भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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११८ राजतरंगिणी से युद्ध में भाग लिये थे। वह युद्ध सातवी शताब्दी के प्रारम्भिक काल में हुआ था। बाण ने प्रभाकर वर्धन को अराजक लाटजनों के लुटेरा रूप में चित्रित किया है। निस्सन्देह लाट जाति जब स्वतन्त्र अस्तित्व रखती थी तो वह भारत को एक प्रसिद्ध गौरवशालिनी जाति थी। पुलिकेशिन द्वितीय की एहोल प्रशस्ति (शक संवत् प्रसिद्ध ५५६ में लाट का उल्लेख किया गया है। उसमे उल्लेख है। उस शक्ति से लाट, मालव गुर्जर को उसने किस प्रकार अधीनस्थ राजा सदृश आचरण करने के लिये वाध्य किया। गुजरात राज नशोह तथा राष्ट्रकूट के दानपत्रो से प्रतीत होता है कि शासकीय विभाजन केवल सौराष्ट्र में ही नही अपितु आनर्त देश में भी थे। वे लाट देश में भी पाये जाते थे। (एनसियण्ट हिस्टोरी आफ सौराष्ट्र डॉ० के० जे० काजी) धी जे० घ. प्लीट का मत है कि लाट देश की संज्ञा पुरा काल में वडोदा तथा सूरत क्षेत्र से दी जाती थी।