राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ राजतरंगिणी आर्थिक ढाँचा कृषि पर आधारित था । तथापि गृह शिल्प, व्यवसाय तथा व्यापार खूब होता था । व्यापा- रियों की एक विशाल श्रेणी थी । उसे नाना देश-तिसैयायिरत्तु-ऐनूजूंबंर कहते थे । वह जावा, सुमात्रा तथा दक्षिण पूर्व एशिया से व्यापार करती थी । वह वलंगे तथा इडंगे वर्गों में विभाजित था । कश्मीर के समान चोल शिव उपासक थे । परन्तु बुद्ध, जैन तथा अन्य सम्प्रदायों के प्रति सहिष्णुता एवं समानता का व्यवहार किया जाता था । पुराकालीन तमिल धार्मिक पद वेदों के समान आदर पाते थे । उनके रचयिता वेद ऋचाओ के ऋचाकार ऋषियों तुल्य पूजे जाने लगे । नेंबि आडार नंबि ने शैव ग्रन्थों का संकलन सर्व प्रथम किया था। इसी प्रकार नाथ मुनि ने वैष्णव ग्रन्थों का संकलन किया था । भक्ति मार्ग का दार्शनिक स्वरूप जगत् के सम्मुख रखा था । उनके पौत्र यामुनाचार्य किंवा आलवंदार वैष्णव आचार्य थे । रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया । मन्दिरो की विधि मे परिवर्तन किया । वर्ष में एक दिन मन्दिरो में हरिजन प्रवेश की व्यवस्था की । पाशुपत, कापालिक, तथा कालामुख जैसे सम्प्रदाय थे । उनमें कुछ स्त्रीतत्व की आराधना करते थे । देवी के उपासक अपना मस्तक भी काटकर देवी के चरणों में अर्पित करते थे । कश्मीर राजा ललितादित्य का वृत्तान्त इस प्रथा की ओर संकेत करता है । मन्दिर सामाजिक जीवन के केन्द्र थे । कश्मीर के समान चोल राज्य था । प्रत्येक ग्राम मन्दिर श्रृंखलाओ से पूर्ण था । मन्दिर शिक्षा के केन्द्र थे । वहाँ नृत्य, गान, नाट्य, मनोरंजन, आमोद प्रमोद के आयोजन होते थे । कश्मीर के अग्रहारो के समान चोल राज्य में भी मन्दिरो पर भूमि चढ़ायी जाती थी । मन्दिर भूसम्पत्ति का स्वामी होता था । मन्दिर की सम्पत्ति से बैंकिग का कारबार चलता था । चोल राज काल में कांस्य मूर्तियों का प्रचलन बहुत हो गया था। नटराज की मूर्ति विश्वविख्यात है । तमिल साहित्य में चोल शासन काल स्वर्णिम युग कहा जाता है । प्रबन्ध साहित्य की प्रचुरता थी । चोल वंश के अभिलेखों से प्रकट होता है कि कश्मीर के समान चोल राजाओं ने संस्कृत, साहित्य एवं भाषा अध्ययन के लिये ब्रह्मपुरी, घटिका तथा पाठशालाएं स्थापित करायी थी । उनकी व्यवस्था हेतु समुचित दान दिया था । ऋग् वेद का भाष्य वैंकट माधव ने किया था । केशव स्वामिन् ने नानार्थार्णव संक्षेप कोश की रचना की थी । जैन एवं बौद्ध साहित्य ने भी चोल राज में प्रगति की थी। जैन कवि तिरुत्तक् कदेवर ने तमिल महाकाव्य जीवकचिंतामणि की रचना दशवी शताब्दी में की थी । जैन विद्वान् अमित सागर ने छंदशास्त्र पर छप्पु रुंगलम नामक ग्रन्थ तथा उसके संक्षिप्त संस्करण करिगै की रचना की थी । व्याकरण ग्रन्थों की भी रचना की गयी थी । वैष्णव आचार्य नाथ मुनि, यामुनाचार्य एवं रामानुजाचार्य ने संस्कृत में ग्रन्थों की रचना की थी । कश्मीर के समान चोल राज्य में संस्कृत खूब फलती और फूलती रही है । मत्स्य पुराण में 'चोलाः कुल्यास्तथैव च।' वामन पुराण में 'चोलकुल्याश्च राधस' का उल्लेख आया है । शक्ति संगम तंत्र ( ३ : ७ : २२ ) में उल्लेख किया गया है : द्राविड़तैलंगयोर्मध्ये चोलदेशः प्रकीर्तितः । लम्पकणांश्च ते प्रोक्ता भेद्रोऽस्यावान्तरो भवेत् ॥ २२ इससे प्रकट होता है कि चोल देश द्रविड़ तथा तैलंग देश के मध्य स्थित था ।