेशभूषा में स्त्री लगने लगती थी। आज कल योनि परिवर्तन अर्थात् पुरुष को स्त्री तथा स्त्री पुरुष हो जाने के समाचार मिलते हैं। परन्तु इस के आख्यान में उसका रूप नित्य बदलना मिलता है। यह सम्भव नहीं मालूम होता। किन्नरों की उत्पत्ति के विषय में दो मत हैं। एक मत है कि वे ब्रह्मा की छाया अथवा उनके पाद अंगुष्ठ से उत्पन्न हुए थे। दूसरा मत है ये ऋषि कश्यप तथा अरिष्टा की सन्तान थे। अमरकोशकार उन्हें दशदेव योनियों में रखता है— विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥ स्वर्ग वर्ग : १ : ११ मत्स्यपुराणकार उन्हें उत्तरीय भारत वसित पर्वतीय जातियों के साथ रखता है। वे हिमालय तथा हेमकूट में निवास करते थे।

परिशिष्ट ढ १११ उन्हें—'किन्नरा अश्वादिमुखा नराकृतयः' कहा गया है। यहां अश्व तथा नर शब्द का अर्थ लगाना चाहिए कि उनकी मुखाकृति अश्व के समान लम्बी तथा शरीर मनुष्याकृति था। उन्हें अलौकिक प्राणी मानना उचित नहीं है। वे मनुष्य जैसे प्राणी हैं। आर्यों की आकृति में तथा उनकी मुखाकृति में उसी प्रकार अन्तर है जैसे मंगोल तथा आर्यों में होता है। तिब्बतियों तथा लद्दाखियों के मुख लम्बे होते हैं। परन्तु अब अत्य- धिक रक्त रक्षण तथा मिश्रण के कारण इसमें भी अन्तर पड़ता जाता है। (१) किन्नर (२) किम्पुरुष (३) तुरगवदन तथा (४) मयु चार नामों से किन्नरों का वर्ग किया है। वे कभी पर्यायवाची शब्द ये यथा : 'स्यात् किन्नरः किम्पुरुषस्तुरंगवदनो मयुः । अमरकोषः व्योम वर्ग :२:७४: किम्पुरुष पुराणों के अनुसार एक वर्ष था। यह हिमालय प्रदेश के उत्तरी भाग में था। तुरग वदन अर्थात् अश्वमुख का अर्थ बड़ा लम्बा मुख लगाना चाहिए। जिसकी मुख-आकृति अश्व तुल्य लम्बी थी। मयु नामक एक जाति आज भी भारत में मिलती है। वह अमरकोषकार की परिभाषानुसार किन्नर वर्ग की उपजाति थी। किम्पुरुष वर्ष लद्दाख, हिमाचल के उत्तरीय आंचल से तिब्बत तक का सीमावर्ती क्षेत्र था। तिब्बत का प्राचीन नाम किम्पुरुष वर्ष तथा कालान्तर में त्रिविष्टक पड़ गया था। वर्षों, देशो तथा प्रदेशों की सीमाएं बनती और बिगड़ती रही हैं। परन्तु उनकी जो दिशा पुराणों महाभारत तथा रामायण में दी गई है वह कुछ हेर-फेर के साथ मूलतः ठीक मिलती हैं। धवलागिरी से और आगे हिमालय की उत्तर दिशा में यह वर्ष था। महाभारत सभा पर्व में उल्लेख मिलता है। देश द्रुमपुत्र से सुरक्षित था। इसका विजय अर्जुन ने किया था। इससे वह स्थान तिब्बत प्रमा- णित होता है। क्योकि तिब्बत हिमालय के उत्तर में है। स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य वीर्यवान् । देशः किम्पुरुषावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम् ॥ सभा पर्व २८:१-२ शान्ति पर्व में उल्लेख मिलता है। वह जम्बू द्वीप का एक खण्ड था। भारतवर्ष के समान जम्बू द्वीप का किम्पुरुष एक वर्ष था। इसे हैमवत भी कहते थे। हैमवत इस लिए कहा गया है कि यहाँ की नदी में पिपीलिका अर्थात् हेम (स्वर्ण) कण मिलते थे। आज भी मिलते हैं। कुवेर लंकापुरी त्याग कर किम्पुरुषों के साथ आकर गन्धमादन पर्वत पर निवास करने लगे थे। गन्धमादन पुराणों में वर्णित एक पर्वत है इसकी स्थिति इलावर्त तथा भद्राश्व खण्ड के मध्य कही गयी है। वर्णन मिलता है कि पर्वत पर सुगन्धित पादपों की अवलिया लगी थी। गन्धमादन का नाम सप्त पर्वतों में एक हैं। हिमवान्निषधो विन्ध्यो माल्यवान्पारियात्रकः । गन्धमादमन्ये च हेमकूटादयो नगाः ॥ ३:३ अमरकोष, शैल वर्ग (१) हिमालय (२) निषध, (३) विन्ध्य, (४) माल्यवान् (५) पारियात्र (६) गन्धमादन तथा (७) हेमकूट सप्त पर्वत कहे गये है। गन्धमादन को हेमकूट के साथ रखा गया है। गन्धमादन पर्वत