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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

परिशिष्ट ङ १०१ हैं। प्रथम चार प्रकार के विवाह विहित तथा शेष चार अविहित माने गये हैं। पिशाच विवाह अत्यन्त हीन तथा निकृष्ट कहा गया है। पति धोखा द्वारा कन्या को प्राप्त कर लेता है। कन्या को धोखा देकर विवाह करना सभी अवस्थाओं में अनुचित माना गया है। पिशाच विवाह की परिभाषा महाभारत आदि पर्व (७३:९-१२) में दी गयी है। कन्या को चुरा कर विवाह कर लेना पिशाच विवाह कहा गया है। स्कन्द पुराण के विवाह संस्कार अध्याय बलपूर्वक कन्या का अपहरण कर विवाह करना पिशाच विवाह माना गया है। ब्रह्माण्ड पुराण कहता है : हीना देवा स्त्रिभिः पादै गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः । गन्धर्वेभ्यस्त्रिभिः पादैहींना गुह्यकराक्षसाः । ऐश्वर्यहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः । एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ॥ ३:७:१६७-१६८ आधुनिक लमगान प्राचीन लम्पक के पड़ोसी पसाई काफिर रहते थे। पिशाच भूमि कफरिस्तान में कुछ समय पूर्व तक कन्या भगा ले जाकर विवाह करना प्रचलित था। ये विवाह में अश्लील शब्दों का प्रयोग करते थे। तोरणों को तोड़ देते थे। उनके इन चरित्रों के कारण आर्य होते हुए भी शेष आर्यों ने उन्हें पिशाच की संज्ञा दी। मैंने पर्यटकों द्वारा लिखित उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक की सचित्र पुस्तकें देखी हैं। उनमे काफ़रिस्तान तथा चित्राल के रहने वालों की तस्वीरे हैं। उनके रूप विचित्र हैं। लम्बे-लम्बे बाल हैं। वस्त्र मैला है। निसंदेह यह लोग प्राचीन पिशाचों की संतान है। श्री एम. सी. दास का कहना है कि तिब्बत में अनेक स्थानों पर लड़कियों को पकड़कर विवाह करने की प्रथा प्रचलित थी। (एम. सी. दास जे. एम. एस. बी ४२ ९ (२) पैशाची भाषा में पुत्र वधू को 'हुनेवे' कहते हैं। उसका शाब्दिक अर्थ होता है मारखाने वाली औरत। महाभारत उन्हें न करने योग्य कामों को करने वाला कहता है। विहित कर्म यज्ञ पिशाच नहीं करते थे। पैशाचश्चासुराश्चैव न कर्तव्या कदाचन । १३:२४१२; १:२९१५ (३) पिशाचों को पितरों का विरोधी बताया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि वे पितरों का श्राद्धादि कर्म नहीं करते थे। अपितु श्राद्धो को नष्ट करते थे। (४) पिशाच लोग युद्ध में शत्रुओं का रक्त पीते थे। उन्हें नरमांस भक्षी कहा गया है। शत्रुओं के रक्त पीने की प्रथा तिब्बत में भी किसी समय प्रचलित थी। पिशाचों का देश तिब्बत की सीमा पर था अत- एव यह प्रथा तिब्बत के प्रभाव के कारण पिशाचों अथवा पिशाचों के प्रभाव के कारण तिब्बत में प्रवृत्तित हो गयी थी। भारतीय आर्य इस प्रथा को अत्यन्त घृणित मानते थे। पिशाच कच्चा मांस खाते थे। कौलन्द प्रदेश के दरदिस्तान तथा चित्राल पिशाचों का स्थान थे। ये कच्चा मांस खाते थे। डाक्टर लीटनर का कहना है। दो काफ़िरिस्तान के काफिरों ने स्वीकार किया था कि उनके यहां यह रिवाज था कि शत्रु को मारकर उनका ये रक्त पीते थे। (जो. डब्लू. लोतनर : लेंगुवेज एण्ड रेसेज आफ़ डार्डिस्टैन्ड ।) (५) उनका यौन सम्बन्ध अनुचित होता था। (६) पिशाच भाषा आर्य भाषा थी। महाकवि गुणाढ्य ने पैशाची भाषा में वृहत्कथा की रचना की थी। कश्मीरी महाकवि सोमदेव भट्ट ने उसे संस्कृत में कथासरित्सागर के नाम से लिखा है।

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ११ भाषाओं की मूल पैशाची भाषा थी । प्राकृत भाषा के वैयाकरणों ने पैशाची को भूत भाषा कहा है । पैशाची भाषा की गणना संस्कृत तथा पाली भाषाओं से किया है । षड् भाषा चन्द्रिका तथा शेषकृष्ण की प्राकृत चन्द्रिका में एकादश भेद बताये गये हैं । प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा तुल्य पैशाची भाषा की कवियों ने प्रशंसा की है । राजशेखर ने सारस्वतेय पुरुष का वर्णन काव्य मीमांसा में किया है और शरीर की तुलना निम्न- लिखित रूपक के साथ किया है : शब्दार्थ—शरीर संस्कृत—मुख प्राकृत—बाहु अपभ्रंश—जघन पैशाची—पाद चातुर्वर्ण का वर्णन करते हुए उपमा दिया है कि ब्राह्मण मुख, क्षत्री बाहु, वैश्य उदर तथा शूद्र पाद है उसी प्रकार राजशेखर ने संस्कृत की ब्राह्मण, प्राकृत की क्षत्री, अपभ्रंश की वैश्य तथा पैशाची की शूद्र से उपमा दी है । संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ तथा पैशाची को निम्नकोटि की भाषा में रखा है । उक्त चारों भाषाओं को एक ही शरीर का विभिन्न अंग माना है । इस शरीर की आत्मा मूल आर्य वैदिक भाषा है । अहो श्लाघनीयासि शब्दार्थो ते शरीरं संस्कृतं मुखं । प्राकृतं बाहू, जघनं अपभ्रंशः पैशाचं पादौ ॥ भाषा का प्रयोजन अन्तर भावना को अभिव्यक्ति करना है । भाषा विचार का पात्र मात्र है । भाषा प्रयो- जन मानव विचार को समझना है । एक ही अर्थ विभिन्न भाषाओं में विभिन्न उच्चारणों द्वारा प्रकट किये जाते हैं । उनका कार्य मानसिक भावना, विचार तथा प्रयोजन को प्रकट करना है । शरीर की उपमा शब्दार्थ से इसीलिए दी गयी है । शब्द किसी भाषा किसी लिपि में लिखा जाकर अर्थ का द्योतक होता है । अतएव, राजशेखर ने शब्दार्थ को शरीर माना है । पैशाची भाषा को सरल भाषा की कोटि में रखा है । 'सुभव्योऽपभ्रंशः सरलरचनं भूतवचनम् ।' इसी प्रकार गुणाढ्य कृत वृहत्कथा की भाषा के विषय में कहा गया है—भूतभाषामयी प्राहुरद्भुता तां वृहत्कथाम् ।' मूलग्रन्थ इस समय उपलब्ध नहीं है । इसकी निकटवर्ती पस्तो तथा दरद भाषायें हैं । अपभ्रंश कवि 'अब्दुर्रहमान' ने 'संदेह रासक' में पैशाची भाषा की कविता का आदर पूर्ण शब्दों में उल्लेख किया है । अवहट्ठय सक्कय पाइडअम्मि पेसाइ अम्पिभासाए लक्खणछन्दारहणो सुकइत्तं भूतियं जेहि - । भूत शब्द राक्षस तथा पिशाच के साथ जोड़ा गया है । 'भूत वचन' 'भूतभाषित' 'भौतिकी' आदि शब्द पैशाची भाषा के पर्याय स्वरूप वर्णन किये गये हैं । भोजदेव ने उत्तम पात्रों को पैशाची भाषा बोलने का निषेध किया है—'नाद्युत्तमपात्रप्रयोज्या पैशाची । धनिक धनंजय ने 'दशरूपक' में पैशाची को नीच पात्रों द्वारा बोली जाने वाली भाषा कहा है । पिशेल किंवा पिशाच भाषा को जनता द्वारा बोली जाने वाली भाषा कहा गया है । मालूम होता है । पंडित तथा सुसंस्कृत सभ्य समाज की भाषा संस्कृत मानी जाती थी । पश्चिम उत्तर हिमालय पर्वताश्रयी

परिशिष्ट ङ १०३ प्रदेशों में बोलचाल में प्रयुक्त होने वाली ग्रामीण भाषा पैशाची थी । आजकल राष्ट्रभाषा हिन्दी का रूप वह नहीं है जो भोजपुरी, मगधी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के ग्रामों में बोली जाती है । देश के अनुसार भाषा स्थानीय रूप ले लेती है । यह अवस्था मूल वैदिक भाषा की कालान्तर में हो गयी । वह विभिन्न स्थानों में विविध रूप लेकर स्थानीय रंग के साथ रंग पकड़ने लगी । पैशाची भाषा को दरद भाषा भी कहा जाता है। यह उचित ही मालूम पड़ता है । नाग लोग कश्मीर के मूल निवासी थे । पिशाच कश्मीर के उत्तर-पश्चिम से आये थे । दरदिस्तान इस दिशा में पड़ता है । अतएव भाषा का पैशाची से साम्य,होना स्वाभाविक है । पैशाची रूप चूलिका पैशाची है । पांचाल पैशाची तथा शौरसेनी पैशाची है । वररुचि ने प्राकृत प्रकाश में 'प्रकृतिः शौरसेनी' कहा है । शौरसेनी को पैशाची भाषा का आधार माना है । शौरसेनी भाषा ब्रज मण्डल अर्थात् मथुरा के समीपस्थ प्रदेश में बोली जाती थी । आधुनिक खड़ी बोली की एक प्रकार से जनक मानी जाती है । शौरसेन में प्रचलित प्राकृत भाषा संस्कृत की अपभ्रंश के अतिरिक्त और क्या हो सकती है । पैशाची भाषा में संस्कृत शब्दों की बहुलता है । पुरुषोत्तम कहते हैं संस्कृत शौरसेन्यो विकृति :- ( १९: ३) । संस्कृत और शौरसेनी भाषा का प्रकृत रूप पैशाची भाषा है । पैशाची भाषा के अक्षरों के उच्चारण में किंचित् अन्तर हो जाता है । पैशाची भाषा में 'ण' के स्थान पर 'न' का प्रयोग करते हैं । गुण को गुन, गणना को गनना कहते हैं । शुद्ध संस्कृत से पैशाची प्रच- लित हिन्दी के बहुत समीप आ जाती है । संस्कृत के 'इव' के स्थान पर 'यिव' हो जाता है । 'ष' का 'स', 'क' का 'ग', 'च' का 'ज', 'ज्ञ' का 'ञ्ज', उच्चारण होने लगता है । चण्ड ने प्राकृतिक लक्षण में 'ण' के स्थान पर 'न' तथा 'र' के स्थान पर 'ल' होने का प्रयोग किया है । 'अरे' का 'अले', 'र्म' के स्थान पर 'म्म' प्रयुक्त होता है । जैसे 'धर्म' के स्थान पर 'धम्म' । 'गत्वा' के स्थान पर 'गन्तू' पांडित्य के स्थान पर 'पंडितून' । इसी प्रकार 'क्ष' के स्थान पर 'ख' हो जाता है । 'फल' का 'फर' हो जाता है । पिशाचराज निकुम्भ का वर्णन नीलमत पुराण में आता है । उसे कश्मीर के राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन में हाथ बँटाते देखते हैं । पिशाचराज निकुम्भ से तथा चन्द्रदेव ब्राह्मण से सम्बन्ध अच्छा था । मम वाक्यमनादृत्य यस्मादृष्टं प्रभाषथ । तस्मात्पिशाचैः सहिता वत्स्यध्वं नात्र संशयं ॥ 201 = २६७ २६८ × × × तत्र सन्ति पिशाचा ये दैत्यपक्षाः सुदारुणाः । तेषां तु निग्रहार्थाय पिशाचाधिपतिर्बली ॥ 204 = २७७ २७८ × × × तत्र कोट्यश्च पञ्चैव पिशाचानां दुरात्मनाम् । 207 = २८० × × ×

१०४ राजतरंगिणी न पिशाचैस्तु वत्स्यामो दारुणैर्दाह्यप्रियैः । एवं ब्रुवति नागेन्द्रे नीलं विष्णुरभाषत ॥ 213 = २८६ x x x अल्पवीर्या पिशाचाश्च भविष्यन्तीह सर्वदा । वीर्योपेता गमिष्यन्ति षण्मासं यातुज्ञानेवम् ॥ 215 = २८८ x x x पिशाचैः सह संपर्कस्तत्र नित्यं यदा नृणाम् । तदा तेषां मतिः पापात्सततं नापसर्पति ॥ 244 = ३३१ x x x रज्जुबद्धेन तु यथा पक्षिणा नृपदारकाः । कल्पमानाः पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ॥ 327 = ४२८ x x x हिमेन शीतेन तथा पिशाचैः संपीड्यमानो द्विजवृद्धवर्यः । यग्राम तत्रैव विमूढचेता श्रमन्ययौ यत्र स नागराजः ॥ 328 = ४२९ x x x दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह । वर्जनीयं तदा मांसं प्रयत्नादपि काश्यप ॥ 447 = ५५८, ५५७ x x x वेदोपवेदवेदाङ्गविद्यास्थानानि कृत्स्नशः । नागा यक्षाः पिशाचाश्च तथैव गुरुदासणी ॥ 586 = ७०७ x x x पूज्याः पिशाचाश्च तथा बलिपूर्वेण कर्मणा । देशानुसारः कर्तव्यो जनः कार्यः स्वधिष्ठितः ॥ 837 = १०००-१०१० पुराणो में निकुम्भ को इक्ष्वाकुवंशीय हर्यश्व राजा का पुत्र माना गया है । विष्णु पुराण ४ : २ : १३; वायु पुराण ८८ : ६२; भागवतपुराण ६ : ९ : २४-२५; मत्स्य पुराण १२ : ३३; पद्म पुराण : ८ । महाभारत निकुम्भ को प्रह्लाद का तृतीय पुत्र (आदि पर्व ६५ : १९) तथा एक विख्यात दानव (आदि पर्व ६५ : २६) और हिरण्यकश्यप के कुल में उत्पन्न सुन्द उपसुन्द के पिता रूप में चित्रित करता है । (आदि पर्व २०८ : २-३), शल्य पर्व (४५ : ५६) के अनुसार यह स्कन्द का एक सैनिक था । रामायण में निकुम्भ एक राक्षस योद्धा था । इसका वध नील ने किया था । (वाल्मीकीय रामायण युद्ध काण्ड ७३) । निकुम्भ नाम के अनेक व्यक्तियों का उल्लेख पुराणों में आया है । परन्तु इक्ष्वाकुवंशीय

परिशिष्ट ङ १०५ निकुम्भ के स्थलों के अतिरिक्त सभी राक्षसादि वर्ग में रखे गये हैं। कश्मीर के नीलमत पुराण ने उसे पिशाचवंशीय माना है । पिशाच आर्य जाति की एक शाखा है । पर्वतीय प्रदेशो में निवास करती थी । हिन्दुकुश, कपिशा, कफरिस्तान, गान्धार, चितराल, कश्मीर के उत्तर तथा पामीर के दक्षिण बिखरे हुए थे। उनके रूप का वर्णन तथा उनका चित्र पर्यटकों ने उक्त क्षेत्रों के लोगों का उन्नीसवी तथा बीसवी शताब्दी के आरम्भ में लिया है । उसे देखने से स्पष्ट होता है कि वे प्राचीनकालीन पिशाच जाति के वंशज हैं। उनका लम्बा बाल रखना, धर्म के प्रति कम आस्था, स्नानादि से दूर रहना, अश्लील शब्दो का विवाह काल में प्रयोग, कन्या को भगा ले जाकर विवाह कर लेना यह सब बातें कुछ दिन पूर्व तक प्रचलित थी। वे खाल के नमस्तीन आदि पहनते हैं । पोस्तीन अर्थात् भैंड़ों के कोमल बाल वाले खालों के वस्त्र तथा टोपी साधा- रणतया प्रयोग करते हैं । कच्चा मांस पूर्वकाल में खाते थे । घुमन्तू जाति थे। जानवरों को पालना मुख्य उद्यम था। मैं अक्टूवर मास में कश्मीर दो बार इसका अध्ययन करने के लिए गया। मैंने देखा कि नीलमत में वर्णित प्रथा अभी तक चली आती है। बकरियों, भैंड़ों, जानवरों और टट्टुओं पर समस्त गृहस्थी रखे वे शीत ऋतु में पर्वतों से नीचे मैदान में उतरते हैं। उनके बाल लम्बे होते हैं। मुसलमान धर्म स्वीकार कर लेने के कारण उनके पूर्व जीवन में विशेष परिवर्तन हो गया है। परन्तु उनका रहन-सहन, उनका व्यवहार, उनकी भाषा पैशाची से मिलती है । पिशाच जाति आर्यों की शाखा होने पर भी अपने कर्मों के कारण, सभ्य समाज से दूर होने के कारण, शेष भारत से कालान्तर में सम्बन्ध न होने के कारण, दुर्गम शीत प्रधान उपत्यकाओ में रहने के कारण आर्य धर्म पालन में तथा युग के साथ चलने में असमर्थ हो गयी । उनके कर्मों के कारण उनका नाम पिशाच रख दिया गया । वायु पुराण (अ० ९७ : ५५) के अनुसार—ब्रह्मा ने सर्व प्रथम देव, असुर, पित्र तथा प्रजा नामक चार प्रकार की सृष्टि की । स्थावर-चरादि अन्यान्य भूतों को उत्पन्न किया । यक्ष, पिशाच, नर, किन्नर, अप्सरा, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी, पशु, मृग, उरग, अव्यय, व्यय, स्थावर, जंगम आदि समस्त पदार्थों को बनाया । भगवान् शंकर देवी पार्वती के साथ कैलास पर थे। वहां विविध रूप धारण करने वाले नाना प्रकार के भूत, भयंकर मायावी पिशाच, अनेक प्रकार के अस्त्रों से सुसज्जित अग्नि तुल्य दीप्त भगवान् की सेवा कर रहे थे। वायु पुराण (अ० ३१) में देव वंश का वर्णन है। उसमें असुर, सुपर्ण, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, उरग, राक्षस, पित्र तथा नासत्य आठों को देव योनि माना गया है। वायु पुराण (३९:५७) में पिशाच नामक गिरि का वर्णन किया गया है। उस पर कुबेर का भवन है। उसने कोठे तथा छत थे । यक्ष तथा गन्धर्व विचरण करते थे । अध्याय ४२:३१ में पिशाचक पर्वत का वर्णन पुनः अलकनन्दा नदी के प्रसंग मे किया गया है। अलकनन्दा समुद्र की ओर हिमालय से गिरती, बहती जाती है। नदी का रंग इस यात्रा में स्थान भेद से परिवर्तित हो जाता है। वह ताम्राभ से श्वेतोहर, सुमूल, वसुधा, हेमकूट, देवशृंग, शैलश्रेष्ठ पिशाचक, पंचकूट, देव निवास, कैलास के शिखर कन्दरामय पार्श्व देश से बहती; अचलोत्तम हिमालय पर गिरती; शैलो, स्थलों को सींचती, वनों एवं कन्दराओ को आर्द्र करती, दक्षिण समुद्र में गिरती है । १४

१०६ राजतरंगिणी पिशाचों के रंग रूप तथा आचरणों पर वायु पुराण (६९ ∙ २५७-२७९) प्रकाश डालता है— 'पिशाचों का जन्म कपिशा कूष्माण्डी तथा कूष्माण्ड के संयोग से हुआ था। पिशाचों का रंग कपिल अर्थात् भूरा था। कपिश वर्ण होने के कारण उन्हें पिशाच कहा गया। वे मांसाहारी थे। अन्य सोलह पिशाच दम्पति हैं। उनके वंश वर्तमान हैं। ये सब कूष्माण्ड के कुल के हैं। इन कुलों में उत्पन्न होने वाले पिशाच जाति के हैं। 'उनकी आकृति बीभत्स है। निंद्य कर्म करने वाले हैं। उनके शरीर पर बाल होता है। नेत्र गोल होते हैं। दांत तथा नख कड़े होते हैं। अंग टेढ़े-मेढ़े होते हैं। मनुष्य का भक्षण करते हैं। उनका मुख झुका रहता है। 'कूष्माण्डिक जाति के पिशाच को केश नहीं होता। उनके शरीर पर रोमावलियां नहीं दिखाई पड़तीं। चमड़ा, चर्बी आदि वस्त्र की जगह लपेटे रहते हैं। मांस तथा तिल का आहार करते हैं। वक्र जाति के पिशाचों के अंग, हाथ, पैर टेढ़े होते हैं। चलने समय वह टेढ़ीमेढ़ी चाल चलते हैं। वक्रगामी हैं। इच्छानुसार रूप धारण करते हैं। निगुन्दर जाति के पिशाचों की नासिका उठी रहती है। पेट लम्बा होता है। शरीर छोटा होता है। सर छोटा होता है। हाथ छोटा होता है। तिल भक्षण करते हैं। उनके कान सुन्दर होते हैं। अतर्क पिशाच बौने होते हैं। बहुत बोलते हैं। उछल-उछलकर चलते हैं। वृक्षों पर निवास करते हैं। वृक्षों पर ही आहार करते हैं। पांशु पिशाच ऊर्ध्व धातुवारी होते हैं। रोम ऊपर उठे होते हैं। आवास ऊपर उठे होते हैं। अंगों से धूल गिराते चलते हैं। उपवीर पिशाच सूखे होते हैं। मूंछ-दाढ़ी रखते हैं। चीर धारण करते हैं। श्मशानों में निवास करते हैं। उलूखल पिशाचों की आँखें निश्चल होती हैं। उनकी जिह्वा लम्बी होती है। जीभ से ओठ चाटते रहते हैं। हाथी तथा ऊंट की तरह उनका सिर मोटा होता है। विरत तथा समूह बांधकर झुण्ड में चलते हैं। कुम्भपात्र पिशाच विना देखे अन्न का भोजन करते हैं। सूक्ष्म आकृति वाले होते हैं। शरीर पर रोमावली होती है। पीत वर्ण होते हैं। निपुण पिशाचों के मुख कानों तक फैले होते हैं। भौंहें लम्बी होती हैं। नाक मोटी होती है। पूरण पिशाच शून्य भवनों में निवास करते हैं। शरीर मोटा होता है। हाथ-पैर बहुत छोटे होते हैं। बाँह पृथ्वी पर लगी रहती हैं। बालकों का भक्षण करते हैं। सूतिका गृहों का सेवन करते हैं। मासभक्षी पिशाचगण के हाथ-पैर पीछे की ओर झुके रहते हैं। कद छोटा होता है। वायु के समान वेगशाली होते हैं। युद्ध भूमि में रक्त का पान करते हैं। स्तम्बी पिशाच नग्न रहते हैं। खानाबदोश होते हैं। उनके केश लम्बे होते हैं। पिण्डाकार प्रतीत होते हैं। अन्य पिशाचगण उच्छिन्ननासी होते हैं। पिशाचों के रहन-सहन तथा जीविका का उल्लेख वायु पुराण (६९ : २८०-२८८) करता है— 'विभिन्न आकृति एवं गुण-दोष युक्त पिशाचगण अल्प बुद्धि तथा दीन थे। ये प्रातः तथा सायंकाल विचरण किया करते थे। गिरे पड़े, खण्डहरों, जहाँ बहुत कम लोग रहते हैं, जहाँ दुष्ट निवास करते हैं, जो मकान लीपा पोता नहीं जाता, बेमरम्मत रहता है, वहाँ वे निवास करते हैं।

परिशिष्ट ढ १०७ वायु पुराण (१०१-२८) में सर्प, भूत, पिशाच, नाग एवं मनुष्यों को पृथ्वी लोक का निवासी बताया गया है। राजमार्ग, वीथियों, गृह समीपस्थ उपवन, चौराहा, चबूतरा, द्वारदेश, निर्भय अट्टालक, एकान्त आवास, पथ, नदी, तीर्थ, देवी तथा देवताओं के कल्पित निवास, वृक्ष, महापथ अर्थात् स्मशान मार्ग आदि पिशाचो के निवास स्थान हैं। अधार्मिक, वर्णाश्रम, मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले, वर्णसंकर, शिल्पी हैं। देवताओं ने इनके कर्मों की आजीविका पिशाचों के हेतु बनाया है। चोरी, विश्वासघात, कुत्सित साधनों द्वारा धनोपार्जनादि कर्म पिशाचों के कहे गये हैं। मधु, मास, दही, तिल, चूर्ण, मदिरा, आसव, धूप, हरिद्रा, खिचड़ी, तेल, मोघा, गुड़, भात, काला वस्त्र, धूम तथा पुष्पों द्वारा पर्वों की संधियों के अवसर पर पिशाचों को बलि देना चाहिए अर्थात् उक्त खाद्य पदार्थ पिशाचों के प्रिय हैं। पिशाचों का प्रलय काल मे किस प्रकार नाश होगा इसका वर्णन वायु पुराण (११:१५९) में किया गया है। प्रलय काल में महान् संवर्तक की ज्वालाएं सहस्रों, अरबों योजन ऊपर उठती है। गन्धर्वो, पिशाचों एवं राक्षसो के आश्रमों को सर्वशंतः भस्म करने के उपरान्त गोलोक को भी यह भस्म कर देती हैं। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार पिशाच राक्षसो से तीन स्थान निम्न थे अर्थात् राक्षस पिशाचो से तीन स्थान ऊँचे थे। राक्षसों में उतनी आचरण तथा आचारहीनता नही थी जितनी पिशाचों मे थी। (३: ७:३७६-४११; २:३२:१-२; ३५:१९१) पिशाच श्राद्ध तथा पितृ पूजन विरोधी थे। ब्रह्माण्ड पुराण (३:११:८१) में वर्णन मिलता हैं कि ये श्राद्धों को नष्ट करते थे। इसी पुराण (३:७:२:५६) में वर्णन है कि रावण ने पिशाचों को पराजित किया था। पिशाचों के स्वामी शिव कहे गये हैं। ब्रह्माण्ड पुराण (२:३२:१-२, ३५, १९१) में इसका उल्लेख मिलता है। मत्स्य पुराण (८:५) कहता है कि जगत् पितामह ब्रह्मा ने जिस समय सृष्टि की रचना समाप्त की तो पृथ्वी मण्डल राजा पृथु को दिया। उन्होंने किसी न किसी को सबका अधिनायक किंवा स्वामी बनाया। पिशाच, राक्षस, भूत, प्रेत, वैताल तथा यक्षों का अधिनायक किंवा स्वामी शूलपाणि को बनाया। भागवत पुराण (१:१५:४३) में चीर वस्त्र धारण, मौन, केश खोलकर बिखेर लेने की उपमा जड, उन्मत्त पिशाच से दी गयी है। भागवत में विराट रूप का वर्णन ( : ६ : ४३ ) करते हुए प्रेत, पिशाच, भूत, कूष्माण्ड का उल्लेख एक साथ कर उन्हें एक वर्ग में रखा गया है। कूष्माण्ड पिशाचो से अलग नही किन्तु वायु पुराण की तरह पिशाचों की एक शाखा है। (६:८:२५)। यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस को एक ही वर्ग में रखा गया है तथा उन्हें भयावना कहा गया है। (१०:६:२७) डाकिनी, राक्षसी, कूष्माण्ड को बालग्रह कहा गया हैं। वायु पुराण में पिशाचो का वर्णन करते हुए कहा गया है कि ये शिशुओ के शत्रु होते है। उसी के लिये भागवत ने 'बालग्रह' शब्द का व्यवहार किया है। यहाँ भी भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस, विनायक एक ही वर्ग में रखे गये है। भागवत पुराण (१०:८५:४१) में दैत्यराज बलि ने कृष्ण को कहा है—'हम और हमारे समान अन्य दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत, प्रमथनायक आदि आपसे प्रेम करना दूर रहा सर्व दृढ़ वैर भाव रखते हैं।' यहाँ पर बलि ने स्पष्ट कहा है कि पिशाच कृष्ण किंवा विष्णु भक्त नही थे।

१०८ राजतरंगिणी इस मत की पुष्टि भागवत पुराण (१० : ६३ : १०-११) से होती है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने धनुष के तीखे नोकवाले बाणो से शंकर जी के अनुचरों-भूत, प्रेत, प्रमथ, गुह्यक, डाकिनी, यातुधान, बेताल, विनायक, प्रेतगण, मातृगण, पिशाच, कूष्माण्ड एवं वज्रराक्षसों को मार कर खदेड़ दिया था। पिशाच शंकर के अनुचर थे। शंकर की सेना में थे। श्रीकृष्ण तथा शंकर के युद्ध में शंकर के पक्ष से श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया था। भागवत पुराण (१२ ३ : ४०) में कलियुग काल की समानता पिशाचों से करते हुए कहा गया है—'कलियुग में प्रजा शरीर ढँकने के लिए वस्त्र, पेट की ज्वाला शान्त करने के लिए रोटी, तृष्णा तृप्त करने के लिए जल, शयन निमित्त २ हाथ भूमि से भी वंचित हो जाती है। उसे दाम्पत्य जीवन, स्नान, आभूषण, पहनने तक की सुविधा नहीं रहती। लोगों की आकृति प्रकृति तथा चेष्टाएँ पिशाचों के समान हो जाती हैं।' स्कन्द पुराण काशी खण्ड के पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध दो भाग हैं। उत्तरार्द्ध में पिशाच का वर्णन आता है। काशी में पिशाच मोचन तीर्थ है। इसमे पिशाच के सम्बन्ध में एक कथा दी गयी है। यह स्कन्द, कुम्भज तथा पिशाच के प्रश्नोत्तर रूप में है। कर्पटीश्वर में एक तपस्वी थे। वे हेमन्त ऋतु में एक समय कर्पटीश्वर लिंग के समीप पूजा कर रहे थे। उन्हें विमलोदक कर्पटीश्वर सरोवर के तट पर एक भयंकर मूर्ति का दर्शन हुआ। भयंकर मूर्तिधारी पिशाच ने सानुनय तपस्वी से कहा—प्रतिष्ठान नामक एक देश है। मैं यहाँ का तीर्थ पुरोहित था। वृक्ष-जलहीन मरुस्थल में बहुत समय व्यतीत किया। तीर्थों में दान लेने के कारण पिशाच योनि में जन्म हुआ। मैंने मरुभूमि में एक बालक को देखा। मैं उसके शौचहीन, सन्ध्या कर्मविहीन देह में भोगेच्छा के कारण प्रविष्ट हो गया। वही बालक कनकाशा से काशी आया। काशी में पिशाच का प्रवेश नही हो सकता था। मुझे बालक का शरीर त्यागना पड़ा। मैं उस बालक की प्रतीक्षा में काशी के बाहर बैठा था। मैने एक काषायधारी संन्यासी देखा। इच्छा हुई। उसे मारकर अपनी क्षुधा शान्त करूँ। उसने शिव का नामोच्चारण किया। शिव का नाम कान में पड़ते ही मेरे पूर्व संचित पाप धुल गये। मैं काशीपुरी में प्रवेश करने योग्य हो गया। संन्यासी के साथ अन्तर्गृहो की सीमा में पहुँचा। संन्यासी ने भी भीतर प्रवेश किया। मैं यहाँ रुका। तपस्वी ने पिशाच को कर्पटीश्वर तीर्थ म स्नान करने के लिए कहा। उत्तर दिशा जलाधिष्ठाता देव उसको सर्वदा रक्षा करते थे। अतएव वह स्नान करने में असमर्थ हुआ। तपस्वी ने उसे भस्म लगाकर स्नान करने के लिए कहा। भस्म धारण कर पिशाच ने स्नान किया। वह दिव्य देहधारी हो गया। 'उस दिन से उस तीर्थ का नाम पिशाच मोचन तीर्थ हो गया। उसने कहा। यहां स्नान करने से पिशाच योनि छूट जायगी। यहां श्राद्ध करने से पितर उत्तम योनि को प्राप्त होगे। अगहन सुदी चतुर्दशी के दिन पिशाच मोचन में स्नान करने वाले कभी पिशाच योनि को प्राप्त नही होंगे। इस कथा से दो बातें सिद्ध होती हैं। पिशाच से दिव्य मनुष्य हुआ जा सकता है। उसके लिए शिव की आराधना तथा भक्ति आवश्यक है। भस्म धारण करना शैव धर्म का सबसे बड़ा चिह्न है। भस्म धारण करने के पश्चात् अर्थात् शैवमत ग्रहण करते ही पिशाच पापों से मुक्त हो जाता है। उसके लिए अपना आच- रण बदलना आवश्यक होता है। यहां स्नान, नरमांस भक्षण तथा पितृ श्राद्ध तीन बातों पर जोर दिया गया है। पिशाच अफ्रीका की अनेक मानव जातियों की तरह मांस भक्षण करते थे। स्नान न करने के कारण गन्दे रहते थे। तथा पितृ श्राद्ध को नहीं मानते थे। इन तीनों कर्मों के त्याग पर पुनः दिव्य मनुष्य योनि प्राप्त कर

सकते थे। उनका योनि सम्बन्ध भी दूषित था। वे विपरीत मिथुन करने के कारण भी पिशाच माने गये थे जिसका निषेध शास्त्र करता था। यही कारण है कि पिशाच काशी में प्रवेश अपने आचरण के कारण नहीं कर सका। अग्नि पुराण (५१ : १८ ) पिशाचों की प्रतिमा-लक्षण का वर्णन करता है। हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व अध्याय ७९ तथा ८० में पिशाचो के आचार व्यवहार, भाषा तथा जाति का वर्णन है। हरिवंश पुराण में वर्णन मिलता है— पिशाच विकृतानन थे। उनके रोम पिंगल वर्ण थे। जिह्वा दीर्घ थी। महा हनु थे। लम्बा केश थे। विरूपाक्ष थे। ही-ही-ही कहकर बात करते थे। मांस पिटक खाते थे। बहुत रुधिर पीते थे। विशालकाय 'थे। कृशोदर थे। शूलों में मुण्ड धारण किये हुए थे। अपने भुजाओं से यत्र-तत्र शव खींच लाते थे। वे प्राकृत बोलते थे। दांत कटकटाते थे। कुत्तों का झुण्ड उनके साथ रहता था। प्राणियों की हत्या पर तुले रहते थे। ( हरिवंश पुराण भविष्य पर्व ७८ : १-६ तथा १७-१९ ) 'भगवान् श्रीकृष्ण हिमालय स्थित बद्री नारायण के पुण्य क्षेत्र मे थे। उनके सम्मुख मासभक्षी दीपि- काधारी, महाघोर पिशाच आया। भगवान् ने उसका परिचय पूछा। घण्टाकर्ण ने अपना परिचय देते हुए कहा—'मै घण्टाकर्ण नामक पिशाच हूँ। मैं हिंसक हूँ। मैं मासभक्षी हूँ। मैं विकृतान हूँ। रुद्र के सखा कुबेर का अनुचर हूँ। मेरे साथ मेरा अनुज है। पिशाचो की सेना मेरी है। कुत्तों का समूह मेरा है। भूतसेवित कैलास है। मै यहाँ आया हूँ। मेरे कर्णों में घण्टा है। उससे ध्वनि होती रहती है। इसी कारण मेरा नाम घण्टाकर्ण पड़ गया है। मै शंकर की आराधना करता हूँ।' ( हरिवंश : भविष्य खण्ड ८० : १, २४-२७ ) 'कृष्ण के प्रश्नों का उत्तर देकर घोर रूप विकृतानन पिशाच ने बहुत रुधिर पीकर इच्छानुसार मांसादि भोजन किया। अपने पार्श्व में अत्तडियों का विशाल मांम रख लिया। कृष्ण आसन पर जल छिड़- कर शुद्ध किया। समीपवर्ती कुत्तापालक वह पिशाच वहा से कुत्तों को दूर हटाकर समाधि लगाने का प्रयास करने लगा। (हरिवंश पुराण : भविष्य खण्ड ८० : ५४-५७ ) सर्व श्री अल्डेन वर्ग, मेकडोनेल, कीथ, लकोटे, तथा स्टेन कोनो पिशाच शब्द का अर्थ असुर, दैत्य तथा राक्षस लगाते है। मेकडोनेल तथा कीथ का मत है कि कालान्तर में पिशाच शब्द विरोधी जाति के लिये प्रयुक्त किया जाने लगा था। श्री ए० हिले ब्राट का मत है कि वह शत्रु जाति थी जो आगे चलकर परम्परा- गत भूत हो गयी थी। पारजिटर का मत है कि उनकी असुर तथा पैशाची किंवा राक्षसी प्रकृति उनके वास्तविक रूप का विपर्यय है। श्री ग्रियर्सन का मत है कि वे एक जाति थे जो उत्तर पश्चिम में निवास करते थे।

किन्नर परिशिष्ट 'ढ' ( तरंग १ : १९९ : पृष्ठ २५९ )

हिमाचल प्रदेश में किन्नर क्षेत्र है। कनौरी, गलचा, लाहोली, भाषा है। इन्हें देव एवं मनुष्यों के मध्यवर्ती या एक प्राणी बनाकर प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक जाति का रूप दे दिया गया है। पुराण तथा महाभारत में उनका वर्णन मिलता है। महाभारत में उन्हें गन्धर्व विशेष कहा गया है अतएव किन्नर जाति गन्धर्व, विद्याधर, सिद्धादि वर्ग की है। 'किन्नर' शब्द के अर्थ से स्पष्ट होता है। उनकी योनि तथा आकृति पूर्णतया मनुष्य सदृश नहीं होती थी। उन्हें अश्वमुख तथा तुरंगवक्त्र कहा गया है। कादम्बरी आदि में उनके चरित्र निवास, क्रिया कलाप का वर्णन मिलता है। मंगोल तथा आर्य रक्त मिश्रण के कारण कालान्तर में उनके रंग रूप में अन्तर पड़ता गया है। मंगोल जाति के मुखपर बाल प्रायः नहीं होते। तिब्बत के स्त्री तथा पुरुषों में आकृति से पहिचान लेना कि कौन पुरुष तथा स्त्री है कठिन हो जाता है। दलाई लामा के तिब्बत से चीन द्वारा निष्कासित किये जाने पर तिब्बती शरणार्थी भारत में आने लगे। उनके प्रबन्ध से मैं सम्बन्धित था। उनमें स्त्री पुरुष दोनों चोटी रखते थे। उनका पहनावा एक सा था। उन्हें पहिचानने में कठिनता होती थी। कौन पुरुष और कौन स्त्री है। लद्दाख प्रदेश की प्रथम यात्रा में सन् १९५३ में मुझे इसी प्रकार का अनुभव हुआ। वहाँ पर स्त्री पुरुष एक प्रकार का वस्त्र पहनते है। चोटी रखते हैं। अतएव पहचानना कठिन हो जाता है। परन्तु अपनी दूसरी सन् १९६३ की यात्रा में देखा कि आधुनिक जगत् की हवा लद्दाख क्षेत्र तक पहुँच गयी है: पुराने वस्त्रों के स्थान पर नवीन वस्त्र स्त्री तथा पुरुष पहनन लगे हैं। पुरुष प्राय चोटी नहीं रखते। अतएव स्त्री पुरुष का भेद आसानी से अब किया जा सकता है। पुराणों के आख्यान में सत्यता प्रगट होती है कि मनुकी पुत्री इला किम्पुरुष रूप में परिवर्तित हो गयी थी। इस पौराणिक गाथा को इस प्रकार स्पष्टीकरण किया जा सकता है। इला का रूप किन्नरों जैसा था। वह दिन में पुरुषों की वेश भूषा में पुरुष तथा रात्रि में स्त्रियों की वेशभूषा में स्त्री लगने लगती थी। आज कल योनि परिवर्तन अर्थात् पुरुष को स्त्री तथा स्त्री पुरुष हो जाने के समाचार मिलते हैं। परन्तु इस के आख्यान में उसका रूप नित्य बदलना मिलता है। यह सम्भव नहीं मालूम होता। किन्नरों की उत्पत्ति के विषय में दो मत हैं। एक मत है कि वे ब्रह्मा की छाया अथवा उनके पाद अंगुष्ठ से उत्पन्न हुए थे। दूसरा मत है ये ऋषि कश्यप तथा अरिष्टा की सन्तान थे। अमरकोशकार उन्हें दशदेव योनियों में रखता है— विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥ स्वर्ग वर्ग : १ : ११ मत्स्यपुराणकार उन्हें उत्तरीय भारत वसित पर्वतीय जातियों के साथ रखता है। वे हिमालय तथा हेमकूट में निवास करते थे।

परिशिष्ट ढ १११ उन्हें—'किन्नरा अश्वादिमुखा नराकृतयः' कहा गया है। यहां अश्व तथा नर शब्द का अर्थ लगाना चाहिए कि उनकी मुखाकृति अश्व के समान लम्बी तथा शरीर मनुष्याकृति था। उन्हें अलौकिक प्राणी मानना उचित नहीं है। वे मनुष्य जैसे प्राणी हैं। आर्यों की आकृति में तथा उनकी मुखाकृति में उसी प्रकार अन्तर है जैसे मंगोल तथा आर्यों में होता है। तिब्बतियों तथा लद्दाखियों के मुख लम्बे होते हैं। परन्तु अब अत्य- धिक रक्त रक्षण तथा मिश्रण के कारण इसमें भी अन्तर पड़ता जाता है। (१) किन्नर (२) किम्पुरुष (३) तुरगवदन तथा (४) मयु चार नामों से किन्नरों का वर्ग किया है। वे कभी पर्यायवाची शब्द ये यथा : 'स्यात् किन्नरः किम्पुरुषस्तुरंगवदनो मयुः । अमरकोषः व्योम वर्ग :२:७४: किम्पुरुष पुराणों के अनुसार एक वर्ष था। यह हिमालय प्रदेश के उत्तरी भाग में था। तुरग वदन अर्थात् अश्वमुख का अर्थ बड़ा लम्बा मुख लगाना चाहिए। जिसकी मुख-आकृति अश्व तुल्य लम्बी थी। मयु नामक एक जाति आज भी भारत में मिलती है। वह अमरकोषकार की परिभाषानुसार किन्नर वर्ग की उपजाति थी। किम्पुरुष वर्ष लद्दाख, हिमाचल के उत्तरीय आंचल से तिब्बत तक का सीमावर्ती क्षेत्र था। तिब्बत का प्राचीन नाम किम्पुरुष वर्ष तथा कालान्तर में त्रिविष्टक पड़ गया था। वर्षों, देशो तथा प्रदेशों की सीमाएं बनती और बिगड़ती रही हैं। परन्तु उनकी जो दिशा पुराणों महाभारत तथा रामायण में दी गई है वह कुछ हेर-फेर के साथ मूलतः ठीक मिलती हैं। धवलागिरी से और आगे हिमालय की उत्तर दिशा में यह वर्ष था। महाभारत सभा पर्व में उल्लेख मिलता है। देश द्रुमपुत्र से सुरक्षित था। इसका विजय अर्जुन ने किया था। इससे वह स्थान तिब्बत प्रमा- णित होता है। क्योकि तिब्बत हिमालय के उत्तर में है। स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य वीर्यवान् । देशः किम्पुरुषावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम् ॥ सभा पर्व २८:१-२ शान्ति पर्व में उल्लेख मिलता है। वह जम्बू द्वीप का एक खण्ड था। भारतवर्ष के समान जम्बू द्वीप का किम्पुरुष एक वर्ष था। इसे हैमवत भी कहते थे। हैमवत इस लिए कहा गया है कि यहाँ की नदी में पिपीलिका अर्थात् हेम (स्वर्ण) कण मिलते थे। आज भी मिलते हैं। कुवेर लंकापुरी त्याग कर किम्पुरुषों के साथ आकर गन्धमादन पर्वत पर निवास करने लगे थे। गन्धमादन पुराणों में वर्णित एक पर्वत है इसकी स्थिति इलावर्त तथा भद्राश्व खण्ड के मध्य कही गयी है। वर्णन मिलता है कि पर्वत पर सुगन्धित पादपों की अवलिया लगी थी। गन्धमादन का नाम सप्त पर्वतों में एक हैं। हिमवान्निषधो विन्ध्यो माल्यवान्पारियात्रकः । गन्धमादमन्ये च हेमकूटादयो नगाः ॥ ३:३ अमरकोष, शैल वर्ग (१) हिमालय (२) निषध, (३) विन्ध्य, (४) माल्यवान् (५) पारियात्र (६) गन्धमादन तथा (७) हेमकूट सप्त पर्वत कहे गये है। गन्धमादन को हेमकूट के साथ रखा गया है। गन्धमादन पर्वत

११२ राजतरंगिणी तिब्बत के दक्षिण में स्थित है। इस प्रकार निश्चय पर पहुँच सकते हैं। तिब्बत की पश्चिमी सीमापर इसे होना चाहिए। यह स्थान लद्दाख का पर्याय तथा हिमाचल प्रदेश का उत्तरीय अंचल होता है। हिमालय में स्थान का होना निश्चय हो जाता है। बद्रीनाथ से लेकर लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के मध्यवर्ती स्थान तक इस पर्वत का होना बैठता है। तिब्बत का उत्तरीय पश्चिमी सीमावतीय प्रदेश प्रतीत होता है हित्वा सबगवांल्लंकामाविशद् गन्धमादनम् । गन्धर्वयक्षानुगतो रक्षःकिम्पुरुषैः सह ॥ वनपर्वः २७५:३३ महाभारत में और वर्णन मिलता है। कुवेर के क्रीडास्थल सरोवर की रक्षा में किम्पुरुष गण तत्पर रहते थे। यह सरोवर निःसन्देह तिब्बत प्रदेश में था। किम्पुरुष तथा किन्नर दो वर्ग थे। उनका स्पष्टीकरण महाभारत करता है। सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किम्पुरुषैस्तथा । राक्षसैः किन्नरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥ वनपर्व : ५३:९ किम्पुरुषों का भारत आगमन तथा भ्रमण सिद्ध होता है। किम्पुरुषगण अगस्त्य ऋषि के समुद्रपान का दृश्य देखने के लिए उनका अनुगरण किये थे। वे उत्तर से दक्षिण गये थे। मनुष्योरगगन्धर्वयक्षकिम्पुरुषास्तथा । अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामस्तदद्भुतम् ॥ वनपर्व : १०५:२१ किम्पुरुषों तथा तिब्बत का सम्बन्ध महाभारत काल में घनिष्ठ था। महाराज युधिष्ठिर के राजसूय में किम्पुरुष गण सम्मिलित हुए थे। महाभारत में किम्पुरुष तथा किन्नर दो शब्दों का प्रयोग सिद्ध करता है कि, एक जाति होने पर भी ये एक ही पूर्व जाति की दो उपजातियां हो गयी थी। न किम्पुरुषसङ्कीर्णैः किन्नरैश्चोपशोभितः । सिद्धेश्च विविधाकारैश्च समन्तादभिसंवृतः ॥ आश्वमेधिक पर्व ८८ : १७९ पुराणों में प्रकट होता है। ये श्रीकृष्ण का दर्शन करने द्वारका जी तक गये थे। उनके जाति के सम्बन्ध में कहा गया है। ये पुलह की सन्तान है। और दक्ष कन्या की सन्तति है। पुलह एक मनु है। ब्रह्मा ने उन्हें उत्पन्न किया था। पुलहस्य सुता शम्भुस्तस्माद्य प्रकीर्तिताः । सिंहाः किम्पुरुषा व्याघ्रा ऋक्षा ईहामृगास्तथा ॥ आदिपर्व : ६६:८ इभांस्तु श्येनयांश्च गन्धर्वांस्तुरगान् द्विजान् । गाश्च किम्पुरुषांस्तथानुद्भिञ्जांश्च वनस्पतीन् ॥ शान्तिपर्व : २०७ : २२ दक्षं मरीचिमत्रिं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमङ्गिरसं मनुम् ॥ हरिवंश पुराण अ० १४

परिशिष्ट ढ ११३ मयस्य भवनं तत्र दानवस्य स्वयं कृतम् । मैनाकस्तु विचेतव्यः समानुप्रस्थकन्दरः । ।३०।। स्त्रीणामश्वमुखीनां तु निकेतस्तत्र तत्र तु । तं देशं समतिक्रम्य आश्रमं सिद्धसेवितम् ॥३१॥ 'यहाँ से वैखानस सर के पश्चात् सूना आकाश दिखाई देगा । मेघो की घटा नहीं दिखाई देगी । तत्पश्चात् शीतोदा नामक नदी मिलेगी । शीतोदा के तटपर उत्तर कुरु प्रदेश है । यहां पर गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और विद्याधर सर्वदा नारियों के साथ विहार करते हैं । गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धा नागा विद्याधरास्तथा । रमन्ते सततं तत्र नारीभिर्भास्वरप्रभाः ॥५०।। पुराणों के अनुसार किम्पुरुष वर्ष हिमालय के पश्चात् माना गया है। विष्णु पुराण (२:१: १७:१९) के अनुसार किम्पुरुष एक राजा था । वह अग्नीध्र का पुत्र तथा प्रियव्रत का पौत्र था । उसके पिता ने १०:५२:११ के अनुसार किम्पुरुष को हेमकूट दिया था । भागवत में किम्पुरुष देश के राजा द्युम्न का उल्लेख है । उसने कृष्ण के विरुद्ध जरासन्ध के पक्ष से युद्ध किया था । जिस समय जरासन्ध ने गोमन्त पर आक्रमण किया था उस समय वह पर्वत के पश्चिम दिशा में अपनी सेना के साथ था । भागवत (१:६:१२) के अनुसार राजा परीक्षित ने किम्पुरुष वर्ष को जीता था । किन्नर जाति शंकर पूजक मानी गयी है । गुह्यक, यक्ष आदि पर्वतीय जातियां शिवपूजक थीं । उनके विषय में कहा गया है कि वे शिव की सेवा करते थे । कैलास तथा उसका समीपस्थ क्षेत्र किन्नरों का मुख्य निवास स्थान था । यक्षों, गन्धर्वों के समान गायक तथा नृत्यशील जाति थी । विराट पुरुष, इन्द्र तथा हरि उनके मुख्य उपास्य देव थे । सप्तर्षियों से उन्हें धर्म ज्ञान प्राप्त हुआ था । महाभारत के अनुसार अमरकोष की दी गयी उनकी परिभाषा सत्य प्रतीत होती है । किम्पुरुष तथा किन्नर एक ही जाति की दो उपजातियां अलग अलग थीं । किन्नर भाषा में संस्कृत तथा तिब्बती दोनों भाषाओं के शब्दों का मिश्रण है। कुछ उर्दू शब्दों का भी मिश्रण मिलता है । वह अत्यन्त स्वल्प है । भारत की स्वाधीनता के पश्चात् हिन्दी तथा संस्कृत शब्दों का प्रयोग बढ रहा है । तिब्बती शब्दों का प्रयोग घटने का मुख्य कारण है कि तिब्बत से आवागमन, याता- यात तथा व्यापार समाप्त हो गया है। चीन में तिब्बत के सम्मिलित हो जाने के कारण सम्बन्ध पूर्ण- तया विच्छिन्न हो गया है । कुछ विद्वान् लेखक किन्नर जाति को गन्धर्व तथा किरात वर्ग की श्रेणी में रखते हैं। यह गलत है। किन्नर जाति का अपना मौलिक अस्तित्व रहा है । महाभारत, रामायण तथा पुराण इसके साक्षी हैं । किन्नरो का एक निश्चित अंचल हिमालय प्रदेश में है । उनकी भाषा में शू-सू-देवता वाचक शब्द है । उसमें संस्कृत शब्द यहाँ लगाकर महाशू बनाया गया है । इसी प्रकार ग्रामों के साथ भी शू या भू शब्द लगाते हैं ।

परिशिष्ट 'त' कर्णाट ( तरंग : १ : ३०० : पृष्ठ ३१२ ) कर्णाट किंवा कर्णाटक का उल्लेख सुदूर प्राचीन काल से पुराणाधीन ग्रन्थों में उल्लिखित होता आया है। यह भारतवर्ष का एक सुनिश्चित भू-खण्ड था। यहाँ की भाषा अलग थी। आजकल के कन्नड भाषा-भाषी इस भूखण्ड के निवासी हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात् कन्नड भाषा-भाषियों की एक इकाई मैसूर राज्य के रूप में बन गयी है। महाभारत भीष्म पर्व (९.५९) में कर्णाटक को एक जनपद की संज्ञा दी गई है। कर्णाटक का उल्लेख द्रविड, केरल, प्राच्य, मूषिक, वनवासिक, महिषक, विकल्प, मूषक, तिल्लिर, कुन्तल, मोहुद, नभ कानन, कौकुट्टक, चोलादि के साथ प्राय किया गया है। भागवत पुराण (५.६.७) में कर्णाटक का उल्लेख किया गया है। यहाँ उसे बड़ा मण्डल कहा गया है। स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में कर्णाट का स्थान ८४ तथा ग्राम संख्या १२५०० दी गयी है। बृहद् संहिता में गोनर्द, केरल के साथ कर्णाट का उल्लेख किया गया है। उक्त उदाहरणों से स्पष्ट प्रतीत होता है। कर्णाटक का नाम कल्हण ने ठीक कर्णाट दिया है। कर्नाट किंवा कर्णाटक प्राचीन मूल नाम नहीं हैं। कन्नड भी प्राचीन मूल नाम नहीं है। यह सब कर्णाट के अपभ्रंश किंवा उसके बिगड़े रूप हैं। कर्णाटक देश वासियों की भाषा कन्नड है। उसका साहित्य कन्नड साहित्य कहा जाता है। वर्तमान मैसूर राज्य कन्नड भाषियों का राज्य है। कन्नड शब्द निःसन्देह कर्णाट का अपभ्रंश है। सम्मोह तन्त्र की रचना सन् १४५० ई० के पूर्व हुई थी। उसमें सौराष्ट्र, द्रविड, सैंधव, मलय विदर्भ तथा मालवा आदि के साथ की गयी है (४)। शक्ति संगम तन्त्र (३ : ७ : १) में महाराष्ट्र के साथ कर्णाटक का उल्लेख किया गया। आज भी कर्णाटक अर्थात् कन्नड भाषी मैसूर महाराष्ट्र की पूर्वी तथा दक्षिणी सीमा पर स्थित है। इसी ग्रन्थ में कर्णाटक की सीमा दी गयी है। शक्ति संगम तन्त्र के पूर्व में बैजनाथ, उत्तर में अमरकंटक और दक्षिण में कांचीपुरम के मध्य में कर्णाटक देश था। इसका विस्तार रामनाथ से आरम्भ होकर श्रीरंग तक दिया गया है। (३ : ८ : १६) उक्त तन्त्र ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन कर्णाटक प्रदेश रामनाथ से श्रीरंग तक विस्तृत था। श्रीरंग वर्तमान श्रीरंगपत्तत के लिये व्यवहृत किया गया है। रामनाथ स्थान रामनाथपुरम् अर्थात् पूर्व रामनद जिला अथवा रामनाथ मठ मदुरा जिला अथवा तुंग और भद्रा नदियों के संगम पर रामेश्वर तीर्थ हो सकता है। प्राचीनकाल में यह राज्य पाण्ड्य तथा चोल राज्यों में विभाजित था। पाण्ड्य राज्य मदुरा तथा तिन्ने वली अंचल तक विस्तृत था। चोल राज्य कारोमण्डल तट पर पदुकोट्टायो तक विस्तृत था। चौथी शताब्दी में यहाँ पल्लवों का राज्य स्थापित हुआ था। उनकी राजधानी कांची थी। यह आठवीं शताब्दी

परिशिष्ट त ११५ तक स्थित थी । तत्पश्चात् वह चोलों तथा पाण्ड्यों के अधिकार सीमा में चला गया । पन्द्रहवीं शताब्दी में विजय नगर साम्राज्य के अन्तर्गत कर्णाटक का भूखण्ड आ गया था । विजय नगर साम्राज्य के शक्तिहीन होने पर सत्तरहवीं शताब्दी में यह प्रदेश तीन छोटे हिन्दू राज्यो में विभक्त हो गया था । उनको राजधानी क्रम से मदुरा, तंजोर तथा कांची थी । आरंगजेब की सेना ने सत्तरहवी शताब्दी के अन्त में इस प्रदेश पर आक्रमण किया था । जुलफिकार अली कर्णाटक का नवाब बनाया गया । तत्पश्चात् यह प्रदेश मुसलमानों, मराठों, फ्रांसीसियों तथा अंग्रेजों के संघर्ष का क्षेत्र बन गया । कर्णाटक का ज्ञान काश्मीरी लेखकों को था । प्राचीनकाल में कर्णाटक एवं कश्मीर में विचारों का आदान-प्रदान होता रहा है । कश्मीर निवासी ब्राह्मण कर्णाटक में आकर निवास करते थे । इसी प्रकार कर्णाट देशीय ब्राह्मण कश्मीर में पहुँचते थे । दोनों का एक दूसरे स्थान पर सम्मान तथा आदर होता रहा । कल्हण ने राज तरंगिणी में कर्णाटक का उल्लेख ( १ : ३००; ४ : १४१, १५२; ७ : ६७५, ९३५, ९३६, १११९, ११२४ में किया है। सर्वप्रथम कल्हण ने मिहिरकुल के प्रसंग में कर्णाटक का उल्लेख किया है। उसने श्री लंका आक्रमण से लौटते समय चोल, कर्णाट एवं लाट के राजाओं को व्यदारित किया था । ( त० १ : ३०० ) । 'कल्हण कर्णाट निवासियों के वेश भूषा तथा केश रखने की प्रथा का उल्लेख राजा ललितादित्य के दक्षिण विजय के सन्दर्भ ( ४ : १५१ ) में करता है । इसी प्रसंग में वह कर्णाटक की रानी देवी रट्टा का भी उल्लेख करता है। उस समय रट्टा नाम्नी चंचललोचना कर्णाट कामिनी विशाल दक्षिणापथ पर राज्य करती थी । असीमित प्रभावशालिनी इस देवी ने दुर्गा के समान विन्ध्याद्रि मार्ग को पर्याप्त किया विस्तृत एवं निष्कंटक बना दिया था। वह प्रणाम करते समय ललितादित्य के पाद कमल के नख दर्पण मण्डल में अपनी मूति देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई । उसके ताल वृक्षतले नारिकेल के रसोर्मि पान कर कावेरी तटवर्ती समीर से श्रान्ति दूर कर दिया । उस मलयाचल पर उसके आक्रमण भय से सरकते हुए सर्पों के व्याज भय से चन्दन वृक्ष के बाहु मण्डल से निपतित असि तुल्य लग रहे थे । वह उत्तरण प्रस्तर तुल्य द्वीप पुंजों पर निर्विघ्न चरण पाद रखकर कुल्या सदृश समुद्र का शीघ्र ही अनायास गतागत करने लगा । विजेताग्रणी सागर तरंग के निर्घोषों से जयमंगल गान श्रवण कर वहाँ से पश्चिम दिशा प्रस्थान किया ।' ( रा. त० : १५२-१५८ ) कश्मीर राजा कलश ( सन् १०६३-१०८१ ) के सन्दर्भ में कल्हण पुनः कर्णाट का उल्लेख कलश तथा हर्ष के संघर्ष के सन्दर्भ में करता है। कर्णाटक निवासी केशी उस संघर्ष में युद्ध करता राजविरोधी सैनिको द्वारा कश्मीर में मारा गया था । ( रा० ७ : ६७५ ) इस उद्धरण से यह प्रकट होता है कि कश्मीर की सेना में अथवा राजा के प्रश्रय में कर्णाटक निवासी थे । उनका वहाँ उचित स्थान तथा सम्मान था । कवि विल्हण के प्रसंग में पुनः कल्हण कर्णाटक का उल्लेख करता है। कश्मीरी राजा हर्ष ( सन् १०८९-११०१ ई० ) के समय में विल्हण कर्णाटक चला आया था । कल्हण कहता है—विल्हण कवि राजा कलश के शासन काल में कश्मीर देश त्याग कर कर्णाटक देश के राजा परमाडि के पास चला गया था । राजा परमाडि ने कवि विल्हण को अपनी राज सभा में विद्यापति पदपर नियुक्त किया था । विल्हण हाथी पर आरूढ़ होकर कर्णाटक देश के पर्वतीय प्रदेशों में भ्रमण करते समय समस्त कर्णाटक प्रदेश में केवल

विल्हण को ही यह पद गौरव प्राप्त था कि वह राजा के सम्मुख छत्र धारण करता था।' (रा० ७ : ८३५-८३७) विल्हण की प्रसिद्ध रचना विक्रमांक देव चरित्र तत्कालीन कर्णाटक के इतिहास तथा वहाँ के सामा- जिक, राजनैतिक तथा आर्थिक स्थिति पर यथेष्ट प्रकाश डालता है। विल्हण, राजा अलूप का उल्लेख इसी सन्दर्भ में करता है। विल्हण कोंकण के राजा जयकेशिन का भी उल्लेख नाटक में करता है। कवि विल्हण ने कुन्तल देश को कर्णाटक देश का समानार्थी माना है। विक्रमादित्य षष्ठ को कुन्तलेश तथा कर्णाटेन्द्र कहा है। राजा हरिहर (सन १३०७ ई०) के एक शिलालेख से पता चलता है कि कुन्तल विषय कर्णाट देश में था। कल्हण ने कर्णाटक का पुनः उल्लेख राजा हर्ष के सन्दर्भ में किया है- 'किसी समय वह राजा (हर्ष) कर्णाटक देश के राजा परमाडि की चन्दला नामक सर्वांग सुन्दरी पत्नी को चित्र में देखकर उस पर मोहित हो गया। धूर्त विटगण विचार शून्य एवं मन्दमति राजाओं को मजाक मजाक में कुत्तों के समान छू-छू करके प्रोत्साहित एवं संघर्ष के लिये उत्तेजित कर देते हैं। उस निर्लज्ज राजा ने विटों के प्रोत्साहन से उत्तेजित होकर अपनी राजसभा में कर्णाटक सुन्दरी चन्दला की प्राप्ति हेतु परमाडि को पराजित करने की प्रतिज्ञा की। चन्दला न प्राप्ति काल तक कच्चे कपूर का सेवन न करने की प्रतिज्ञा की।*****कर्णाटक देश के राजा परमाडि का वध कर चन्दला की प्राप्ति द्वारा उसके आलिंगन का सुख भोग करना, कल्याणपुर में प्रविष्ट होकर विष्णला देवी का दर्शन करना, और उस राजा के उपवन में एकत्रित कर गुप्त रूप से रखी गयी अपरिमित सम्पत्ति को अपने आधीन करना इन सब कार्यों के पूर्ण होने तक परम प्रतापशाली महाराज हर्ष- देव ने धोतास कपूर चर्वण त्याग दिया।' (रा० त० ७: १११९-११२४ तथा ११२५-११३३) कल्हण काश्मीर राजा हर्ष के कर्णाटक के समान ही मुद्रा टंकणित कर चलाने का उल्लेख करता है-'राजा हर्ष को दाक्षिणात्यों की पद्धति अधिक रुचिकर थी अतएव उसने कर्णाटक शैली पर मुद्रा टंकणित करवायी। (रा० त० ७: ६२६) यदि कर्णाटक के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डाली जाय तो कश्मीर का सम्बन्ध अति निकट का प्रकट होता है। केवल कश्मीर में ही कर्णाटकवासियों का आदर नहीं होता था। कर्णाटक के राजाओं ने भी कश्मीर के ब्राह्मणों का सम्मान, तथा दान द्वारा आदर प्रदर्शन किया था। पाण्ड्य महादेवी ने बारहवीं शताब्दी में कश्मीर के प्रवरपुर (श्रीनगर) निवासी शारदा देवी के उपासकों को भूमि दान की थी। (एनसिएण्ट कोंकन भास्कर, आनन्द सलतोरे : पृष्ठ १६१) पन्द्रहवीं शताब्दी में कर्णाटक विजयनगरम् राज्य के अन्तर्गत आ गया। विजय नगर राज्य विस्तार के साथ कर्णाटक प्रदेश की सीमा दक्षिण में विस्तृत हो गयी थी। तल्ली कोट के युद्ध (सन् १६६५ ई०) के पश्चात् विजयनगर के राजा चन्द्रगिरी अर्थात् चित्तूर जिला तत्पश्चात् बेल्लोर जिला उत्तरीय अरकाट तक चले आये थे। उनकी राज्य सीमा सीमित हो गयी थी। लघु राज्य होने पर भी उन्हें कर्णाटक का राय कहा जाता था।

परिशिष्ट 'थ' लाट ( तरंग १:३००: पृष्ठ ३१३ ) महाभारत अनुशासन पर्व ( ३५:१७-१८ ) में वर्णन आता है । लाट क्षत्रिय जाति थी । परन्तु ब्राह्मणों के साथ ईर्ष्या करने के कारण नीच हो गयी थी । संमोह तन्त्र में ( २:३ ) देशों की तालिका में लाट देश का नाम चोल, कर्णाटक आदि के साथ दिया गया है । इसी प्रकार शक्ति संगम तन्त्र ( ३:७:५५ ) में लाट देश को सीमा दी गई है । उससे निश्चय किया जा सकता है कि लाट देश प्राचीन काल में कहां तक विस्तृत था । लाट देश उक्त उद्धरण के आधार पर अवन्तो के पश्चिम तथा विदर्भ ( वरार ) के उत्तर-पश्चिम ठहरता है । लाट देश माही तथा ताप्ती के मध्य में पश्चिमी क्षेत्र में था । राजाओं की शक्ति एवं राज्य विस्तार के कारण यह सीमा कभी-कभी माहो के ओर परे तक जातो थी । उसमे भृगुकच्छ ( भड़ौच ) तथा नवसारिका ( नवसारी ) के अंचल सम्मिलित हो जाते थे । वात्स्यायन कामसूत्र ( ६ ५.२६ ) तृतीय शताब्दी की रचना के अनुसार लाट देश की स्थिति मालवा के पश्चिम दिशा में बतायी गयी है । विनयचन्द्र की काव्य शिक्षा में लाट देश के ग्रामों की संख्या २१ हजार तथा गुर्जर देश की ७० हजार दी गयी है । स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में लाड किंवा लाट देश की क्रमसंख्या ३८ तथा उसके ग्रामों की संख्या भी २१ हजार दी गयी है । उसमे कच्छ की ग्राम-संख्या १४ हजार, सौराष्ट्र की ५५ हजार तथा गुजरात की ग्रामसंख्या ७० हजार दी गयी है । इससे स्पष्ट है कि लाट देश का अस्तित्व प्राचीन काल में गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ से स्वतन्त्र तथा भिन्न था । लाट प्रदेश गुजरात तथा सौराष्ट्र से छोटा और कच्छ से बड़ा था । लाट तथा लाटविषय का उल्लेख प्रथम शताब्दी से सातवी तथा आठवीं शताब्दी तक भारतीय वाङ्मय में मिलता है । इस प्रदेश का नाम पुराण तथा महाभारत और रामायण में नहीं मिल सका है । प्लोस्मी ने इसका उल्लेख किया है । उसके अनुसार लारिक भारतीय समुद्र तट पर था । वह मोफी ( माहो ) नदी के मुहाने पर था । माही अन्तरीप का नर्मदा तथा माही के मध्य कहीं होना लिखता है । कालान्तर में लाट देश का प्राकृत रूप लार देश हो गया था । इसमें गुजरात तथा उत्तरीय कोंकन का अंचल आ जाता था । मुगल काल में लार समुद्र भाषा और मसूदी लारो का उल्लेख मिलता है । लाट देश के अन्तर्गत वरयगजा ( भड़ौच भृकच्छ ) तथा ओजेन ( उज्जैन ) नगर थे । गोसारिद भी उसमें सम्मिलित था । वह नोसारिका किंवा वर्तमान नोसारी है । लाट प्रदेश को अष्टाश इक्कीस तथा वारस अर्थात् ताप्ती और माही नदियों के मध्य कतिपय विद्वानों ने माना है । वह सम्भावना प्रकट की गयी है कि आदित्य वर्धन के पुत्र प्रभाकर वर्धन के संघर्ष में देवगुप्त ने यथेष्ट सहायता राजा डांकरगण के अन्य अधीनस्थ राजाओं से ली थी जिनमें निरिहुल तथा गुर्जर थे । उनके मध्य उस समय लाट देश विभाजित हो गया था । लाट देश के कुछ सैनिक मालवा के पक्ष

११८ राजतरंगिणी से युद्ध में भाग लिये थे। वह युद्ध सातवी शताब्दी के प्रारम्भिक काल में हुआ था। बाण ने प्रभाकर वर्धन को अराजक लाटजनों के लुटेरा रूप में चित्रित किया है। निस्सन्देह लाट जाति जब स्वतन्त्र अस्तित्व रखती थी तो वह भारत को एक प्रसिद्ध गौरवशालिनी जाति थी। पुलिकेशिन द्वितीय की एहोल प्रशस्ति (शक संवत् प्रसिद्ध ५५६ में लाट का उल्लेख किया गया है। उसमे उल्लेख है। उस शक्ति से लाट, मालव गुर्जर को उसने किस प्रकार अधीनस्थ राजा सदृश आचरण करने के लिये वाध्य किया। गुजरात राज नशोह तथा राष्ट्रकूट के दानपत्रो से प्रतीत होता है कि शासकीय विभाजन केवल सौराष्ट्र में ही नही अपितु आनर्त देश में भी थे। वे लाट देश में भी पाये जाते थे। (एनसियण्ट हिस्टोरी आफ सौराष्ट्र डॉ० के० जे० काजी) धी जे० घ. प्लीट का मत है कि लाट देश की संज्ञा पुरा काल में वडोदा तथा सूरत क्षेत्र से दी जाती थी।

परिशिष्ट 'द' चोल ( तरंग १ : ३०० : पृष्ठ ३११ ) कर्नल जेरिनी ने 'चोल' शब्द को संस्कृत शब्द 'काल' तथा 'कोल' से सम्बन्धित करने का प्रयास किया है। उसे कृष्ण वर्ण आर्य समुदाय का सूचक माना है। संस्कृत शब्द 'चोर' तथा तामिल शब्द 'चोलम्' से भी सम्बद्ध किया जाता है । बात कुछ तथ्यहीन मालूम पडती है । चोल शब्द प्राचीन काल से चोल वंश तथा भूखण्ड के लिए प्रयुक्त होता रहा है । एक मत है कि ये 'शिवि' वंशीय है। बारहवी शताब्दी के अनेक राजवंशो ने करिकाल से उद्भूत अपने को कश्यप ,गोत्रीय माना है। कात्यायन ने उन्हें चोड लिखा है । संगम युग काल में चोलों ने दक्षिणी भारतीय इतिहास को सर्वप्रथम प्रभावित किया था । तत्पश्चात् उनका इतिहास लुप्त हो जाता है । नवीं शताब्दी में चोलों का पुनः पुनरुत्थान हुआ । इस वंश का संस्थापक विजयपाल ( स० ८५०- ८७०-७१ ई० ) पल्लव राजा के शासन में उरैपुर प्रदेश का शासक था। उसकी वंश परम्परा में २० राजा हुए । जिन्होंने लगभग ४०० वर्षों तक शासन किया था । इस वंश का प्रतिभाशाली राजा राजराज का पुत्र राजेन्द्र प्रथम ( सन् १०१२ से १०४४ ई० ) था । उसने चेर पाण्ड्य तथा सिंहल विजय किया था । कलिंग जीतता हुआ यह दक्षिण बंगाल और दक्षिण कोशल तक पहुँचा था । वह गंगाजल लाना चाहता था । उसने पराजित राजाओं से अपने लिए गंगाजल ढुलवाया । चोल राज्य पूर्वीय सागर तट, पेन्नार नदी से वेल्लारु तथा पश्चिम में कुर्ग तक विस्तृत था । यह भी मत है। वेल्लारु नदी के उत्तर-दक्षिण ( एक ही नाम की दो नदिया हैं ) पूर्व में समुद्र तथा पश्चिम में कोट्टाडंबकराय तक चोल क्षेत्र फैला था । वर्तमान त्रिचनापल्ली, तंजोर तथा पदुकोटाह का उसमें कुछ भाग सम्मिलित था । राजधानी उरगपुर किंवा उरैपुर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी । कवि दण्डी ने अपने काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया है। कावेरी पट्टन कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य का बड़ा बन्दरगाह था । कांची अर्थात् वर्तमान काजीवरम चोल प्रदेश का विशाल नगर था । नागपटन अर्थात् नागीपतनम भी इसका एक बन्दरगाह था। नागोपतनम बन्दरगाह आज भी चलता है। मैं यहां दो बार आ चुका हूँ । समुद्र उथला होने के कारण जहाज २ मील दूर समुद्र में ठहरते हैं । तंजोर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोणम पूर्वकालीन चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर थे । और आज भी है। ग्यारहवी तथा बारहवी शताब्दी में गंगई कोण्डा, चोलपुरम चोल राज की राजधानी थी । दक्षिण भारत के अभिलेखों में कावेरी नदी का नाम चोल दिया गया है। चोल शब्द देश तथा देशवासी दोनों के लिए प्रयुक्त किया है । ( सभा पर्व ५२ : ३५ ) । मार्कण्डेय ( ५७:५:४५ ), वायु ( ४५:५:१२४ ) तथा मत्स्य पुराणों ( ११२:५:४६ ) में चोल राज्य का नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ मिलता है। पद्म पुराण ( ३०, १०८, १०९ ); तथा स्कन्द पुराण ( २:४:२६-२७ ) में भी उल्लेख मिलता है ।

१२० राजतरंगिणी रामायण किष्किन्धा काण्ड (४१:१३) में चोल का उल्लेख आन्ध्र, पुण्ड, पाण्ड्य, केरल के साथ किया गया है। उसकी दिशा दक्षिण बतायी गयी है। कावेरी नदी का उल्लेख इसी स्थल पर किया गया है। महाभारत सभा पर्व (२७:२१) में उल्लेख है। अर्जुन ने चोल सेना पर विजय प्राप्त किया था। भीष्म पर्व (९:६० तथा ५०:५१) में उल्लेख मिलता है कि धृष्टद्युम्न द्वारा निर्मित क्रोंच व्यूह के दक्षिण पार्श्व में चोल सैनिक रक्षा निमित्त तत्पर थे। कर्ण पर्व (१२:१५) में उल्लेख आता है। पाण्डवों का पक्ष चोल ने महाभारत युद्ध में लिया था। द्रोण पर्व (११:१७) में वर्णन मिलता है। भगवान् कृष्ण ने इस देश को जीता था। कात्यायन ने पाणिनि के वार्तिक में चोल तथा पांड्य का उल्लेख किया है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी (४.१:१७५:७) में काचीपुरम का उल्लेख किया है। अशोक ने द्वितीय और तेरहवें शिलालेख में चोल, पाण्ड्य, केलल पुत्तो (केरल) तथा सतियपुत्तो (सत्यपुत्र) का उल्लेख किया है। तिब्बतीय बौद्ध ग्रन्थो से मालूम होता है। मौर्यों ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। इसका समर्थन आधुनिक अनुसन्धानों से मिलता है। महावंश में चोल तथा कावेरी पत्तनम का उल्लेख है। जातक में कावेरी पत्तनम का उल्लेख मिलता है। चोल का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा है। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में चोल का उल्लेख किया है। (४:१:१७५) बौद्ध ग्रन्थों में समन्त पसा- दिका तथा जातक में कोल जनपद का अर्थ चोलजनपद लगाना चाहिए। चीनियों ने चोल देश का नाम चुल्ली-ए रखा है। उसका क्षेत्र २४०० ली बताते है। यहा संघाराम तथा देव मन्दिरो की प्रचुरता थी। परमार राज लक्ष्मणदेव की प्रशस्ति में चोल विजय का वर्णन है। यह कल्पना मात्र प्रतीत होती है। पोल ने चाल का उल्लेख 'सोर' शब्द से किया है। उस पर अरकाट का शासन होना बताता है। मार्कण्डेय पुराण (५७०८५), वायु पुराण (४५ १२४), मत्स्य पुराण (१२१:४६) में चोल देश का उल्लेख है। मार्कण्डेय पुराण में—'चोला: कुल्यास्तथैव च' वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में—चोल्या: कुल्यास्तथैव च' शैलेन्द्र साम्राज्य के विरुद्ध राजेन्द्र चोल ने मलय, जावा, सुमात्रा पर जहाजी बेड़े से आक्रमण कर, विजय प्राप्त किया था। भारत का यह अभूत पूर्व नाविक अभियान एवं नौशक्ति प्रदर्शन भारतीय इतिहास के लिये गौरव की बात है। इस वंश में राजाधिराज प्रथम, कुलोत्तुंग तथा विक्रम चोल आदि शक्ति सम्पन्न और प्रतिभाशाली राजा हुए थे। चोल वंश का अंतिम राजा राजेन्द्र तृतीय था। तत्पश्चात् चोल राज्य पाण्ड्य के आधीन हो गया। सन् १३१० ई० में अलाउद्दीन खिलजी के समय मलिक काफूर ने आक्रमण कर चोल सत्ता उसी प्रकार नष्ट कर दी जिस प्रकार सन् १३३९ ई० में शाहमीर ने कोटारानी को राज्यच्युत कर दिया था। चोलों के आम लेखो से ज्ञात होता है। उनकी राज्य व्यवस्था सुसंपादित थी। राज्य अनेक मण्डलों में विभाजित था। मण्डल को कोट्टम् किंवा वलनाडु कहते थे। तत्पश्चात् नाडु अर्थात् जिला और उसके पश्चात् कुर्रम् तथा ग्राम थे। चोल राज्य में जन सभाओं द्वारा कार्य संचालन होता था। इन सभाओं का नाम 'उर' था। उन्हें सभा भी कहते थे। सभा की कार्यकारिणी अर्थात् आलुगणम् का निर्वाचन सभासद परस्पर मिलकर करते थे। मैमूर से प्राप्त लेख से ग्राम सभा के कार्यों पर प्रकाश पड़ता है। ग्राम शासन