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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 910, कुल 984 में से

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परिशिष्ट ङ १०१ हैं। प्रथम चार प्रकार के विवाह विहित तथा शेष चार अविहित माने गये हैं। पिशाच विवाह अत्यन्त हीन तथा निकृष्ट कहा गया है। पति धोखा द्वारा कन्या को प्राप्त कर लेता है। कन्या को धोखा देकर विवाह करना सभी अवस्थाओं में अनुचित माना गया है। पिशाच विवाह की परिभाषा महाभारत आदि पर्व (७३:९-१२) में दी गयी है। कन्या को चुरा कर विवाह कर लेना पिशाच विवाह कहा गया है। स्कन्द पुराण के विवाह संस्कार अध्याय बलपूर्वक कन्या का अपहरण कर विवाह करना पिशाच विवाह माना गया है। ब्रह्माण्ड पुराण कहता है : हीना देवा स्त्रिभिः पादै गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः । गन्धर्वेभ्यस्त्रिभिः पादैहींना गुह्यकराक्षसाः । ऐश्वर्यहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः । एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ॥ ३:७:१६७-१६८ आधुनिक लमगान प्राचीन लम्पक के पड़ोसी पसाई काफिर रहते थे। पिशाच भूमि कफरिस्तान में कुछ समय पूर्व तक कन्या भगा ले जाकर विवाह करना प्रचलित था। ये विवाह में अश्लील शब्दों का प्रयोग करते थे। तोरणों को तोड़ देते थे। उनके इन चरित्रों के कारण आर्य होते हुए भी शेष आर्यों ने उन्हें पिशाच की संज्ञा दी। मैंने पर्यटकों द्वारा लिखित उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक की सचित्र पुस्तकें देखी हैं। उनमे काफ़रिस्तान तथा चित्राल के रहने वालों की तस्वीरे हैं। उनके रूप विचित्र हैं। लम्बे-लम्बे बाल हैं। वस्त्र मैला है। निसंदेह यह लोग प्राचीन पिशाचों की संतान है। श्री एम. सी. दास का कहना है कि तिब्बत में अनेक स्थानों पर लड़कियों को पकड़कर विवाह करने की प्रथा प्रचलित थी। (एम. सी. दास जे. एम. एस. बी ४२ ९ (२) पैशाची भाषा में पुत्र वधू को 'हुनेवे' कहते हैं। उसका शाब्दिक अर्थ होता है मारखाने वाली औरत। महाभारत उन्हें न करने योग्य कामों को करने वाला कहता है। विहित कर्म यज्ञ पिशाच नहीं करते थे। पैशाचश्चासुराश्चैव न कर्तव्या कदाचन । १३:२४१२; १:२९१५ (३) पिशाचों को पितरों का विरोधी बताया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि वे पितरों का श्राद्धादि कर्म नहीं करते थे। अपितु श्राद्धो को नष्ट करते थे। (४) पिशाच लोग युद्ध में शत्रुओं का रक्त पीते थे। उन्हें नरमांस भक्षी कहा गया है। शत्रुओं के रक्त पीने की प्रथा तिब्बत में भी किसी समय प्रचलित थी। पिशाचों का देश तिब्बत की सीमा पर था अत- एव यह प्रथा तिब्बत के प्रभाव के कारण पिशाचों अथवा पिशाचों के प्रभाव के कारण तिब्बत में प्रवृत्तित हो गयी थी। भारतीय आर्य इस प्रथा को अत्यन्त घृणित मानते थे। पिशाच कच्चा मांस खाते थे। कौलन्द प्रदेश के दरदिस्तान तथा चित्राल पिशाचों का स्थान थे। ये कच्चा मांस खाते थे। डाक्टर लीटनर का कहना है। दो काफ़िरिस्तान के काफिरों ने स्वीकार किया था कि उनके यहां यह रिवाज था कि शत्रु को मारकर उनका ये रक्त पीते थे। (जो. डब्लू. लोतनर : लेंगुवेज एण्ड रेसेज आफ़ डार्डिस्टैन्ड ।) (५) उनका यौन सम्बन्ध अनुचित होता था। (६) पिशाच भाषा आर्य भाषा थी। महाकवि गुणाढ्य ने पैशाची भाषा में वृहत्कथा की रचना की थी। कश्मीरी महाकवि सोमदेव भट्ट ने उसे संस्कृत में कथासरित्सागर के नाम से लिखा है।

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