राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ राजतरंगिणी पिशाचों के रंग रूप तथा आचरणों पर वायु पुराण (६९ ∙ २५७-२७९) प्रकाश डालता है— 'पिशाचों का जन्म कपिशा कूष्माण्डी तथा कूष्माण्ड के संयोग से हुआ था। पिशाचों का रंग कपिल अर्थात् भूरा था। कपिश वर्ण होने के कारण उन्हें पिशाच कहा गया। वे मांसाहारी थे। अन्य सोलह पिशाच दम्पति हैं। उनके वंश वर्तमान हैं। ये सब कूष्माण्ड के कुल के हैं। इन कुलों में उत्पन्न होने वाले पिशाच जाति के हैं। 'उनकी आकृति बीभत्स है। निंद्य कर्म करने वाले हैं। उनके शरीर पर बाल होता है। नेत्र गोल होते हैं। दांत तथा नख कड़े होते हैं। अंग टेढ़े-मेढ़े होते हैं। मनुष्य का भक्षण करते हैं। उनका मुख झुका रहता है। 'कूष्माण्डिक जाति के पिशाच को केश नहीं होता। उनके शरीर पर रोमावलियां नहीं दिखाई पड़तीं। चमड़ा, चर्बी आदि वस्त्र की जगह लपेटे रहते हैं। मांस तथा तिल का आहार करते हैं। वक्र जाति के पिशाचों के अंग, हाथ, पैर टेढ़े होते हैं। चलने समय वह टेढ़ीमेढ़ी चाल चलते हैं। वक्रगामी हैं। इच्छानुसार रूप धारण करते हैं। निगुन्दर जाति के पिशाचों की नासिका उठी रहती है। पेट लम्बा होता है। शरीर छोटा होता है। सर छोटा होता है। हाथ छोटा होता है। तिल भक्षण करते हैं। उनके कान सुन्दर होते हैं। अतर्क पिशाच बौने होते हैं। बहुत बोलते हैं। उछल-उछलकर चलते हैं। वृक्षों पर निवास करते हैं। वृक्षों पर ही आहार करते हैं। पांशु पिशाच ऊर्ध्व धातुवारी होते हैं। रोम ऊपर उठे होते हैं। आवास ऊपर उठे होते हैं। अंगों से धूल गिराते चलते हैं। उपवीर पिशाच सूखे होते हैं। मूंछ-दाढ़ी रखते हैं। चीर धारण करते हैं। श्मशानों में निवास करते हैं। उलूखल पिशाचों की आँखें निश्चल होती हैं। उनकी जिह्वा लम्बी होती है। जीभ से ओठ चाटते रहते हैं। हाथी तथा ऊंट की तरह उनका सिर मोटा होता है। विरत तथा समूह बांधकर झुण्ड में चलते हैं। कुम्भपात्र पिशाच विना देखे अन्न का भोजन करते हैं। सूक्ष्म आकृति वाले होते हैं। शरीर पर रोमावली होती है। पीत वर्ण होते हैं। निपुण पिशाचों के मुख कानों तक फैले होते हैं। भौंहें लम्बी होती हैं। नाक मोटी होती है। पूरण पिशाच शून्य भवनों में निवास करते हैं। शरीर मोटा होता है। हाथ-पैर बहुत छोटे होते हैं। बाँह पृथ्वी पर लगी रहती हैं। बालकों का भक्षण करते हैं। सूतिका गृहों का सेवन करते हैं। मासभक्षी पिशाचगण के हाथ-पैर पीछे की ओर झुके रहते हैं। कद छोटा होता है। वायु के समान वेगशाली होते हैं। युद्ध भूमि में रक्त का पान करते हैं। स्तम्बी पिशाच नग्न रहते हैं। खानाबदोश होते हैं। उनके केश लम्बे होते हैं। पिण्डाकार प्रतीत होते हैं। अन्य पिशाचगण उच्छिन्ननासी होते हैं। पिशाचों के रहन-सहन तथा जीविका का उल्लेख वायु पुराण (६९ : २८०-२८८) करता है— 'विभिन्न आकृति एवं गुण-दोष युक्त पिशाचगण अल्प बुद्धि तथा दीन थे। ये प्रातः तथा सायंकाल विचरण किया करते थे। गिरे पड़े, खण्डहरों, जहाँ बहुत कम लोग रहते हैं, जहाँ दुष्ट निवास करते हैं, जो मकान लीपा पोता नहीं जाता, बेमरम्मत रहता है, वहाँ वे निवास करते हैं।