भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 922, कुल 984 में से

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पृष्ठ 922

परिशिष्ट ढ ११३ मयस्य भवनं तत्र दानवस्य स्वयं कृतम् । मैनाकस्तु विचेतव्यः समानुप्रस्थकन्दरः । ।३०।। स्त्रीणामश्वमुखीनां तु निकेतस्तत्र तत्र तु । तं देशं समतिक्रम्य आश्रमं सिद्धसेवितम् ॥३१॥ 'यहाँ से वैखानस सर के पश्चात् सूना आकाश दिखाई देगा । मेघो की घटा नहीं दिखाई देगी । तत्पश्चात् शीतोदा नामक नदी मिलेगी । शीतोदा के तटपर उत्तर कुरु प्रदेश है । यहां पर गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और विद्याधर सर्वदा नारियों के साथ विहार करते हैं । गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धा नागा विद्याधरास्तथा । रमन्ते सततं तत्र नारीभिर्भास्वरप्रभाः ॥५०।। पुराणों के अनुसार किम्पुरुष वर्ष हिमालय के पश्चात् माना गया है। विष्णु पुराण (२:१: १७:१९) के अनुसार किम्पुरुष एक राजा था । वह अग्नीध्र का पुत्र तथा प्रियव्रत का पौत्र था । उसके पिता ने १०:५२:११ के अनुसार किम्पुरुष को हेमकूट दिया था । भागवत में किम्पुरुष देश के राजा द्युम्न का उल्लेख है । उसने कृष्ण के विरुद्ध जरासन्ध के पक्ष से युद्ध किया था । जिस समय जरासन्ध ने गोमन्त पर आक्रमण किया था उस समय वह पर्वत के पश्चिम दिशा में अपनी सेना के साथ था । भागवत (१:६:१२) के अनुसार राजा परीक्षित ने किम्पुरुष वर्ष को जीता था । किन्नर जाति शंकर पूजक मानी गयी है । गुह्यक, यक्ष आदि पर्वतीय जातियां शिवपूजक थीं । उनके विषय में कहा गया है कि वे शिव की सेवा करते थे । कैलास तथा उसका समीपस्थ क्षेत्र किन्नरों का मुख्य निवास स्थान था । यक्षों, गन्धर्वों के समान गायक तथा नृत्यशील जाति थी । विराट पुरुष, इन्द्र तथा हरि उनके मुख्य उपास्य देव थे । सप्तर्षियों से उन्हें धर्म ज्ञान प्राप्त हुआ था । महाभारत के अनुसार अमरकोष की दी गयी उनकी परिभाषा सत्य प्रतीत होती है । किम्पुरुष तथा किन्नर एक ही जाति की दो उपजातियां अलग अलग थीं । किन्नर भाषा में संस्कृत तथा तिब्बती दोनों भाषाओं के शब्दों का मिश्रण है। कुछ उर्दू शब्दों का भी मिश्रण मिलता है । वह अत्यन्त स्वल्प है । भारत की स्वाधीनता के पश्चात् हिन्दी तथा संस्कृत शब्दों का प्रयोग बढ रहा है । तिब्बती शब्दों का प्रयोग घटने का मुख्य कारण है कि तिब्बत से आवागमन, याता- यात तथा व्यापार समाप्त हो गया है। चीन में तिब्बत के सम्मिलित हो जाने के कारण सम्बन्ध पूर्ण- तया विच्छिन्न हो गया है । कुछ विद्वान् लेखक किन्नर जाति को गन्धर्व तथा किरात वर्ग की श्रेणी में रखते हैं। यह गलत है। किन्नर जाति का अपना मौलिक अस्तित्व रहा है । महाभारत, रामायण तथा पुराण इसके साक्षी हैं । किन्नरो का एक निश्चित अंचल हिमालय प्रदेश में है । उनकी भाषा में शू-सू-देवता वाचक शब्द है । उसमें संस्कृत शब्द यहाँ लगाकर महाशू बनाया गया है । इसी प्रकार ग्रामों के साथ भी शू या भू शब्द लगाते हैं ।

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