भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 919, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 919

किन्नर परिशिष्ट 'ढ' ( तरंग १ : १९९ : पृष्ठ २५९ )

हिमाचल प्रदेश में किन्नर क्षेत्र है। कनौरी, गलचा, लाहोली, भाषा है। इन्हें देव एवं मनुष्यों के मध्यवर्ती या एक प्राणी बनाकर प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक जाति का रूप दे दिया गया है। पुराण तथा महाभारत में उनका वर्णन मिलता है। महाभारत में उन्हें गन्धर्व विशेष कहा गया है अतएव किन्नर जाति गन्धर्व, विद्याधर, सिद्धादि वर्ग की है। 'किन्नर' शब्द के अर्थ से स्पष्ट होता है। उनकी योनि तथा आकृति पूर्णतया मनुष्य सदृश नहीं होती थी। उन्हें अश्वमुख तथा तुरंगवक्त्र कहा गया है। कादम्बरी आदि में उनके चरित्र निवास, क्रिया कलाप का वर्णन मिलता है। मंगोल तथा आर्य रक्त मिश्रण के कारण कालान्तर में उनके रंग रूप में अन्तर पड़ता गया है। मंगोल जाति के मुखपर बाल प्रायः नहीं होते। तिब्बत के स्त्री तथा पुरुषों में आकृति से पहिचान लेना कि कौन पुरुष तथा स्त्री है कठिन हो जाता है। दलाई लामा के तिब्बत से चीन द्वारा निष्कासित किये जाने पर तिब्बती शरणार्थी भारत में आने लगे। उनके प्रबन्ध से मैं सम्बन्धित था। उनमें स्त्री पुरुष दोनों चोटी रखते थे। उनका पहनावा एक सा था। उन्हें पहिचानने में कठिनता होती थी। कौन पुरुष और कौन स्त्री है। लद्दाख प्रदेश की प्रथम यात्रा में सन् १९५३ में मुझे इसी प्रकार का अनुभव हुआ। वहाँ पर स्त्री पुरुष एक प्रकार का वस्त्र पहनते है। चोटी रखते हैं। अतएव पहचानना कठिन हो जाता है। परन्तु अपनी दूसरी सन् १९६३ की यात्रा में देखा कि आधुनिक जगत् की हवा लद्दाख क्षेत्र तक पहुँच गयी है: पुराने वस्त्रों के स्थान पर नवीन वस्त्र स्त्री तथा पुरुष पहनन लगे हैं। पुरुष प्राय चोटी नहीं रखते। अतएव स्त्री पुरुष का भेद आसानी से अब किया जा सकता है। पुराणों के आख्यान में सत्यता प्रगट होती है कि मनुकी पुत्री इला किम्पुरुष रूप में परिवर्तित हो गयी थी। इस पौराणिक गाथा को इस प्रकार स्पष्टीकरण किया जा सकता है। इला का रूप किन्नरों जैसा था। वह दिन में पुरुषों की वेश भूषा में पुरुष तथा रात्रि में स्त्रियों की वेशभूषा में स्त्री लगने लगती थी। आज कल योनि परिवर्तन अर्थात् पुरुष को स्त्री तथा स्त्री पुरुष हो जाने के समाचार मिलते हैं। परन्तु इस के आख्यान में उसका रूप नित्य बदलना मिलता है। यह सम्भव नहीं मालूम होता। किन्नरों की उत्पत्ति के विषय में दो मत हैं। एक मत है कि वे ब्रह्मा की छाया अथवा उनके पाद अंगुष्ठ से उत्पन्न हुए थे। दूसरा मत है ये ऋषि कश्यप तथा अरिष्टा की सन्तान थे। अमरकोशकार उन्हें दशदेव योनियों में रखता है— विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥ स्वर्ग वर्ग : १ : ११ मत्स्यपुराणकार उन्हें उत्तरीय भारत वसित पर्वतीय जातियों के साथ रखता है। वे हिमालय तथा हेमकूट में निवास करते थे।