राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट 'न' १३१ यवनों के साथ खशों का उल्लेख किया गया है। 'बर्बरान् यवनान् खशान्' वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में 'पारदान्, खसान्' 'पारदास्तङ्गणाखशान्', 'किम्पुरुषान् खशान्' का उल्लेख अर्थात् 'पारद, तङ्गण तथा किम्पुरुष' के साथ आया है। महाभारत द्रोण पर्व में खश जाति का उल्लेख आया है कि उन्होंने कुरु क्षेत्र के युद्ध में अयोद्दस्ता तथा शूलहस्ता खश गणों ने सात्यकि पर अश्म वर्षा की थी। ततः पुनर्व्यात्तमुखस्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः ॥ उद्योग पर्व = १६० : १०३ अयोद्दस्ता शूलहस्ता दरदास्तङ्गणा खशाः ॥ द्रोणपर्व १२१ : ४२ खाशीर जनपद का उल्लेख भीष्म पर्व में पूर्वोत्तर भारत के एक जनपद के लिए किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में खश जाति स्थान मगध तथा लौहित्य के साथ पूर्व दिशा में रखी गयी है। परन्तु यह कश्मीर साहित्य में वर्णित जाति खस नहीं है। आसाम के खासी पर्वत में रहने वाली खासी जाति हो सकती है। खश एवं खस दोनों एक ही जाति के वाचक है। भागवत पुराण (२:४:१८) के अनुसार खस जाति पतित हो गयी थी। भगवत भक्ति के कारण शुद्ध हो गयी। ब्रह्माण्ड पुराण (२:३६:१४५ तथा ३:६६:१२०) के अनुसार विन्ध्य पर्वत में निवास करने वाली खस एक निम्न कोटि की क्षत्री जाति थी। उसे निषाद भी कहते थे। हरिवंश पुराण के अनुसार सगर ने उन्हें जीता था। उन्हें निम्न श्रेणी में रख दिया। वे म्लेच्छ माने गये । हरिवंश पुराण ( १४:७८४ ) ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराण ने उन्हें पूर्व का एक जनपद माना है। जिसमें होकर चक्षु नदी बहती है। ब्रह्माण्ड पुराण तथा मत्स्य पुराण (१२०:४३, १४४:५७ ) वायु पुराण में खश पर्वतीय खश जनपद कहा गया है। यहां खश के स्थान पर खस शब्द का प्रयोग किया गया है। वायु पुराण ( ४५:१३५ तथा ४७:४७ ) में दरद जाति को खस जाति का पड़ोसी माना गया है। बंगाल के पाल राजाओं के शिलालेख में हूण तथा खस जाति का उल्लेख मिलता है। निष्कर्ष निकाला जा सकता है। खस लोग बंगाल तक आते जाते थे। पूर्वोय भारत का उनको ज्ञान था। वहां वे किसी न किसी रूप में आबाद थे। हरिवंश पुराण ( १३:२३-३४) में उल्लेख आता है कि रघुवंशी राजा बाहू और उसके राज्य को हैहय तथा तालजंघ वंशीय राजाओं ने शक, यवन, कम्बोज, पारद तथा पह्लव की सहायता से नष्ट कर (१४:४) दिया था। यवन, पारद, काम्बोज, पह्लव तथा खस पांचगणो ने हैहय राजाओं के विजय निमित्त पराक्रम किया था। यहाँ स्पष्ट उल्लेख मिलता है। खसों की राज्य-व्यवस्था गणतन्त्रीय थी। खसो ने बाहू राजा तथा उसके राज्य को नष्ट करने में सम्भवतः प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया था क्योकि श्लोक ( १३:३० ) में खस का उल्लेख नही आता । हैहय तथा तालजंघ राजा के साथ शकों का उल्लेख है। उसने बाहू के राज्य को छीन लिया था। केवल यह उल्लेख आता है ( १४:४) कि पाँच गणराज्य जिनमें खस भी एक गण राज्य था, हैहयों के लिए पराक्रम किया था। खस लोग शकों की तरह बाहू के राज्य को लेते हुए दिखाई नहीं देते। एक मत है कि 'केदारे खसमण्डले' की उक्ति के अनुसार केदार खण्ड खस मण्डल का पर्याय है। यह मत उचित नहीं मालूम होता। केदार खण्ड में ही नहीं हिमालय के दक्षिणवर्ती पर्वतमाला में खश जाति फैली थी । अतएव खस जाति केदार खण्ड में भी आबाद थी । परन्तु इसके कारण खसमण्डल का पर्याय केदार खण्ड मान लिया जाय यह युक्ति पूर्ण दलील नहीं मालूम होती ।