भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ११ भाषाओं की मूल पैशाची भाषा थी । प्राकृत भाषा के वैयाकरणों ने पैशाची को भूत भाषा कहा है । पैशाची भाषा की गणना संस्कृत तथा पाली भाषाओं से किया है । षड् भाषा चन्द्रिका तथा शेषकृष्ण की प्राकृत चन्द्रिका में एकादश भेद बताये गये हैं । प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा तुल्य पैशाची भाषा की कवियों ने प्रशंसा की है । राजशेखर ने सारस्वतेय पुरुष का वर्णन काव्य मीमांसा में किया है और शरीर की तुलना निम्न- लिखित रूपक के साथ किया है : शब्दार्थ—शरीर संस्कृत—मुख प्राकृत—बाहु अपभ्रंश—जघन पैशाची—पाद चातुर्वर्ण का वर्णन करते हुए उपमा दिया है कि ब्राह्मण मुख, क्षत्री बाहु, वैश्य उदर तथा शूद्र पाद है उसी प्रकार राजशेखर ने संस्कृत की ब्राह्मण, प्राकृत की क्षत्री, अपभ्रंश की वैश्य तथा पैशाची की शूद्र से उपमा दी है । संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ तथा पैशाची को निम्नकोटि की भाषा में रखा है । उक्त चारों भाषाओं को एक ही शरीर का विभिन्न अंग माना है । इस शरीर की आत्मा मूल आर्य वैदिक भाषा है । अहो श्लाघनीयासि शब्दार्थो ते शरीरं संस्कृतं मुखं । प्राकृतं बाहू, जघनं अपभ्रंशः पैशाचं पादौ ॥ भाषा का प्रयोजन अन्तर भावना को अभिव्यक्ति करना है । भाषा विचार का पात्र मात्र है । भाषा प्रयो- जन मानव विचार को समझना है । एक ही अर्थ विभिन्न भाषाओं में विभिन्न उच्चारणों द्वारा प्रकट किये जाते हैं । उनका कार्य मानसिक भावना, विचार तथा प्रयोजन को प्रकट करना है । शरीर की उपमा शब्दार्थ से इसीलिए दी गयी है । शब्द किसी भाषा किसी लिपि में लिखा जाकर अर्थ का द्योतक होता है । अतएव, राजशेखर ने शब्दार्थ को शरीर माना है । पैशाची भाषा को सरल भाषा की कोटि में रखा है । 'सुभव्योऽपभ्रंशः सरलरचनं भूतवचनम् ।' इसी प्रकार गुणाढ्य कृत वृहत्कथा की भाषा के विषय में कहा गया है—भूतभाषामयी प्राहुरद्भुता तां वृहत्कथाम् ।' मूलग्रन्थ इस समय उपलब्ध नहीं है । इसकी निकटवर्ती पस्तो तथा दरद भाषायें हैं । अपभ्रंश कवि 'अब्दुर्रहमान' ने 'संदेह रासक' में पैशाची भाषा की कविता का आदर पूर्ण शब्दों में उल्लेख किया है । अवहट्ठय सक्कय पाइडअम्मि पेसाइ अम्पिभासाए लक्खणछन्दारहणो सुकइत्तं भूतियं जेहि - । भूत शब्द राक्षस तथा पिशाच के साथ जोड़ा गया है । 'भूत वचन' 'भूतभाषित' 'भौतिकी' आदि शब्द पैशाची भाषा के पर्याय स्वरूप वर्णन किये गये हैं । भोजदेव ने उत्तम पात्रों को पैशाची भाषा बोलने का निषेध किया है—'नाद्युत्तमपात्रप्रयोज्या पैशाची । धनिक धनंजय ने 'दशरूपक' में पैशाची को नीच पात्रों द्वारा बोली जाने वाली भाषा कहा है । पिशेल किंवा पिशाच भाषा को जनता द्वारा बोली जाने वाली भाषा कहा गया है । मालूम होता है । पंडित तथा सुसंस्कृत सभ्य समाज की भाषा संस्कृत मानी जाती थी । पश्चिम उत्तर हिमालय पर्वताश्रयी