भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 930, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 930

परिशिष्ट 'द' ३३१ पाँच उपसमितियों द्वारा होता था। कार्य काल एक वर्ष तथा सदस्यता अवैतनिक होती थी। उनके कार्यों में राजा किंवा सम्राट् भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे। चोल राजा निर्माण प्रिय थे। उन्होंने विशाल भवनों, मन्दिरों का निर्माण कराया है। तंजौर का राजेश्वर मन्दिर राजा राजराज ने निर्माण कराया था। उसको भित्तियों पर चित्र महत्त्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय हैं। राजेन्द्र प्रथम ने इसी प्रकार का मन्दिर त्रिचनापल्ली में निर्माण कराया था। तत्कालीन धातु एवं पाषाण मूर्ति कलापूर्ण एवं सजीव है। कश्मीर के समान चोल राज्य में भी साहित्य की विशेष प्रगति तथा उन्नति हुई थी। शक्तिशाली राजाओं के विजय प्रसंग को लेकर अनेकानेक प्रशस्ति पूर्ण ग्रन्थों की रचना की गयी थी। कुलोत्तुंग तृतीय के शासन काल में कंबन कवि ने कम्बु रामायण की रचना की थी। व्याकरण, कोश, काव्यशास्त्र तथा छंद आदि विषयों की रचना का यह गौरवमय काल था। सम्राट् किंवा राजा अपने जीवन काल में ही युवराज का चयन कर लेता था। सामंतों पर कठोर नियन्त्रण रखता था। उडनकुट्टम अधिकारी गण राजा को सर्वदा सलाह देते थे। उसके सम्पर्क में रहते थे। सम्राट् के निकट एक संगठित विभाग था। उसे ओले कहते थे। अधिकारियों के निम्न शिरुदनम् तथा उच्च पेरुंदनम् वर्ग थे। केन्द्रीय तथा स्थानीय अधिकारियों से सम्पर्क एवं नियन्त्रण रखने के लिये कणक्कगणी अधिकारी होते थे। भूमि व्यवस्था सुचारु थी। समस्त भूमि नापी हुई थी। उनको करमुक्त तथा करयुक्त दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया था। कर के लिये समग्र ग्राम उत्तरदायी होता था। भूमिकर के अतिरिक्त चुंगी, व्यवसाय तथा भवनों पर भी कर लगते थे। स्थानीय संस्थाएँ सुसंगठित थी। स्थानीय जीवन के विभिन्न अंगों के लिये विभिन्न संस्थाएँ थी। सेना भी गठित थी। राज्यों के विभिन्न भागों में उसके शिविर या कडगम थे। न्याय, सामाजिक व्यवस्थाओं, लेखपत्र, साक्षी आदि प्रमाणों के आधार पर होता था। नगरम् उन स्थानों की संस्थायें थी जहाँ व्यापारी किंवा व्यवसायी वर्ग प्रमुख था। उर ग्रामीणों की सभा थी जिनके पास भूमि होती थी। ब्रह्मदेय ग्रामों में ब्राह्मणों की सभा थी। सभायें कार्य के लिये स्वतन्त्र थीं। किन्तु ग्रामों के आय व्यय का निरीक्षण राज्य के अधिकारी करते थे। कार्यों के संचालन के लिये समितिया थी। उन्हें वारियम् कहते थे। उनकी सभा द्वारा उनके विधान में संशोधन, परिवर्तन एवं परिवर्धन किया जाता था। कश्मीर के समान चोल नरेशों ने सिंचाई तथा कृषि समृद्धि की सुनियोजित व्यवस्था की थी। वे बाँध बँधवाते थे। नदियों का प्रवाह रोका था। कूप तथा सरो की श्रृंखलायें बनवायी थीं। कावेरी जैसी बड़ी नदी पर बाँध बँधवाया था। गंगैकोड-चोलपुरम् के समीप राजेन्द्र प्रथम ने एक सर खुदवाया था। उसपर सोलह मील लम्बा बाँध था। इसमें दो नदियों से जल लाया गया था। उससे पाषाण प्रणालियाँ तथा नहरें सिंचाई के लिये निकाली गयी थी। सरोवरों, वापियों तथा नदियों पर कश्मीर के वितस्तादि तट तुल्य घाट बने थे। प्रशस्त राजपथो से नगर शोभित था। सामाजिक व्यवस्था कश्मीर के समान धर्मशास्त्र पर आधारित थी। नारियाँ कश्मीर के समान स्वतन्त्र रूप से कार्य कर सकती थीं। उन पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था। ये सम्पत्ति की स्वामिनी हो सकती थी। बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। सती का प्रचलन था। मन्दिरों में देवदासियाँ होती थीं। १६