राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
परिशिष्ट 'द' चोल ( तरंग १ : ३०० : पृष्ठ ३११ ) कर्नल जेरिनी ने 'चोल' शब्द को संस्कृत शब्द 'काल' तथा 'कोल' से सम्बन्धित करने का प्रयास किया है। उसे कृष्ण वर्ण आर्य समुदाय का सूचक माना है। संस्कृत शब्द 'चोर' तथा तामिल शब्द 'चोलम्' से भी सम्बद्ध किया जाता है । बात कुछ तथ्यहीन मालूम पडती है । चोल शब्द प्राचीन काल से चोल वंश तथा भूखण्ड के लिए प्रयुक्त होता रहा है । एक मत है कि ये 'शिवि' वंशीय है। बारहवी शताब्दी के अनेक राजवंशो ने करिकाल से उद्भूत अपने को कश्यप ,गोत्रीय माना है। कात्यायन ने उन्हें चोड लिखा है । संगम युग काल में चोलों ने दक्षिणी भारतीय इतिहास को सर्वप्रथम प्रभावित किया था । तत्पश्चात् उनका इतिहास लुप्त हो जाता है । नवीं शताब्दी में चोलों का पुनः पुनरुत्थान हुआ । इस वंश का संस्थापक विजयपाल ( स० ८५०- ८७०-७१ ई० ) पल्लव राजा के शासन में उरैपुर प्रदेश का शासक था। उसकी वंश परम्परा में २० राजा हुए । जिन्होंने लगभग ४०० वर्षों तक शासन किया था । इस वंश का प्रतिभाशाली राजा राजराज का पुत्र राजेन्द्र प्रथम ( सन् १०१२ से १०४४ ई० ) था । उसने चेर पाण्ड्य तथा सिंहल विजय किया था । कलिंग जीतता हुआ यह दक्षिण बंगाल और दक्षिण कोशल तक पहुँचा था । वह गंगाजल लाना चाहता था । उसने पराजित राजाओं से अपने लिए गंगाजल ढुलवाया । चोल राज्य पूर्वीय सागर तट, पेन्नार नदी से वेल्लारु तथा पश्चिम में कुर्ग तक विस्तृत था । यह भी मत है। वेल्लारु नदी के उत्तर-दक्षिण ( एक ही नाम की दो नदिया हैं ) पूर्व में समुद्र तथा पश्चिम में कोट्टाडंबकराय तक चोल क्षेत्र फैला था । वर्तमान त्रिचनापल्ली, तंजोर तथा पदुकोटाह का उसमें कुछ भाग सम्मिलित था । राजधानी उरगपुर किंवा उरैपुर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी । कवि दण्डी ने अपने काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया है। कावेरी पट्टन कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य का बड़ा बन्दरगाह था । कांची अर्थात् वर्तमान काजीवरम चोल प्रदेश का विशाल नगर था । नागपटन अर्थात् नागीपतनम भी इसका एक बन्दरगाह था। नागोपतनम बन्दरगाह आज भी चलता है। मैं यहां दो बार आ चुका हूँ । समुद्र उथला होने के कारण जहाज २ मील दूर समुद्र में ठहरते हैं । तंजोर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोणम पूर्वकालीन चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर थे । और आज भी है। ग्यारहवी तथा बारहवी शताब्दी में गंगई कोण्डा, चोलपुरम चोल राज की राजधानी थी । दक्षिण भारत के अभिलेखों में कावेरी नदी का नाम चोल दिया गया है। चोल शब्द देश तथा देशवासी दोनों के लिए प्रयुक्त किया है । ( सभा पर्व ५२ : ३५ ) । मार्कण्डेय ( ५७:५:४५ ), वायु ( ४५:५:१२४ ) तथा मत्स्य पुराणों ( ११२:५:४६ ) में चोल राज्य का नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ मिलता है। पद्म पुराण ( ३०, १०८, १०९ ); तथा स्कन्द पुराण ( २:४:२६-२७ ) में भी उल्लेख मिलता है ।
१२० राजतरंगिणी रामायण किष्किन्धा काण्ड (४१:१३) में चोल का उल्लेख आन्ध्र, पुण्ड, पाण्ड्य, केरल के साथ किया गया है। उसकी दिशा दक्षिण बतायी गयी है। कावेरी नदी का उल्लेख इसी स्थल पर किया गया है। महाभारत सभा पर्व (२७:२१) में उल्लेख है। अर्जुन ने चोल सेना पर विजय प्राप्त किया था। भीष्म पर्व (९:६० तथा ५०:५१) में उल्लेख मिलता है कि धृष्टद्युम्न द्वारा निर्मित क्रोंच व्यूह के दक्षिण पार्श्व में चोल सैनिक रक्षा निमित्त तत्पर थे। कर्ण पर्व (१२:१५) में उल्लेख आता है। पाण्डवों का पक्ष चोल ने महाभारत युद्ध में लिया था। द्रोण पर्व (११:१७) में वर्णन मिलता है। भगवान् कृष्ण ने इस देश को जीता था। कात्यायन ने पाणिनि के वार्तिक में चोल तथा पांड्य का उल्लेख किया है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी (४.१:१७५:७) में काचीपुरम का उल्लेख किया है। अशोक ने द्वितीय और तेरहवें शिलालेख में चोल, पाण्ड्य, केलल पुत्तो (केरल) तथा सतियपुत्तो (सत्यपुत्र) का उल्लेख किया है। तिब्बतीय बौद्ध ग्रन्थो से मालूम होता है। मौर्यों ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। इसका समर्थन आधुनिक अनुसन्धानों से मिलता है। महावंश में चोल तथा कावेरी पत्तनम का उल्लेख है। जातक में कावेरी पत्तनम का उल्लेख मिलता है। चोल का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा है। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में चोल का उल्लेख किया है। (४:१:१७५) बौद्ध ग्रन्थों में समन्त पसा- दिका तथा जातक में कोल जनपद का अर्थ चोलजनपद लगाना चाहिए। चीनियों ने चोल देश का नाम चुल्ली-ए रखा है। उसका क्षेत्र २४०० ली बताते है। यहा संघाराम तथा देव मन्दिरो की प्रचुरता थी। परमार राज लक्ष्मणदेव की प्रशस्ति में चोल विजय का वर्णन है। यह कल्पना मात्र प्रतीत होती है। पोल ने चाल का उल्लेख 'सोर' शब्द से किया है। उस पर अरकाट का शासन होना बताता है। मार्कण्डेय पुराण (५७०८५), वायु पुराण (४५ १२४), मत्स्य पुराण (१२१:४६) में चोल देश का उल्लेख है। मार्कण्डेय पुराण में—'चोला: कुल्यास्तथैव च' वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में—चोल्या: कुल्यास्तथैव च' शैलेन्द्र साम्राज्य के विरुद्ध राजेन्द्र चोल ने मलय, जावा, सुमात्रा पर जहाजी बेड़े से आक्रमण कर, विजय प्राप्त किया था। भारत का यह अभूत पूर्व नाविक अभियान एवं नौशक्ति प्रदर्शन भारतीय इतिहास के लिये गौरव की बात है। इस वंश में राजाधिराज प्रथम, कुलोत्तुंग तथा विक्रम चोल आदि शक्ति सम्पन्न और प्रतिभाशाली राजा हुए थे। चोल वंश का अंतिम राजा राजेन्द्र तृतीय था। तत्पश्चात् चोल राज्य पाण्ड्य के आधीन हो गया। सन् १३१० ई० में अलाउद्दीन खिलजी के समय मलिक काफूर ने आक्रमण कर चोल सत्ता उसी प्रकार नष्ट कर दी जिस प्रकार सन् १३३९ ई० में शाहमीर ने कोटारानी को राज्यच्युत कर दिया था। चोलों के आम लेखो से ज्ञात होता है। उनकी राज्य व्यवस्था सुसंपादित थी। राज्य अनेक मण्डलों में विभाजित था। मण्डल को कोट्टम् किंवा वलनाडु कहते थे। तत्पश्चात् नाडु अर्थात् जिला और उसके पश्चात् कुर्रम् तथा ग्राम थे। चोल राज्य में जन सभाओं द्वारा कार्य संचालन होता था। इन सभाओं का नाम 'उर' था। उन्हें सभा भी कहते थे। सभा की कार्यकारिणी अर्थात् आलुगणम् का निर्वाचन सभासद परस्पर मिलकर करते थे। मैमूर से प्राप्त लेख से ग्राम सभा के कार्यों पर प्रकाश पड़ता है। ग्राम शासन
परिशिष्ट 'द' ३३१ पाँच उपसमितियों द्वारा होता था। कार्य काल एक वर्ष तथा सदस्यता अवैतनिक होती थी। उनके कार्यों में राजा किंवा सम्राट् भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे। चोल राजा निर्माण प्रिय थे। उन्होंने विशाल भवनों, मन्दिरों का निर्माण कराया है। तंजौर का राजेश्वर मन्दिर राजा राजराज ने निर्माण कराया था। उसको भित्तियों पर चित्र महत्त्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय हैं। राजेन्द्र प्रथम ने इसी प्रकार का मन्दिर त्रिचनापल्ली में निर्माण कराया था। तत्कालीन धातु एवं पाषाण मूर्ति कलापूर्ण एवं सजीव है। कश्मीर के समान चोल राज्य में भी साहित्य की विशेष प्रगति तथा उन्नति हुई थी। शक्तिशाली राजाओं के विजय प्रसंग को लेकर अनेकानेक प्रशस्ति पूर्ण ग्रन्थों की रचना की गयी थी। कुलोत्तुंग तृतीय के शासन काल में कंबन कवि ने कम्बु रामायण की रचना की थी। व्याकरण, कोश, काव्यशास्त्र तथा छंद आदि विषयों की रचना का यह गौरवमय काल था। सम्राट् किंवा राजा अपने जीवन काल में ही युवराज का चयन कर लेता था। सामंतों पर कठोर नियन्त्रण रखता था। उडनकुट्टम अधिकारी गण राजा को सर्वदा सलाह देते थे। उसके सम्पर्क में रहते थे। सम्राट् के निकट एक संगठित विभाग था। उसे ओले कहते थे। अधिकारियों के निम्न शिरुदनम् तथा उच्च पेरुंदनम् वर्ग थे। केन्द्रीय तथा स्थानीय अधिकारियों से सम्पर्क एवं नियन्त्रण रखने के लिये कणक्कगणी अधिकारी होते थे। भूमि व्यवस्था सुचारु थी। समस्त भूमि नापी हुई थी। उनको करमुक्त तथा करयुक्त दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया था। कर के लिये समग्र ग्राम उत्तरदायी होता था। भूमिकर के अतिरिक्त चुंगी, व्यवसाय तथा भवनों पर भी कर लगते थे। स्थानीय संस्थाएँ सुसंगठित थी। स्थानीय जीवन के विभिन्न अंगों के लिये विभिन्न संस्थाएँ थी। सेना भी गठित थी। राज्यों के विभिन्न भागों में उसके शिविर या कडगम थे। न्याय, सामाजिक व्यवस्थाओं, लेखपत्र, साक्षी आदि प्रमाणों के आधार पर होता था। नगरम् उन स्थानों की संस्थायें थी जहाँ व्यापारी किंवा व्यवसायी वर्ग प्रमुख था। उर ग्रामीणों की सभा थी जिनके पास भूमि होती थी। ब्रह्मदेय ग्रामों में ब्राह्मणों की सभा थी। सभायें कार्य के लिये स्वतन्त्र थीं। किन्तु ग्रामों के आय व्यय का निरीक्षण राज्य के अधिकारी करते थे। कार्यों के संचालन के लिये समितिया थी। उन्हें वारियम् कहते थे। उनकी सभा द्वारा उनके विधान में संशोधन, परिवर्तन एवं परिवर्धन किया जाता था। कश्मीर के समान चोल नरेशों ने सिंचाई तथा कृषि समृद्धि की सुनियोजित व्यवस्था की थी। वे बाँध बँधवाते थे। नदियों का प्रवाह रोका था। कूप तथा सरो की श्रृंखलायें बनवायी थीं। कावेरी जैसी बड़ी नदी पर बाँध बँधवाया था। गंगैकोड-चोलपुरम् के समीप राजेन्द्र प्रथम ने एक सर खुदवाया था। उसपर सोलह मील लम्बा बाँध था। इसमें दो नदियों से जल लाया गया था। उससे पाषाण प्रणालियाँ तथा नहरें सिंचाई के लिये निकाली गयी थी। सरोवरों, वापियों तथा नदियों पर कश्मीर के वितस्तादि तट तुल्य घाट बने थे। प्रशस्त राजपथो से नगर शोभित था। सामाजिक व्यवस्था कश्मीर के समान धर्मशास्त्र पर आधारित थी। नारियाँ कश्मीर के समान स्वतन्त्र रूप से कार्य कर सकती थीं। उन पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था। ये सम्पत्ति की स्वामिनी हो सकती थी। बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। सती का प्रचलन था। मन्दिरों में देवदासियाँ होती थीं। १६
१२२ राजतरंगिणी आर्थिक ढाँचा कृषि पर आधारित था । तथापि गृह शिल्प, व्यवसाय तथा व्यापार खूब होता था । व्यापा- रियों की एक विशाल श्रेणी थी । उसे नाना देश-तिसैयायिरत्तु-ऐनूजूंबंर कहते थे । वह जावा, सुमात्रा तथा दक्षिण पूर्व एशिया से व्यापार करती थी । वह वलंगे तथा इडंगे वर्गों में विभाजित था । कश्मीर के समान चोल शिव उपासक थे । परन्तु बुद्ध, जैन तथा अन्य सम्प्रदायों के प्रति सहिष्णुता एवं समानता का व्यवहार किया जाता था । पुराकालीन तमिल धार्मिक पद वेदों के समान आदर पाते थे । उनके रचयिता वेद ऋचाओ के ऋचाकार ऋषियों तुल्य पूजे जाने लगे । नेंबि आडार नंबि ने शैव ग्रन्थों का संकलन सर्व प्रथम किया था। इसी प्रकार नाथ मुनि ने वैष्णव ग्रन्थों का संकलन किया था । भक्ति मार्ग का दार्शनिक स्वरूप जगत् के सम्मुख रखा था । उनके पौत्र यामुनाचार्य किंवा आलवंदार वैष्णव आचार्य थे । रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया । मन्दिरो की विधि मे परिवर्तन किया । वर्ष में एक दिन मन्दिरो में हरिजन प्रवेश की व्यवस्था की । पाशुपत, कापालिक, तथा कालामुख जैसे सम्प्रदाय थे । उनमें कुछ स्त्रीतत्व की आराधना करते थे । देवी के उपासक अपना मस्तक भी काटकर देवी के चरणों में अर्पित करते थे । कश्मीर राजा ललितादित्य का वृत्तान्त इस प्रथा की ओर संकेत करता है । मन्दिर सामाजिक जीवन के केन्द्र थे । कश्मीर के समान चोल राज्य था । प्रत्येक ग्राम मन्दिर श्रृंखलाओ से पूर्ण था । मन्दिर शिक्षा के केन्द्र थे । वहाँ नृत्य, गान, नाट्य, मनोरंजन, आमोद प्रमोद के आयोजन होते थे । कश्मीर के अग्रहारो के समान चोल राज्य में भी मन्दिरो पर भूमि चढ़ायी जाती थी । मन्दिर भूसम्पत्ति का स्वामी होता था । मन्दिर की सम्पत्ति से बैंकिग का कारबार चलता था । चोल राज काल में कांस्य मूर्तियों का प्रचलन बहुत हो गया था। नटराज की मूर्ति विश्वविख्यात है । तमिल साहित्य में चोल शासन काल स्वर्णिम युग कहा जाता है । प्रबन्ध साहित्य की प्रचुरता थी । चोल वंश के अभिलेखों से प्रकट होता है कि कश्मीर के समान चोल राजाओं ने संस्कृत, साहित्य एवं भाषा अध्ययन के लिये ब्रह्मपुरी, घटिका तथा पाठशालाएं स्थापित करायी थी । उनकी व्यवस्था हेतु समुचित दान दिया था । ऋग् वेद का भाष्य वैंकट माधव ने किया था । केशव स्वामिन् ने नानार्थार्णव संक्षेप कोश की रचना की थी । जैन एवं बौद्ध साहित्य ने भी चोल राज में प्रगति की थी। जैन कवि तिरुत्तक् कदेवर ने तमिल महाकाव्य जीवकचिंतामणि की रचना दशवी शताब्दी में की थी । जैन विद्वान् अमित सागर ने छंदशास्त्र पर छप्पु रुंगलम नामक ग्रन्थ तथा उसके संक्षिप्त संस्करण करिगै की रचना की थी । व्याकरण ग्रन्थों की भी रचना की गयी थी । वैष्णव आचार्य नाथ मुनि, यामुनाचार्य एवं रामानुजाचार्य ने संस्कृत में ग्रन्थों की रचना की थी । कश्मीर के समान चोल राज्य में संस्कृत खूब फलती और फूलती रही है । मत्स्य पुराण में 'चोलाः कुल्यास्तथैव च।' वामन पुराण में 'चोलकुल्याश्च राधस' का उल्लेख आया है । शक्ति संगम तंत्र ( ३ : ७ : २२ ) में उल्लेख किया गया है : द्राविड़तैलंगयोर्मध्ये चोलदेशः प्रकीर्तितः । लम्पकणांश्च ते प्रोक्ता भेद्रोऽस्यावान्तरो भवेत् ॥ २२ इससे प्रकट होता है कि चोल देश द्रविड़ तथा तैलंग देश के मध्य स्थित था ।
परिशिष्ट 'घ' दरद ( तरंग १ : ३१२ पृष्ठ १२८, ३२२ ) पुराणों में उल्लेख आता है : काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा ह्यङ्गलोकिकाः । चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुला बाह्यतोदराः ।। ( वामन० पु० १३.५० ) × × × दरदांश्च स काश्मीरान् गान्धारान् भौरसान् कुहून् । मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराणों में 'काम्बोजा दरदाश्चैव' एक साथ प्रयुक्त किया गया है। कृष्णगंगा के ऊर्ध्वभागीय उपत्यका के उत्तरीय कश्मीर में दरदों का स्थान है। उसे आज भी दर- दिस्तान कहते हैं। दरदापुर किंवा दरतपुरी वहाँ का नगर है। दरद क्षेत्र को दरस भी कहते हैं ( वायु० : ४५ : ११ ९, मत्स्य १२१ : ४६ विष्णुधर्मोत्तर १ : १० : ९, मार्कण्डेय ५७ : ४० ) वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में 'दरदांश्च सकाश्मीरान्', वायु पुराण में 'दरदांश्च सकाश्मीरान', 'मत्स्य पुराण में', 'दरदोर्ज- गुडाश्चैव' का उल्लेख मिलता है। स्पष्ट है कि दर्दिस्तान को कश्मीर के साथ रखा गया है। कुबेर का स्थान सुमेरु पर्वत है । वर्तमान पामीर है । दरद देश पामीर के दक्षिण में है। दर्दुर पर्वत का उल्लेख सभा पर्व ( १० : ३२ ) में आया है। उसके अधिष्ठाता कौरवों की सभा में रहते थे। प्रायः दरद जाति का उल्लेख पिशाच, पुण्ड्र, तंगण, परितंगण, बाहिक आदि के साथ मिलता है। दारदिक तथा पैशाची भाषा को आर्य भाषा की एक शाखा माना गया है। एक मत है कि वह ईरानी तथा भारतीय भाषा के मध्य की भाषा थी । ( ग्रीयर्सन पैशाच आफ नार्थ बेस्ट द्रविड ३ ) जातकों में दद्दुर पर्वत का उल्लेख मिलता है। इसे हिमालय के अन्तर्गत माना गया है। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दर्दुर पर्वत यही दद्दुर पर्वत है। यूनानी इतिहासकारों ने दरदाई जाति का वर्णन किया है। यह जाति दद्दुर पर्वत माला में निवास करती थी। कश्मीर उपत्यका के उत्तर में स्थित है। चेतिय जातक की गाथा है। दद्दरपुर के उपचर के पाँचों पुत्रों ने पाँच नगर हत्थिपुर ( हस्तिनापुर ) अस्सपुर (अंग में ) सीहपुर ( लालराष्ट्र उत्तरीय पंजाब ) उत्तर पंचाल ( सम्भवतः अहिच्छत्र ) तथा दद्दरपुर बसाया था । दद्दरपुर नाम रखने का कारण दिया गया है। वहाँ दो पर्वतों के मध्य रगड़ द्वारा दद्दर ध्वनियां उठती रहती थीं। मनुस्मृति में मनु ने ( १० : ४४ ) दरद जाति का उल्लेख किया है। हरिवंश पुराण में वर्णन है—कश्मीर राज गोनर्द के साथ दरद राज ने भी जरासंध का पक्ष लेकर कृष्ण के विरुद्ध मथुरा में युद्ध किया था । अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान् । दक्षिणं शैलनिचयं दारयिष्यामि देशितः ॥ हरिवंश विष्णु पर्व ४२ : ३७
१२४ राजतरंगिणी दरद राज ने जरासन्ध के पक्ष में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी : एष्यत्के तु नृपतिर्दरदो नाम वीर्यवान् । रामं हलाग्रोप्रभुजं प्रत्ययात् सैन्यमध्यगम् ॥ ५५ ॥ × × × तद् युद्धमभवत् ताभ्यां रामस्य दरदस्य च । युधे लोकवरिष्ठाभ्यां कुशलाभ्यामिनौजसा ॥ ५७ ॥ योजयित्वा ततः स्कन्धे रामो दरदमाहवे । हलेन बलिनां श्रेष्ठो मुसलेनावपोधयत् ॥ ५८ ॥ स्वकायगतमूर्द्धा वै मुसलेनावपोधितः । पपात दरदो भूमौ दारिताब्धं इवाचलः ॥ ५९ ॥ रामेण निहते तस्मिन् दरदे राजसत्तमे । जरासंधस्य राज्ञस्तु रामेणासीत् समागमः ॥ ६० ॥ स्कन्द पुराण के देशो की तालिका मे दरद का स्थान १० वा तथा ग्राम-संख्या ३ लाख ५० हजार दी गयी है । महाभारत सभा पर्व ( ४४ : ८ ) में उल्लेख मिलता है । अर्जुन ने उत्तर दिशा दिग्विजय काल में दरद देश पर विजय प्राप्त किया था । इसी ( ५२ : १३ ) में उल्लेख है । वनवास काल में सुबाहु की राज- धानी जाते समय पाण्डव लोग दरद देश द्वारा गमन किये थे । हिमालय पर्वतीय जातिया तथा प्रदेश भारतीय राजनीति तथा युद्धों में भाग लेती रही है । इस अंचल के लोग वीर माने जाते रहे हैं । महाभारत उद्योग पर्व ( ४ : १५ ) में उल्लेख मिलता है कि पाण्डवो ने अपने पक्ष से युद्ध करने के लिए दरद लोगों को आमन्त्रित किया था । इस देश की जो भौगोलिक स्थिति महाभारत में दी गयी है वह आज भी मिलती है । इसे पूर्वोत्तर दिशा का देश माना है । कश्मीर के पूर्वोत्तर इनका क्षेत्र इस समय कम विस्तृत है । परन्तु महाभारत काल में प्रतीत होता है कि इसका विस्तार आज की अपेक्षा पूर्व दिशा की ओर अधिक था । ( भीष्म पर्व ९ : ६७ ) । दरद देश के योद्धा दुर्योधन की सेना में थे । उनकी ओर से युद्ध में भाग लिया था ( भीष्म पर्व ५१ : १६ ) । कथा है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने इस देश को जीता था ( द्रोण पर्व ७० : ११ ) । श्रीकृष्ण के विरुद्ध दरद लोगों ने जरासन्ध के पक्ष से युद्ध किया था । वहाँ का राजा उस युद्ध में मारा गया था । दरद देश के लोगों ने सात्यकि पर आक्रमण किया था । सात्यकि ने इन लोगो का संहार किया था । अनुशासन पर्व में इनके जाति के विषय में कहा गया है कि यह लोग क्षत्रिय थे परन्तु ब्राह्मणो के प्रति ईर्ष्या एवं द्वेष रखने के कारण शूद्र हो गये थे । दरद लोग उत्तरीय पश्चिमी भारत के अंचल में रहते थे । उत्तर-पश्चिमीय भारतीय क्षेत्र द्वारा विदेशी लोग भारत में आते थे । विदेशी लोग भारतीय आर्य परम्परा से भिन्न होते थे । विदेशियो के संसर्ग के कारण उत्तर-पश्चिम सीमान्त स्थित हिन्दुओं की परम्परा पर प्रभाव पड़ता था । वह प्रभाव उनके जीवन तथा आचरण को प्रभावित करता था । शीतल जलवायु तथा परिश्रमी जीवन के कारण शरीर गठन पुष्ट एवं स्वस्थ होता था । ये सुन्दर होते थे ।
परिशिष्ट 'घ' १२५ प्रकृति के साथ दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष करते रहने के कारण उनका स्वभाव लड़ाकू हो जाता था । अच्छे सैनिक समझे जाते थे । परस्पर संघर्ष करते रहते है। गोत्रीय प्रवृत्ति विदेशी तथा अन्य जातियो के आक्रमण तथा उनके भय के कारण जागृत रहती थी । इस प्रकार वे अपनी स्थिति और व्यक्तित्व रखने में सफल रहे । पुराकाल में यातायात तथा परिवहन सुगम नही था । कम सम्पर्क होने के कारण उत्तर-पश्चिम की जातियों के विषय में समय-समय पर विभिन्न धारणाएँ बनती और बिगड़ती रही है । उनकी भौगोलिक स्थिति के विषय में भी परस्पर विरोधी उल्लेख मिलते है । परन्तु एक बात में सभी एक मत है । वे पर्वतीय जाति थे । उनका निवास भारत के उत्तर-पश्चिम सीमान्त पर था । दरदों के प्रदेश, सीमा तथा क्षेत्र के सम्बन्ध में यदि कही अन्तर अथवा भिन्नता पुराकालीन ग्रन्थों में दिखाई पड़ती है तो उसका एकमात्र कारण ग्रन्थों का रचना-काल तथा तत्कालीन परिस्थितियों में इन पर्वतीय जातियों के विभिन्न राजनीतिक, भौगोलिक स्थिति दी थी । उत्साही, कर्मठ तथा वीर राजाओ अथवा नेताओ के काल में राज्य का विस्तार होता था । गौरव तथा महत्त्व बढ़ता था । उसके अभाव में राज्य की सीमा संकुचित होती थी । प्रदेश पतनोन्मुख होता था । अतएव दरदों की राज्य-सीमा के विषय में विभिन्न उल्लेख मिलते हैं। एक बात में सब एक मत हैं। वे कश्मीर के उत्तर पश्चिम सिन्धु घाटी में निवास करते थे । उनके राज्य की सीमा उन्नति काल में वर्तमान लेक साल्ट तक पहुँच जाती थी । अतएव उनके उत्तर-पूर्व में रहने का भी उल्लेख मिलता है । यह बात सर्वत्र मानी गयी है । इस समय जहां ददिस्तान अर्थात् कश्मीर का उत्तरीय पूर्वीय पर्वतीय भूभाग जो सिन्धु घाटी को छेंके हैं, वही उनका स्थान था । महाभारत तथा पुराणो में स्पष्ट उल्लेख मिलता है । वे भगवान् श्री कृष्ण के विरुद्ध जरासन्ध का पक्ष ले करके युद्ध करते थे । मथुरा नगर के घेरे में सम्मिलित हुए थे । बलराम ने युद्ध में दरदराज को मारा था । कौरव की ओर से खस, शक, यवन, त्रिगर्त तथा मालव के साथ महाभारत युद्ध में दरद भाग लिये थे । ( द्रोण पर्व १०:१८ ) मत्स्य पुराण में उल्लेख आता है । उनका देश गान्धार, शिवपुर, उसमा आदि औरस लोगों की तरह सिन्धु उपत्यका का एक भाग था ( २:१८४ ) । विष्णु पुराण उन्हें आभीर तथा कश्मीर से सम्बन्धित करता है ( १११:४५-५१ ) वे दरद किंवा दर्दुर पर्वत माला में रहते थे । अतएव उनका नाम दरद पड़ा । उनके इस अंचल में रहने के कारण पर्वतमालाओं का नाम दरद पर्वत पड़ सकता है । पाश्चात्य लेखक श्री स्टावों उन्हें दरदाई नाम से अभिहित करता है । श्री प्लेनी ने उन्हें दरदेई भी कहा है । श्री फिरोज उन्हें दरदाई नाम से सम्बोधित करता है। वह लम्पक ( लगमान ) तथा सेनि- स्टेन ( स्वात ) उपत्यका तथा सिन्धु उपत्यका के अधो भाग में उनका स्थान बताते है । वह कहता है । दरद देश की पर्वतमालाएँ विचित्र रूप से ऊँची है । यह पर्वत वर्तमान जिला दरदो है । पाक-कश्मीर युद्ध की विराम रेखा के कारण अधिकांश भाग पाकिस्तान के अनधिकृत अधिकार में है । राजतरंगिणी में दरदों का प्रायः उल्लेख किया गया है । उन्होंने कश्मीर के जीवन को प्रभावित किया था । दरद शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त किया गया है। महाभारत आदिपर्व में बाल्हीक देश के एक राजा का वर्णन है । वह सूर्य नामक असुर के अंश से उत्पन्न हुआ था । ( आदि पर्व ६७:५८ ) इनके कारण पृथ्वी भार से दब-सी गयी । ( सभा पर्व ४४:८ ) दरद की संज्ञा महाभारत में एक देश से भी दी गयी है । उत्तर दिग्विजय काल में अर्जुन ने इसे जीता था । ( सभा पर्व २७:२७ )
१२६ राजतरंगिणी राजा युधिष्ठिर को दरद देश निवासियों ने उपहार दिया था । ( सभा पर्व ५२:१३ ) वनवास काल में सुबाहु की राजधानी में जाते समय पाण्डव लोग दरद देश होकर गये थे । ( वन पर्व १७७:१२ ) दरदराजको पाण्डवों ने महाभारत युद्ध में भाग लेने के लिए आमन्त्रित किया था । ( उद्योग पर्व ४:१५ ) दुर्योधन के पक्ष में महाभारत युद्ध में दरद देश के योद्धाओं ने भाग लिया था। ( भीष्म पर्व ५१:१६ ) भगवान् श्रीकृष्ण ने दरद देश पर आक्रमण किया था । ( द्रोण पर्व ७०:११ ) महाभारत में दरद को एक जाति माना गया है। पूर्वकाल में क्षत्रिय थे कालान्तर में ब्राह्मणों के कोप के कारण शूद्र हो गये थे । ( अनुशासन पर्व ३५:१७-१८ ) एक भारतीय जनपद दरद का वर्णन शल्य पर्व में किया गया है । ( शल्य पर्व ५०:५० )
परिशिष्ट 'न' खस (तरंग : १ : ३१७ : पृष्ठ ३२० ) आजकल की खश जाति ही यहदृण वर्णित खश जाति है। खश का अपभ्रंश खस जाति- वाचक शब्द है। यह जाति पीर पंचाल पर्वतमाला के दक्षिण और पश्चिम रहती थी। ये सीमित क्षेत्र में रहते हैं। पीरपञ्चाल उपत्यका के दक्षिण-पश्चिम में वितस्ता की मध्य धारा और किश्तवार पूर्व के पर्वत के एक भाग में ये अपने को मुस्लिम राजपूत कहते हैं। हिन्दू खश जाति हिमालय के अन्य क्षेत्रों में रहती है। कुमायूँ की पहाड़ियों में बहुत लोग अपने को खश कहते हैं। राजपूत होने का दावा करते हैं। राजपुरी का खश सरदार राजपूतों में विवाह-शादी करता था। लोहर के खश सरदार सिंहराज ने काबुल के शाही राजाओं से विवाह सम्बन्ध स्थापित किया था ( रा० त० ६:१७५, १७७ ) । सिंहराज की कन्या दिद्दा रानी थी। उसने काश्मीर पर राज्य किया था। मनु ने ( १० : २२ ) में खशों को दूसरा नामकरण दिया है। उन्हें मनुस्मृति में ( १०.४ -४४ ) क्षत्रिय माना है। खश तथा खस दोनों पाठ मिलता है। नीलमत पुराण खश जाति का उल्लेख निम्न स्थानों पर करता है। गन्धर्व्या वाजिनः पुत्रा भद्राश्च सुरभेः सुताः । यक्षांश्च राक्षसांश्चैव खशायास्तनयाः स्मृताः ॥ 48 = ७२ × × × कद्रूः क्रोधा इरा श्वाषा विनता सुरभिः खशा । मुग्धाश्चैव तथा पूज्याः सुप्रभा च तथा जरा ॥ 583 = ७०३-७०४ × × × दार्वाभिसारगान्धारजुहुण्डरशकान् खशान् । तंगणान् पाण्डवान् मद्राञ्छन्तर्गिरिबहिर्गिरीन् ॥ 80 = १२२ × × × दार्वाभिसारगांधारजालन्धरशकाः खसाः । तंगणा भाण्डवाश्चैव आन्तर्गिरियहिर्गिरिः ॥ 139 = १८२ नीलमत में 'खशा' तथा 'खस' एक ही शब्द एवं अर्थवानक है। कल्हण ने खशों का प्रचुर वर्णन किया है। इस समय उन्हें खवशा कहते हैं। खखश मुसलमान भी हैं। वे राजपूत मुसलमान भी कहे जाते हैं। नीलमत में वर्णन किया गया है कि ब्रह्मा से वर मिलने पर जलोद्भव असुर दार्वाभिसार, गान्धार, जुहुण्डर, शक तथा खसों का नाश करने लगा। यह सब कश्मीर के सीमावर्ती जातियां एवं क्षेत्र हैं। एक मत है कि 'कस' शब्द से कश्मीर शब्द बना है यह ठीक नहीं है। 'कस' शब्द खश जाति के लिये व्यवहृत
१२८ राजतरंगिणी किया गया है । खश तथा कश्मीर जाति जिसे 'कश्मीराह' कहा गया है सर्वथा भिन्न है । नीलमत गश जाति का अलग तथा स्वतन्त्र रूप से उल्लेख करता है ( नी० ४० ) राजतरंगिणी में अनेक स्थानों पर राजौरी अर्थात् राजपुरी के शासक रूप में गशो को वर्णन किया गया है । उन्हें राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। उसकी सेना खशा कही जाती थी । ( रा० त० ७:६७६, १२७१, १२७६, ८:८८७, १४६६ १८६८, १८६५ ) । राजपुरी के पूर्व अंचल के आम्स नदी की ऊर्ध्व उपत्यका मिलती है। इस नदी को आजकल पंजगब्बर कहते हैं। श्रीवर ने इसका उल्लेख (४.२१३) किया है । उसने इस नदी को पंचगह्वर लिखा है। उसे खशो का निवास-स्थान भी माना है। उमगे पूर्व के अंचल को वाजशाल कहते थे । यह वही आजकल का बनिहाल है। इसी के नीचे बनिहाल पास है । यहीं पर भिक्षाचर ने खश राजा भागिक के दुर्ग में शरण ली थी ( रा० त० ८.१६६५) । राजतरंगिणी ( ८.१७७ तथा १०७४ ) के वर्णन से प्रतीत होता है । वह उपत्यका जो बनिहाल और चन्द्रभागा नदी के मध्य है, उसे इस समय 'विचलारी' कहते हैं। पुरावृत्तकारो ने उसे विश्रालटा कहा है। यह क्षेत्र गशों से आबाद था । खशालय का भी वर्णन कल्हण ने ( रा० त० ४:५६, ५८, २८४, २६०, २६६ ) किया है । यहा खश जाति रहती थी । खशालय ही खेशल उपत्यका है। इसे कंदोर भी कहते हैं। वह दक्षिण-पूर्व में मारवल पास से कश्मीर के एक कोने से होतो किश्तवार तक चली जाती है। खशालय का पुराना नाम खशाली ( रा० त० ७:३०६ तथा थीवर ४:४५६ ) प्रतीत होता है । राजपुरी से पश्चिम घूमने पर पर्णोत्स अथवा राजतरंगिणी ( ६:३१२ ) में वर्णित प्रान्त है । उसमें एक व्यक्ति तुंग खश था । वह चरवाहा था । रानी दिद्दा के समय अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्री बन गया था । ( रा० त० ७:७७३ ) तुंग के वंशज रानी दिद्दा के पश्चात् कश्मीर के राजा हुए थे । उन्हें निम्न खश समझा जाता था । आधुनिक खख्ख जाति और खश एक ही है । कश्मीर में वितस्ता उपत्यका के अधोभागीय सरदार प्रायः इसी जाति के थे । खख्ख शब्द खश का अपभ्रंश है । वितस्ता उपत्यका के खखा सरदार कश्मीर में सिख राज के पूर्व अर्ध स्वतंत्र हैसियत रखते थे । अपने पडोसी बोम्व कबीले के साथ वे कश्मीर के लिए समस्या हो गये थे । उनका भयंकर क्रूर कर्म जो शेख इमा- मुद्दीन के समय ( १८४६ ) मे उन्होने किया था अभी तक लोगों को याद है । खश लोगो ने मध्ययुग में लूटपाट में प्रसिद्धि प्राप्त की थी । ( रा० त० ४.३२६ और ८:१८४५, २३८९ ) से यह बात सिद्ध होती है । श्रीवर ने जैनराज तरंगिणी ४:४४३, ४५२, ४६४, ५६६, ६३३, ६४. में इसी बात की कुपुष्टि की है। कश्मीर की मर्डुमशमारी १८६१ के रिपोर्ट पृष्ठ १४१ पर खखो की आबादी ४१४६ लिखी है । उनकी जाति मुस्लिम पर्वतीय राजपूतो की एक उपजाति मानी गयी है । पृष्ठ २०१ । खश जाति को मार्कण्डेय पुराण में पर्वताश्रयी जाति कहा गया है । यह जाति पर्वत में रहती थी । अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये । नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवो गुर्मणाः खशाः ॥ x x v
परिशिष्ट 'न' १२९ गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् खसान् ॥ नी० ५७:५६ खसों की उत्पत्ति के विषय में महाभारत में कथा मिलती है। नन्दिनी गऊ ने अपनी रक्षा निमित्त उन्हें अपने अंग से उत्पन्न किया था । मूत्रतश्चासृजत् कांश्चिच्छवरांश्चैव पार्श्वतः । पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥ आदिपर्व : १७४ : ३७ × × × असृजत् पल्लवान् पुच्छात् प्रस्त्रवाद् द्रविडान् शकान् । योनिदेशाच्च यवनान् शकृतः शबरान् बहून् ॥ ३५ ॥ मूत्रतश्चासृजन् कांश्चित् शवरांश्चैव पार्श्वतः । पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥ ३६ ॥ चिबुकांश्च पुलिंदांश्च चीनान् हूनान् सकेरलान् । ससर्ज फेनतः सा गौः म्लेच्छान् बहुविधानपि ॥ ३७ ॥ महाभारत आदिपर्व १७६ : ३६-३७ इस रूपक का यह अर्थ भी लगाया जा सकता है। खस गोरक्षक थे । क्षत्रियों का कार्य गो ब्राह्मण की रक्षा करना था । उन्हें युद्ध किंवा रक्षा हेतु नन्दिनी गाय ने उत्पन्न किया था। वे क्षत्री थे। उनके क्षत्री तथा क्षात्रधर्म व्रती होने में सन्देह नही रह जाता । वितस्ता उपत्यका के अधोभाग में बारहमूला के आगे खश रहते थे। वीरांका खशों का केन्द्र कहा गया है। राजतरंगिणी (रा० तं० ८:४०९) के वर्णन से मालूम होता है। यह स्थान प्राचीन द्वारावती के समीप था । द्वारावती को इस समय द्वारविडी कहते हैं। यह संस्कृत द्वारविद्या का अपभ्रंश है। वितस्ता उपत्यका का यह भाग कयाई तथा मुजफ्फराबाद के मध्य है। एक मत है। खश पीर पंतसाल के दक्षिण पश्चिम के निवासी है। महाभारत सभा पर्व में भी खश जाति का उल्लेख आता है। उन्हें शकों तथा दरद जातियों तुल्य अर्ध सभ्य जाति में परिगणित किया गया है। (सभापर्व ५२ : २-४) सभा पर्व में पुनः एक स्थान पर उल्लेख आता है कि ये मरु तथा मन्दर पर्वत के मध्य शैलोदा नदी की उपत्यका में रहते थे । मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ १ ॥ खसा एकासना ह्यर्हाः प्रदरा दीर्घवेणवः । पारदाश्च कुलिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः ॥ ३ ॥ तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः । जातरूपं द्रोणमेयमहार्षुः पुञ्जशो नृपाः ॥ ४ ॥ महाभारत वन पर्व ५२:२-४
१३० राजतरंगिणी खसों की वीरता की प्रशंसा के लिए दुर्योधन ने शकुनीपुत्र उलूक को अपना दूत बना कर पाण्डवों के के पास भेजा था । और खसों के सम्बन्ध में निम्नलिखित बात कहने का आदेश दिया था । किं दर्दुरः कूपशयो यथैमां, न बुध्यसे राजचमूं समेताम् । दुराधर्षं देवचयप्रकाशां, गुप्तां नरेन्द्रैस्त्रिदशैरिव द्याम् ॥ १०२ ॥ प्राच्यैः प्रतीच्यैश्च दाक्षिणात्यै- रुदीच्यकाम्बोजशकैः खशैश्च ॥ १०३ ॥ महाभारतः उद्योग पर्वः १६०:१०२-१०३ शैलदा नदी पश्चिमी पर्वत के वरुण पर्वत से निकलती है और पश्चिम सागर में गिरती है । ( मत्स्य पुराण : १२० : ३३ ) । मनु ने उन्हें क्षत्री माना है । ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा न होने के कारण वे पतित हो गये थे । ( मनुस्मृति १० : ४३ : ४ ) मनु ने स्पष्ट कहा है कि खश जाति क्षत्रिय थी । परन्तु क्रिया भ्रष्ट एवं ब्राह्मणों का दर्शन न पाने के कारण धीरे-धीरे स्थान च्युत हो गयी । निस्सन्देह खश जाति के क्षत्री होने में सन्देह नहीं किया जा सकता । शनकैस्तु क्रियालोपाद् क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ मनुस्मृति १० : ४३ × × × पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः कम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाः चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ मनुस्मृति १० : ४४ उन्हें काशगर से कुछ विद्वान् सम्बन्धित करते हैं । खशगिरि का अपभ्रंश काशगर कहा जाता है । मार्कण्डेय पुराण ( १४६ : ३५० ) में उन्हें शाल्व, शक और शूरसेन आदि जातियो के साथ रखा गया है । सेन तथा पाल वंश के शिलालेखों में इनका उल्लेख आता है । बृहद् संहिता खशों का कुलूत ( कुलू निवासी ) तंगणा, तथा काश्मीरा के साथ धर्मीकरण करती है ( १० : १२ ) । ऋग्वेद संहिता ( १ : ३१७ ) में खश जाति का उल्लेख मिलता है । ऋग्वेदकाल में गिलगित से करलो नदी तथा कालान्तर में नेपाल की पूर्वी सीमा तक खश जाति फैल गयी थी । खशा प्राचीनतम दक्ष प्रजापति तथा असिक्नी की कन्या थी । कश्यप प्रजापति को दी गयी थी । उससे यक्ष राक्षसादि हुए । मार्कण्डेय पुराण में 'कुरवो गुर्गणाः खशाः', 'वायु पुराण में 'क्षुपणास्तङ्गणाः खशाः', 'कुणपास्तंगणाः खशाः', 'शुथ्नास्तङ्गनाः खशाः' 'ध्रुवणास्तङ्गणाः रासाः' । ब्रह्माण्ड पुराण में 'कुपथास्तङ्गणाः खशाः', मत्स्य पुराण में 'कुपथा अप्यास्तथा', वामन पुराण में 'कुपथास्तङ्गणा खशाः', उल्लेख आता है । कुपथ किंवा अपथ : हिमालय में कोई स्थान था । खश देश का उल्लेख द्रोण पर्व में किया गया है । मत्स्य पुराण में बर्बर तथा
परिशिष्ट 'न' १३१ यवनों के साथ खशों का उल्लेख किया गया है। 'बर्बरान् यवनान् खशान्' वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में 'पारदान्, खसान्' 'पारदास्तङ्गणाखशान्', 'किम्पुरुषान् खशान्' का उल्लेख अर्थात् 'पारद, तङ्गण तथा किम्पुरुष' के साथ आया है। महाभारत द्रोण पर्व में खश जाति का उल्लेख आया है कि उन्होंने कुरु क्षेत्र के युद्ध में अयोद्दस्ता तथा शूलहस्ता खश गणों ने सात्यकि पर अश्म वर्षा की थी। ततः पुनर्व्यात्तमुखस्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः ॥ उद्योग पर्व = १६० : १०३ अयोद्दस्ता शूलहस्ता दरदास्तङ्गणा खशाः ॥ द्रोणपर्व १२१ : ४२ खाशीर जनपद का उल्लेख भीष्म पर्व में पूर्वोत्तर भारत के एक जनपद के लिए किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में खश जाति स्थान मगध तथा लौहित्य के साथ पूर्व दिशा में रखी गयी है। परन्तु यह कश्मीर साहित्य में वर्णित जाति खस नहीं है। आसाम के खासी पर्वत में रहने वाली खासी जाति हो सकती है। खश एवं खस दोनों एक ही जाति के वाचक है। भागवत पुराण (२:४:१८) के अनुसार खस जाति पतित हो गयी थी। भगवत भक्ति के कारण शुद्ध हो गयी। ब्रह्माण्ड पुराण (२:३६:१४५ तथा ३:६६:१२०) के अनुसार विन्ध्य पर्वत में निवास करने वाली खस एक निम्न कोटि की क्षत्री जाति थी। उसे निषाद भी कहते थे। हरिवंश पुराण के अनुसार सगर ने उन्हें जीता था। उन्हें निम्न श्रेणी में रख दिया। वे म्लेच्छ माने गये । हरिवंश पुराण ( १४:७८४ ) ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराण ने उन्हें पूर्व का एक जनपद माना है। जिसमें होकर चक्षु नदी बहती है। ब्रह्माण्ड पुराण तथा मत्स्य पुराण (१२०:४३, १४४:५७ ) वायु पुराण में खश पर्वतीय खश जनपद कहा गया है। यहां खश के स्थान पर खस शब्द का प्रयोग किया गया है। वायु पुराण ( ४५:१३५ तथा ४७:४७ ) में दरद जाति को खस जाति का पड़ोसी माना गया है। बंगाल के पाल राजाओं के शिलालेख में हूण तथा खस जाति का उल्लेख मिलता है। निष्कर्ष निकाला जा सकता है। खस लोग बंगाल तक आते जाते थे। पूर्वोय भारत का उनको ज्ञान था। वहां वे किसी न किसी रूप में आबाद थे। हरिवंश पुराण ( १३:२३-३४) में उल्लेख आता है कि रघुवंशी राजा बाहू और उसके राज्य को हैहय तथा तालजंघ वंशीय राजाओं ने शक, यवन, कम्बोज, पारद तथा पह्लव की सहायता से नष्ट कर (१४:४) दिया था। यवन, पारद, काम्बोज, पह्लव तथा खस पांचगणो ने हैहय राजाओं के विजय निमित्त पराक्रम किया था। यहाँ स्पष्ट उल्लेख मिलता है। खसों की राज्य-व्यवस्था गणतन्त्रीय थी। खसो ने बाहू राजा तथा उसके राज्य को नष्ट करने में सम्भवतः प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया था क्योकि श्लोक ( १३:३० ) में खस का उल्लेख नही आता । हैहय तथा तालजंघ राजा के साथ शकों का उल्लेख है। उसने बाहू के राज्य को छीन लिया था। केवल यह उल्लेख आता है ( १४:४) कि पाँच गणराज्य जिनमें खस भी एक गण राज्य था, हैहयों के लिए पराक्रम किया था। खस लोग शकों की तरह बाहू के राज्य को लेते हुए दिखाई नहीं देते। एक मत है कि 'केदारे खसमण्डले' की उक्ति के अनुसार केदार खण्ड खस मण्डल का पर्याय है। यह मत उचित नहीं मालूम होता। केदार खण्ड में ही नहीं हिमालय के दक्षिणवर्ती पर्वतमाला में खश जाति फैली थी । अतएव खस जाति केदार खण्ड में भी आबाद थी । परन्तु इसके कारण खसमण्डल का पर्याय केदार खण्ड मान लिया जाय यह युक्ति पूर्ण दलील नहीं मालूम होती ।
१३२ राजतरंगिणी कल्कि पुराण में भी खसों का उल्लेख मिलता है : खश काम्बोजकाञ्च सर्वान् शबरान् यवनानपि ॥ ३२ ॥ मरुः खशैश्च काम्बोजैः युयुधे भीमाविक्रमः । देवापिः समरे धीनैर्यवनैः संतणैरपि ॥ ४१ ॥ कल्कि पुराणः तृतीयोध्याः ६: ३२ तथा ४१ प्लीनी ( सन् ७६ ई० ) का मत है । सिन्धु तथा जमुना की मध्यवर्ती पर्वतीय जातियां राग अर्थात् केसी है । वे क्षत्री फेट्रीवोनी कही जाती थी । अरण्यवासी थे । अटकिन्सन का मत है—प्लीनी के अनुसार उस समय खस कमायूँ तथा नेपाले के घुर पश्चिम में निवास करते थे । तालमो ( ८७-१६५ ई० ) का उद्धरण देते हुए वह पुनः लिखता है—दरद जाति सिन्धु उद्गम के समीप कस्पेरोई झेलम, रावी, चनाब के समीप रहते थे । उनके देश को कुलिन्द कहते थे । इस समय दरद अस्तोर तथा गिलगिट में रहते है । कस्पेरोई कश्मीर उपत्यका तथा सतलज के मध्य निवासी थे । कुलिन्द सतलज तथा गंगा के बीच में रहते थे । गिलगित से लेकर जोजिला पास का कश्मीरी भूखण्ड जिसका अधिक भाग अनधिकृत रूप से के इस समय पाकिस्तान आधीन है, दरद जाति आज भी रहती है । उसे दरदिस्तान कहते हैं । नेपाल से कश्मीर तथा पामीर तक खस जाति बिखरी थी । एक समय था जब तिब्बतवासी कश्मी- रियों को खद्दे कहते थे । इस समय तिब्बती खद्दे लोगो को मुसलमान कहते थे । कश्मीर के लोग मुसलमान हो गये तो खद्दे शब्द मुसलमानों के लिये तिब्बतियों द्वारा प्रयुक्त होने लगा । तिब्बत सीमा मुस्लिम देश कश्मीर है । चित्राल कश्कर, पत्तन मस्तूज के इलाकों के निवासी खो कहे जाते हैं । खशों में मुसलमान तथा बौद्ध हो गये और शेष हिन्दू धर्म के रीति रिवाजों को मानते हुए पूर्ववत् क्षत्री रह गये ।
परिशिष्ट 'प' ३५ लुप्त राजा ( रा० त० १ : ८३ : पृष्ठ ११७ ) हसन ने ३५ लुप्त राजाओं की निम्नलिखित तालिका दी है। यह तालिका वह किस ऐतिहासिक आधार पर देता है, इस पर प्रकाश नहीं डालता। इस तालिका का ऐतिहासिक महत्त्व नगण्य है। रत्नाकर पुराण की बात प्रमाण तुला पर सत्य नहीं उतरती। ( १ ) हरण देव ३०३४-३००५ ईसा पूर्व ( पुत्र राजा परीक्षित ) ( २ ) रामदेव ३००५-२६३६ ( १३ ) चन्द्रदेव २५०६-२४५७ ( ३ ) व्यासदेव २९३६-२८८० ( १४ ) आनन्द २४५७-२४२६ ( ४ ) द्रुण २८८०-२८२२ ( १५ ) द्रुपद देव २४२६-२३७८ ( ५ ) सिंहदेव २८२२-२७६८ ( १६ ) हरनाम देव २३७८-२३२६ ( ६ ) गोपालदेव २७६८-२७५५ ( १७ ) सुखलन देव २३२९-२३११ ( ७ ) विजयानन्द २७५५-२७३० ( १८ ) सिनादित्य २३११-२२६४ ( ८ ) सुखदेव २७३०-२६८६ ( १९ ) मंगलादित्य २२९४-२२५५ ( ९ ) रामानन्द २६८६-२६२९ ( २० ) क्षेमेन्द्र २२५५-२१८९ ( १० ) सन्धिमान २६२६-२५६४ ( २१ ) भीमसेन २१८९-२१२८ ( ११ ) (क) मरणदेव २५६४-२५०६ ( २२ ) इन्द्रसेन २१२८-२०८२ ( १२ ) (ख) कामनदेव ( २३ ) सुन्दरसेन २०८२-२०४१ दो मास काश्मीर मण्डल राजा विहीन था। शेष १२ राजा शचीनर के पश्चात् हुए थे। उनकी तालिका निम्नलिखित है:— ( २४ ) जलगेन्द्र १७५७-१७१२ ( ३० ) प्रतापशील १५८९-१५५३ ( २५ ) बलदेव १७१२-१६६६ ( ३१ ) संग्रामचन्द्र १५५३-१५५२ ( २६ ) नलसेन १६६९-१६४४ ( ३२ ) लरिकचन्द्र १५५२-१५२१ ( २७ ) गोकर्ण १६४४-१६०८ ( ३३ ) बोरमचन्द्र १५२०-१४७६ ( २८ ) प्रह्लाद १६०८-१५६७ ( ३४ ) बभीखन १४७६-१४५९ ( २९ ) बम्बरू १५९७-१५८९ ( ३५ ) भगवन्त १४५९-१४५५ इतिहासकार बैउद्दीन कश्मीर का विचित्र इतिहास उपस्थित करता है :— "महात्मन् आदम सरन द्वीप ( सिंहल या लंका ) से कश्मीर आये। सेथ के वंश में कश्मीर का राज्य १११० वर्ष तक रहा। "महात्मन् सुलेमान ने कश्मीर को आबाद किया। अपने भतीजा इसौन को उसने कश्मीर का राजा बनाया। उसने कश्मीर पर २५ वर्ष तक शासन किया। तत्पश्चात् उसका पुत्र कस्सलघन इस्लामा- बाद में राजधानी बनाकर १९ वर्ष राज्य किया। उसके बाद उसका पुत्र महेरकज राजा हुआ। उसने ३० वर्ष राज्य किया।
१३४ राजतरंगिणी 'वह सन्तानहीन था । उसने पण्डू खा अथवा वन्दू खा को गोद लिया। इस राजा का विचित्र जन्म हुआ था । उसकी एक माता एक सरोवर में स्नान कर रही थी । सहसा गर्भवती हो गयी । उसकी मृत्यु भी उस सरोवर में स्नान करते समय हो गयी । उसका शरीर पानी मे फूल गया । उसमे १५ हजार सन्तानें हुईं । उन्हीं के वंशज भारतीय इतिहास वर्णित पाण्डव हैं । पण्डू खा का लड़का लादो खां हुआ ।' इस इतिहासकार के अनुसार वंशावली निम्नलिखित होती है । महारमन् सुलेमान ने अपने भतीजा इसोन को राजा बनाया उसके पश्चात् निम्नलिखित कश्मीर के राजा क्रमानुसार हुए । १. सुलेमान २ इसोन ३. कस्सलघन ४. महरकज ५. पेन्दू खा ६ लदो खा ७. सेदर खां ८. सुन्दर खा ९. कुन्दर खां १०. सुन्दर खा (द्वितीय) ११. तुन्दू खा १२. बेदू खा १३. महन्द खां १४. दरविश खा १५. देवासिर खा १६. तेहव खा १७. कलजू खा १८. सुरखब १९ शर्म बरम खा २० नोरंग खां २१ वारिध खा २२. गवशेहर खा २३. पण्डू खा (द्वितीय) २४. हरशिर खां २५ राजिल खां २६. अकबर खा २७. जबर खा २८. नोदर खा २९. शंकर खा ३०. बकराज । बकराज के वंशजो का नाम नही मालूम है । ओगनन्द पहला राजा हुआ जिसके समय से इतिहास क्रमबद्ध चलता है । बैउद्दीन के अनुसार राजाओं का संक्षिप्त विवरण ⸱ ८. सुन्दर खा—इस राजा के समय कश्मीर के हिन्दुओ में बुतपरस्ती अर्थात् मूर्ति पूजा आरम्भ हुई । युत- परस्ती रोकने के कारण राजा मार डाला गया । ९. कुन्दर खा—३५ वर्षों तक राज्य किया । १०. सुन्दर खा—इस राजा के समय में बुतपरस्तो पुन. जोर पकड गयी। इस राजा ने सदा शिव का मन्दिर निर्माण कराया । १२ बेदू खा—११५ वर्ष शासन किया । १६ तेहव खा—यह राजा अपने पडोसी तथा सम्बन्धी काबुल के राजा द्वारा मार डाला गया । काबुल का राजा कश्मीर की गद्दी पर कलजू खा के नाम से बैठा । १७. कलजू खा—सात वर्ष राज्य कर लेने पर कलजू खा को पाण्डवों ने गद्दी से उतार दिया और स्वयं राजा बन गये । १८. सुरखब—१९१ वर्ष राज्य किया । २०. नोरंग खा—महान् विजेता राजा था । इसका राज्य चीन की सीमा तक पहुँच गया था । ओगनन्द—[ मै समझता हूँ गोनन्द के लिए ओगनन्द नाम का प्रयोग किया गया है । ] २३. पण्डू खा—उसने कश्मीर राज्य के उन सब स्थानों पर कब्जा कर लिया जो कभी कश्मीर राज्य के अन्तर्गत थे । उसने राज्य भारतीय समुद्र की सीमा तक पहुँचा दिया । २४ हरशिर खा—२३ वर्ष राज्य किया । २८. नोदर खा—कश्मीर में इन्होंने आतिशपरस्ती अर्थात् अग्निपूजा का प्रचार किया । ( यह जरदस्तू अर्थात् पारसियो का धर्म था । ) २९. शंकर खां—बकराज ने इस पर आक्रमण कर मार डाला । वह एक पड़ोसी सरदार था । शंकर खां का लड़का कुछ घण्टों के लिए गद्दी पर बैठा । ३०. बकराज—बकराज राजा हुआ । उसने अपने वंशजों को राज्य दिया ।
परिशिष्ट 'प' १३५ श्री बैउद्दीन ने कश्मीर के इतिहास, वहाँ को परंपरा तथा धर्मादि को पुरातन बाइबिल एवं कुरान शरीफ में वर्णित महात्मन् सुलेमान से जोड़ा है। कश्मीर को भारतीय परंपरा, इतिहास एवं धर्म से सर्वथा अलग रखा है। उसने राजाओं की जो तालिका उपस्थित की है, वह कुछ विचित्र ध्वनि करती है। उसने संस्कृत नामो के आगे 'खां' पद जोड दिया है। यह 'खां' शब्द भारत में मंगोल मुसलिम आक्र- मण के पश्चात् प्रचलित हुआ था। इसका सम्बन्ध मंगोल से फिलस्तीन की अपेक्षा अधिक है। सुन्दर खां के पहले कश्मीर में मूर्ति पूजा नही थी। उसके समय में आरम्भ हुई और वह अपने इस कार्य के लिए जनता द्वारा मारा गया था। किन्तु सुन्दर खां द्वितीय के समय सदा शिव की पूजा आरम्भ हो गयी। बैउद्दीन पारसी धर्म आतिशपरस्ती का कश्मीर में आना कहता है। कश्मीर का सम्बन्ध, फिलस्तीन, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान तथा इस समय के मुसलिम जन बाहुल्य देशों से जोडने का प्रयत्न करता है।
अनुक्रमणिका [ अ ] अकरोत्स महाहर्म्यैः 2, 133 अथ पुर्य्यष्टिरुद्भाभ्यं° 2, 105 अकुण्ठुलङ्घ्याः पन्थानो 3, 224 अथ प्रतापादित्याख्यः 2, 5 अप्रहाराञ्जगृह्णिरे 1, 307 अथ प्राङ् मुरसोत्तीर्णं° 3, 239 अङ्गेन रक्ष कायस्य 3, 346 अथ भानुकरोच्चुष्टरू° 3, 398 अचिन्तयच्च धिङ्मां 3, 183 अथ भामर्थ्य माहात्म्यात् 2, 72 अचिन्तयच्च नाश्यं 3, 148 अथ म्लेच्छगणात्तीर्णे 1, 289 अचिन्तयच्च शास्त्रज्ञो 3, 222 अथ योगेश्वरी काचिद् 1, 331 अचिन्तयच्च सत्यं मे 2, 153 अथ रक्षः पतिर्लङ्का 3, 75 अचिन्तयच्च राज्ञान्त- 2, 92 अथ राजाज्ञया क्रूरं 2, 79 अटवीषु श्मशानेषु 2, 29 अथ राजाऽभ्यधात् षेन 3, 292 अत एव विशेषेतॄणा 1, 229 अथ वनसरसीतट° 2, 166 अत स्वाञ्प्रहाराणा 1, 314 अथ वाक्पुष्ट्या सार्धं 2, 11 अतः परुमप्यद्य 3, 310 अथवा रचनानिवि° 3, 95 अतिकारुण्यमिपत 3, 42 अथ वाराणसी गत्वा 3, 320 अतिक्रान्तप्रभावेयं 2, 35 अथ वार्ता विदित्वेमा 2, 114 अतिक्रामति कालेऽथ 3, 82 अथवा विद्यतेऽमुख्य 3, 195 अतिक्खन्तापदाज्जातः 1, 327 अयवाऽस्यैव सूक्तेन 3, 186 अत्यद्भुतमति शङ्कुध- 2, 67 अथ विगलिता गोनन्दोर्वी° 3, 530 अत्युदारगुणेष्वेषा 3, 304 अथ वेलावलोपान्तात् 3, 31 अत्यद्भुतं राज्यलाभम् 2, 142 अथ वैजनने मासि 1, 74 अथ कृत्याधर्मं कृत्वा 1, 147 अथ वैवस्वतीयेऽस्मिन् 1, 26 अथ कृत्वा क्षणाच्छ्लोकम् 3, 180 अथवाऽनादृतोऽन्येन 3, 201 अथ क्ष्माभृद्वरक्ष्मा 3, 97 अथ शस्त्रक्षतैैरङ्गै- 1, 63 अथ प्रपयितुं तस्मिन् 3, 261 अथ शिथिलितमुख्यामात्य° 3, 528 अथ प्राहमितुं भूपान् 3, 27 अथ सधिर्मति बुद्ध्वा 2, 82 अथ तं कृशसर्वाङ्गं 3, 160 अथ स्नाताङ्गुलित्साङ्गं 3, 241 अथ दूतेषु यातेषु 3, 190 अथ स्नायख्विशेषपाङ्गो 3, 408 अथ दीपोज्ज्वले धाम्नि 3, 371 अथाक्लेशोचितं क्षेम° 3, 211 अथ निष्कन्धस्ते संगद्वा 1, 366 अथानन्तचितालोक° 3, 339 अथ निर्भर्त्सनां तस्माद् 1, 256 अथापश्यत्तयाभूतः 3, 52 अथ निन्दन्परो राजा 1, 174 अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः 2, 102 अथ पदन्ठ भूगलः 3, 178 अथाभवत् लवो नाम 1, 84
अनुक्रमणिका १३७ अथाभवन्स्वनामाङ्क° १, १६८ अपश्यत्स फणाकोटी ३, २२१ अथाभ्यधान्महात्मा स ३, ३८ अपश्यदथ केनापि ३, ३३ अथार्धरात्रे निन्निद्रः २, ९४ अपश्यन्निर्जलात्स्यानाद् १, १२६ अथाऽऽर्यराजो विज्ञाय २, १५२ अपि च स्पृहयालुः स्यां ३, ३१५ अथाऽशोककुलोत्पन्नो १, १५३ अपूर्वो यत्प्रतापाग्निः ३, ३८९ अथाश्रूयत वाक्तासां २, १०९ अप्यल्पकालसंदृष्ट° १, २७४ अथाश्वपादेनेशेन° ३, ३६६ अप्रियेरपि निष्पिष्टै ३, २८३ अथाऽऽसोत्सुत्परिक्षाम° २, २० अबुध्वाज्जनुतिष्ठन्त १, ७९ अथाहूयापरान्भृत्यान् ३, २५० अभवन्निर्मलं व्योम २, ५४ अथेन्द्रदेवीभवनम् ३, १३ अभिमानवतां श्लाघ्य° १, २२६ अथोत्पन्नभयो राजा १, ३६३ अभुक्ते मन्त्रिभिर्द्रव्ये १, २३४ अथोदतिष्ठन् गर्तेभ्यो ३, ४०० अभूद्भीतजनता° ३, २८ अथोपसिन्धु गान्धारैः १, ६६ अमारमादिदेशाथ ३, २५६ अथोल्लसत्पृथुश्लाघ° ३, २ अमृतप्रभया तस्य ३, ४६३ अथापि तत्पुरं दग्धं १, २७० अयमेतद्गृहीतेषु ३, २१६ अनन्तरज्ञः क्षोण्योऽस्माद् ३, २१७ अरण्यगहनाल्लब्धम् ३, ३७ अनद्यदिनयोदात्तः २, ३ अराजान्वयिने दत्ता ३, ४८८ अनर्घमहिमा दीर्घ° १, ९१ अर्चालिङ्गमुपादाय २, १६१ अनात्मज्ञ किमेतत्ते ३, ३४ अर्चनां शासितुं राष्ट्रं २, ११६ अनाप्नुवद्भिः सावद्य° ३, १३५ अर्चितेन स्वयं त्रातुं ३, २४२ अनेन सह संजातः ३, १४२ अर्थे यद्विक्षवः शिक्षा° ३, १२ अन्तरज्ञतया तस्य ३, २६२ अर्वस्कालोद्भवस्यापि ३, १५ अन्तरज्ञतया श्लाघ्यः ३, ३०१ अलोलकीतिकल्लोल° २, ६४ अन्तर्दध्यौ च कर्तव्यं ३, १९२ अवतारयतस्तस्य १, ३१८ अन्तर्ये सततं लुठन्त्य° ३, २०२ अवध्योऽहं पशुत्वेन ३, ३३४ अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं १, ७० अवन्त्यदर्शने छिन्द्ये ३, ३९४ अन्यस्यापि क्रोधहेतुं ३, ५०९ अबालम्बिव्यत छत्रं ३, ६५ अन्यरक्षानीय देशेभ्यः १, ३४३ अविज्ञाताशयो राज्ञः ३, २०९ अन्याभिः खादनात्सम्मा° ३, १४ अभ्यांजोदार्यधैर्यस्य ३, ३०८ अन्येद्युर्विस्मयस्मेरैः ३, ७१ अशून्यजन्मा भूयासं ४, ४३० अन्येद्युर्भुवमुत्सृज्य ३, २८७ अशेषमेकेनैवाह्ला १, १६६ अन्येद्युर्विधिबदुपास्य २, १६९ अश्लीलालापिनोऽन्योन्यं ३, १४० अन्येद्युः प्रकृतीः सर्वाः २, १५९ अष्टषष्ट्यधिकामब्द° १, ४८ अन्योत्कर्षानपि वदन् ३, १५८ असंतापाह्वतां जानन् १, ४१ अन्योन्यं साभिमानानाम् ३, ३२३ असम्पूर्णेऽपि तैर्नोवी २, ८ अन्वैष्यत नृपस्ताभिः २, १४४ असाधारणमौदार्य° ३, ३१४
अनुक्रमणिका [ अ ] अकरोत्स महाहर्म्यं. 2, 133 अथ पुर्यन्तरिच्छाम्यं 2, 105 अकृच्छ्रलङ्घ्याः पन्थानो 3, 224 अथ प्रतापादित्याख्यः 2, 5 अग्रहाराञ्जगृहिरे 1, 307 अथ प्राङ् मुरगोवर्णं 3, 239 अङ्गेन रक्ष कायस्य 3, 346 अथ भामुरुरोच्छुष्कं 3, 398 अचिन्तयच्च धिङ्मां 3, 183 अथ भाश्वर्य माहात्म्यात् 2, 72 अचिन्तयच्च नाद्यं 3, 148 अथ म्लेच्छगणार्योनं 1, 289 अचिन्तयच्च शास्त्रज्ञो 3, 222 अथ योगेश्वरी काचिद् 1, 331 अचिन्तयच्च सत्यं मे 2, 153 अथ रक्षः पतिर्लङ्का 3, 75 अचिन्तयच्च सम्भ्रान्त 2, 92 अथ राजाज्ञया क्रूरै 2, 79 अटवीषु श्मशानेषु 2, 29 अथ राजाऽभ्यधात् नैन 3, 292 अत एव विवेक्तॄणा 1, 229 अथ वनसरसोतटं 2, 166 अत एवाग्रहाराणा 1, 314 अथ वाक्पुष्या सार्धं 2, 11 अतः परमुपम्यद्य 3, 310 अथवा रचनानिवि० 3, 95 अतिकारुण्यमिपतः 3, 42 अथ वाराणसीं गत्वा 3, 320 अतिकान्तप्रभावोयं 2, 35 अथ वार्त्ता विदित्येमां 2, 114 अतिक्रामति कालेऽथ 3, 82 अथवा विद्यतेऽमुख्य 3, 195 अतिसन्तापदाज्जात. 1, 327 अथवाऽस्यैव सूक्तेन 3, 186 अत्यद्भुतमति शङ्कथ 2, 67 अथ विगलिता गोनन्दोर्वी 3, 530 अत्युदात्तगुणेष्वेषा 3, 304 अथ वेलावनोपान्तात् 3, 31 अत्यद्भुतं राज्यलाभम् 2, 142 अथ वैजनने मासि 1, 74 अथ कृत्याश्रमं कृत्वा 1, 147 अथ वैवस्वतीयेऽस्मिन् 1, 26 अथ कृत्वा क्षणान्छ्लोकम् 3, 180 अथवाऽनादृतोप्येन 3, 201 अथ क्ष्माभृद्रसं दमां 3, 97 अथ शस्त्रक्षतैरङ्गे 1, 63 अथ प्रययितुं तस्मिन् 3, 261 अथ शिथिलितमुख्यामात्य 3, 528 अथ ग्राहयितुं भूपाम् 3, 27 अथ संधिमतिं बुद्ध्या 2, 82 अथ तं नृपसर्वाङ्गं 3, 160 अथ स्नातानुलिप्ताङ्ग 3, 241 अथ दूतेषु यातेषु 3, 190 अथ स्नाव्यवशिष्टेषाऽङ्गो 3, 408 अथ दीपोज्ज्वले पाम्नि 3, 371 अथाक्लेशोचितं क्षेमं 3, 211 अथ निरुपद्रुस्ते संगद्वा 1, 366 अथानन्तचितालोक 3, 339 अथ निर्मग्गंनां तस्माद् 1, 256 अथापश्यत्तथामूतः 3, 52 अथ निष्कण्टको राजा 1, 174 अथाऽपश्यत्ततच्छत्त्र. 2, 102 अथ पप्रच्छ भूपालः 3, 178 अथाभवत् लवो नाम 1, 84