राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 928, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट 'द' चोल ( तरंग १ : ३०० : पृष्ठ ३११ ) कर्नल जेरिनी ने 'चोल' शब्द को संस्कृत शब्द 'काल' तथा 'कोल' से सम्बन्धित करने का प्रयास किया है। उसे कृष्ण वर्ण आर्य समुदाय का सूचक माना है। संस्कृत शब्द 'चोर' तथा तामिल शब्द 'चोलम्' से भी सम्बद्ध किया जाता है । बात कुछ तथ्यहीन मालूम पडती है । चोल शब्द प्राचीन काल से चोल वंश तथा भूखण्ड के लिए प्रयुक्त होता रहा है । एक मत है कि ये 'शिवि' वंशीय है। बारहवी शताब्दी के अनेक राजवंशो ने करिकाल से उद्भूत अपने को कश्यप ,गोत्रीय माना है। कात्यायन ने उन्हें चोड लिखा है । संगम युग काल में चोलों ने दक्षिणी भारतीय इतिहास को सर्वप्रथम प्रभावित किया था । तत्पश्चात् उनका इतिहास लुप्त हो जाता है । नवीं शताब्दी में चोलों का पुनः पुनरुत्थान हुआ । इस वंश का संस्थापक विजयपाल ( स० ८५०- ८७०-७१ ई० ) पल्लव राजा के शासन में उरैपुर प्रदेश का शासक था। उसकी वंश परम्परा में २० राजा हुए । जिन्होंने लगभग ४०० वर्षों तक शासन किया था । इस वंश का प्रतिभाशाली राजा राजराज का पुत्र राजेन्द्र प्रथम ( सन् १०१२ से १०४४ ई० ) था । उसने चेर पाण्ड्य तथा सिंहल विजय किया था । कलिंग जीतता हुआ यह दक्षिण बंगाल और दक्षिण कोशल तक पहुँचा था । वह गंगाजल लाना चाहता था । उसने पराजित राजाओं से अपने लिए गंगाजल ढुलवाया । चोल राज्य पूर्वीय सागर तट, पेन्नार नदी से वेल्लारु तथा पश्चिम में कुर्ग तक विस्तृत था । यह भी मत है। वेल्लारु नदी के उत्तर-दक्षिण ( एक ही नाम की दो नदिया हैं ) पूर्व में समुद्र तथा पश्चिम में कोट्टाडंबकराय तक चोल क्षेत्र फैला था । वर्तमान त्रिचनापल्ली, तंजोर तथा पदुकोटाह का उसमें कुछ भाग सम्मिलित था । राजधानी उरगपुर किंवा उरैपुर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी । कवि दण्डी ने अपने काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया है। कावेरी पट्टन कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य का बड़ा बन्दरगाह था । कांची अर्थात् वर्तमान काजीवरम चोल प्रदेश का विशाल नगर था । नागपटन अर्थात् नागीपतनम भी इसका एक बन्दरगाह था। नागोपतनम बन्दरगाह आज भी चलता है। मैं यहां दो बार आ चुका हूँ । समुद्र उथला होने के कारण जहाज २ मील दूर समुद्र में ठहरते हैं । तंजोर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोणम पूर्वकालीन चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर थे । और आज भी है। ग्यारहवी तथा बारहवी शताब्दी में गंगई कोण्डा, चोलपुरम चोल राज की राजधानी थी । दक्षिण भारत के अभिलेखों में कावेरी नदी का नाम चोल दिया गया है। चोल शब्द देश तथा देशवासी दोनों के लिए प्रयुक्त किया है । ( सभा पर्व ५२ : ३५ ) । मार्कण्डेय ( ५७:५:४५ ), वायु ( ४५:५:१२४ ) तथा मत्स्य पुराणों ( ११२:५:४६ ) में चोल राज्य का नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ मिलता है। पद्म पुराण ( ३०, १०८, १०९ ); तथा स्कन्द पुराण ( २:४:२६-२७ ) में भी उल्लेख मिलता है ।