भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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परिशिष्ट ङ १०५ निकुम्भ के स्थलों के अतिरिक्त सभी राक्षसादि वर्ग में रखे गये हैं। कश्मीर के नीलमत पुराण ने उसे पिशाचवंशीय माना है । पिशाच आर्य जाति की एक शाखा है । पर्वतीय प्रदेशो में निवास करती थी । हिन्दुकुश, कपिशा, कफरिस्तान, गान्धार, चितराल, कश्मीर के उत्तर तथा पामीर के दक्षिण बिखरे हुए थे। उनके रूप का वर्णन तथा उनका चित्र पर्यटकों ने उक्त क्षेत्रों के लोगों का उन्नीसवी तथा बीसवी शताब्दी के आरम्भ में लिया है । उसे देखने से स्पष्ट होता है कि वे प्राचीनकालीन पिशाच जाति के वंशज हैं। उनका लम्बा बाल रखना, धर्म के प्रति कम आस्था, स्नानादि से दूर रहना, अश्लील शब्दो का विवाह काल में प्रयोग, कन्या को भगा ले जाकर विवाह कर लेना यह सब बातें कुछ दिन पूर्व तक प्रचलित थी। वे खाल के नमस्तीन आदि पहनते हैं । पोस्तीन अर्थात् भैंड़ों के कोमल बाल वाले खालों के वस्त्र तथा टोपी साधा- रणतया प्रयोग करते हैं । कच्चा मांस पूर्वकाल में खाते थे । घुमन्तू जाति थे। जानवरों को पालना मुख्य उद्यम था। मैं अक्टूवर मास में कश्मीर दो बार इसका अध्ययन करने के लिए गया। मैंने देखा कि नीलमत में वर्णित प्रथा अभी तक चली आती है। बकरियों, भैंड़ों, जानवरों और टट्टुओं पर समस्त गृहस्थी रखे वे शीत ऋतु में पर्वतों से नीचे मैदान में उतरते हैं। उनके बाल लम्बे होते हैं। मुसलमान धर्म स्वीकार कर लेने के कारण उनके पूर्व जीवन में विशेष परिवर्तन हो गया है। परन्तु उनका रहन-सहन, उनका व्यवहार, उनकी भाषा पैशाची से मिलती है । पिशाच जाति आर्यों की शाखा होने पर भी अपने कर्मों के कारण, सभ्य समाज से दूर होने के कारण, शेष भारत से कालान्तर में सम्बन्ध न होने के कारण, दुर्गम शीत प्रधान उपत्यकाओ में रहने के कारण आर्य धर्म पालन में तथा युग के साथ चलने में असमर्थ हो गयी । उनके कर्मों के कारण उनका नाम पिशाच रख दिया गया । वायु पुराण (अ० ९७ : ५५) के अनुसार—ब्रह्मा ने सर्व प्रथम देव, असुर, पित्र तथा प्रजा नामक चार प्रकार की सृष्टि की । स्थावर-चरादि अन्यान्य भूतों को उत्पन्न किया । यक्ष, पिशाच, नर, किन्नर, अप्सरा, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी, पशु, मृग, उरग, अव्यय, व्यय, स्थावर, जंगम आदि समस्त पदार्थों को बनाया । भगवान् शंकर देवी पार्वती के साथ कैलास पर थे। वहां विविध रूप धारण करने वाले नाना प्रकार के भूत, भयंकर मायावी पिशाच, अनेक प्रकार के अस्त्रों से सुसज्जित अग्नि तुल्य दीप्त भगवान् की सेवा कर रहे थे। वायु पुराण (अ० ३१) में देव वंश का वर्णन है। उसमें असुर, सुपर्ण, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, उरग, राक्षस, पित्र तथा नासत्य आठों को देव योनि माना गया है। वायु पुराण (३९:५७) में पिशाच नामक गिरि का वर्णन किया गया है। उस पर कुबेर का भवन है। उसने कोठे तथा छत थे । यक्ष तथा गन्धर्व विचरण करते थे । अध्याय ४२:३१ में पिशाचक पर्वत का वर्णन पुनः अलकनन्दा नदी के प्रसंग मे किया गया है। अलकनन्दा समुद्र की ओर हिमालय से गिरती, बहती जाती है। नदी का रंग इस यात्रा में स्थान भेद से परिवर्तित हो जाता है। वह ताम्राभ से श्वेतोहर, सुमूल, वसुधा, हेमकूट, देवशृंग, शैलश्रेष्ठ पिशाचक, पंचकूट, देव निवास, कैलास के शिखर कन्दरामय पार्श्व देश से बहती; अचलोत्तम हिमालय पर गिरती; शैलो, स्थलों को सींचती, वनों एवं कन्दराओ को आर्द्र करती, दक्षिण समुद्र में गिरती है । १४

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