राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ढ १११ उन्हें—'किन्नरा अश्वादिमुखा नराकृतयः' कहा गया है। यहां अश्व तथा नर शब्द का अर्थ लगाना चाहिए कि उनकी मुखाकृति अश्व के समान लम्बी तथा शरीर मनुष्याकृति था। उन्हें अलौकिक प्राणी मानना उचित नहीं है। वे मनुष्य जैसे प्राणी हैं। आर्यों की आकृति में तथा उनकी मुखाकृति में उसी प्रकार अन्तर है जैसे मंगोल तथा आर्यों में होता है। तिब्बतियों तथा लद्दाखियों के मुख लम्बे होते हैं। परन्तु अब अत्य- धिक रक्त रक्षण तथा मिश्रण के कारण इसमें भी अन्तर पड़ता जाता है। (१) किन्नर (२) किम्पुरुष (३) तुरगवदन तथा (४) मयु चार नामों से किन्नरों का वर्ग किया है। वे कभी पर्यायवाची शब्द ये यथा : 'स्यात् किन्नरः किम्पुरुषस्तुरंगवदनो मयुः । अमरकोषः व्योम वर्ग :२:७४: किम्पुरुष पुराणों के अनुसार एक वर्ष था। यह हिमालय प्रदेश के उत्तरी भाग में था। तुरग वदन अर्थात् अश्वमुख का अर्थ बड़ा लम्बा मुख लगाना चाहिए। जिसकी मुख-आकृति अश्व तुल्य लम्बी थी। मयु नामक एक जाति आज भी भारत में मिलती है। वह अमरकोषकार की परिभाषानुसार किन्नर वर्ग की उपजाति थी। किम्पुरुष वर्ष लद्दाख, हिमाचल के उत्तरीय आंचल से तिब्बत तक का सीमावर्ती क्षेत्र था। तिब्बत का प्राचीन नाम किम्पुरुष वर्ष तथा कालान्तर में त्रिविष्टक पड़ गया था। वर्षों, देशो तथा प्रदेशों की सीमाएं बनती और बिगड़ती रही हैं। परन्तु उनकी जो दिशा पुराणों महाभारत तथा रामायण में दी गई है वह कुछ हेर-फेर के साथ मूलतः ठीक मिलती हैं। धवलागिरी से और आगे हिमालय की उत्तर दिशा में यह वर्ष था। महाभारत सभा पर्व में उल्लेख मिलता है। देश द्रुमपुत्र से सुरक्षित था। इसका विजय अर्जुन ने किया था। इससे वह स्थान तिब्बत प्रमा- णित होता है। क्योकि तिब्बत हिमालय के उत्तर में है। स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य वीर्यवान् । देशः किम्पुरुषावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम् ॥ सभा पर्व २८:१-२ शान्ति पर्व में उल्लेख मिलता है। वह जम्बू द्वीप का एक खण्ड था। भारतवर्ष के समान जम्बू द्वीप का किम्पुरुष एक वर्ष था। इसे हैमवत भी कहते थे। हैमवत इस लिए कहा गया है कि यहाँ की नदी में पिपीलिका अर्थात् हेम (स्वर्ण) कण मिलते थे। आज भी मिलते हैं। कुवेर लंकापुरी त्याग कर किम्पुरुषों के साथ आकर गन्धमादन पर्वत पर निवास करने लगे थे। गन्धमादन पुराणों में वर्णित एक पर्वत है इसकी स्थिति इलावर्त तथा भद्राश्व खण्ड के मध्य कही गयी है। वर्णन मिलता है कि पर्वत पर सुगन्धित पादपों की अवलिया लगी थी। गन्धमादन का नाम सप्त पर्वतों में एक हैं। हिमवान्निषधो विन्ध्यो माल्यवान्पारियात्रकः । गन्धमादमन्ये च हेमकूटादयो नगाः ॥ ३:३ अमरकोष, शैल वर्ग (१) हिमालय (२) निषध, (३) विन्ध्य, (४) माल्यवान् (५) पारियात्र (६) गन्धमादन तथा (७) हेमकूट सप्त पर्वत कहे गये है। गन्धमादन को हेमकूट के साथ रखा गया है। गन्धमादन पर्वत