राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ राजतरंगिणी तिब्बत के दक्षिण में स्थित है। इस प्रकार निश्चय पर पहुँच सकते हैं। तिब्बत की पश्चिमी सीमापर इसे होना चाहिए। यह स्थान लद्दाख का पर्याय तथा हिमाचल प्रदेश का उत्तरीय अंचल होता है। हिमालय में स्थान का होना निश्चय हो जाता है। बद्रीनाथ से लेकर लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के मध्यवर्ती स्थान तक इस पर्वत का होना बैठता है। तिब्बत का उत्तरीय पश्चिमी सीमावतीय प्रदेश प्रतीत होता है हित्वा सबगवांल्लंकामाविशद् गन्धमादनम् । गन्धर्वयक्षानुगतो रक्षःकिम्पुरुषैः सह ॥ वनपर्वः २७५:३३ महाभारत में और वर्णन मिलता है। कुवेर के क्रीडास्थल सरोवर की रक्षा में किम्पुरुष गण तत्पर रहते थे। यह सरोवर निःसन्देह तिब्बत प्रदेश में था। किम्पुरुष तथा किन्नर दो वर्ग थे। उनका स्पष्टीकरण महाभारत करता है। सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किम्पुरुषैस्तथा । राक्षसैः किन्नरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥ वनपर्व : ५३:९ किम्पुरुषों का भारत आगमन तथा भ्रमण सिद्ध होता है। किम्पुरुषगण अगस्त्य ऋषि के समुद्रपान का दृश्य देखने के लिए उनका अनुगरण किये थे। वे उत्तर से दक्षिण गये थे। मनुष्योरगगन्धर्वयक्षकिम्पुरुषास्तथा । अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामस्तदद्भुतम् ॥ वनपर्व : १०५:२१ किम्पुरुषों तथा तिब्बत का सम्बन्ध महाभारत काल में घनिष्ठ था। महाराज युधिष्ठिर के राजसूय में किम्पुरुष गण सम्मिलित हुए थे। महाभारत में किम्पुरुष तथा किन्नर दो शब्दों का प्रयोग सिद्ध करता है कि, एक जाति होने पर भी ये एक ही पूर्व जाति की दो उपजातियां हो गयी थी। न किम्पुरुषसङ्कीर्णैः किन्नरैश्चोपशोभितः । सिद्धेश्च विविधाकारैश्च समन्तादभिसंवृतः ॥ आश्वमेधिक पर्व ८८ : १७९ पुराणों में प्रकट होता है। ये श्रीकृष्ण का दर्शन करने द्वारका जी तक गये थे। उनके जाति के सम्बन्ध में कहा गया है। ये पुलह की सन्तान है। और दक्ष कन्या की सन्तति है। पुलह एक मनु है। ब्रह्मा ने उन्हें उत्पन्न किया था। पुलहस्य सुता शम्भुस्तस्माद्य प्रकीर्तिताः । सिंहाः किम्पुरुषा व्याघ्रा ऋक्षा ईहामृगास्तथा ॥ आदिपर्व : ६६:८ इभांस्तु श्येनयांश्च गन्धर्वांस्तुरगान् द्विजान् । गाश्च किम्पुरुषांस्तथानुद्भिञ्जांश्च वनस्पतीन् ॥ शान्तिपर्व : २०७ : २२ दक्षं मरीचिमत्रिं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमङ्गिरसं मनुम् ॥ हरिवंश पुराण अ० १४