भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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१३० राजतरंगिणी खसों की वीरता की प्रशंसा के लिए दुर्योधन ने शकुनीपुत्र उलूक को अपना दूत बना कर पाण्डवों के के पास भेजा था । और खसों के सम्बन्ध में निम्नलिखित बात कहने का आदेश दिया था । किं दर्दुरः कूपशयो यथैमां, न बुध्यसे राजचमूं समेताम् । दुराधर्षं देवचयप्रकाशां, गुप्तां नरेन्द्रैस्त्रिदशैरिव द्याम् ॥ १०२ ॥ प्राच्यैः प्रतीच्यैश्च दाक्षिणात्यै- रुदीच्यकाम्बोजशकैः खशैश्च ॥ १०३ ॥ महाभारतः उद्योग पर्वः १६०:१०२-१०३ शैलदा नदी पश्चिमी पर्वत के वरुण पर्वत से निकलती है और पश्चिम सागर में गिरती है । ( मत्स्य पुराण : १२० : ३३ ) । मनु ने उन्हें क्षत्री माना है । ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा न होने के कारण वे पतित हो गये थे । ( मनुस्मृति १० : ४३ : ४ ) मनु ने स्पष्ट कहा है कि खश जाति क्षत्रिय थी । परन्तु क्रिया भ्रष्ट एवं ब्राह्मणों का दर्शन न पाने के कारण धीरे-धीरे स्थान च्युत हो गयी । निस्सन्देह खश जाति के क्षत्री होने में सन्देह नहीं किया जा सकता । शनकैस्तु क्रियालोपाद् क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ मनुस्मृति १० : ४३ × × × पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः कम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाः चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ मनुस्मृति १० : ४४ उन्हें काशगर से कुछ विद्वान् सम्बन्धित करते हैं । खशगिरि का अपभ्रंश काशगर कहा जाता है । मार्कण्डेय पुराण ( १४६ : ३५० ) में उन्हें शाल्व, शक और शूरसेन आदि जातियो के साथ रखा गया है । सेन तथा पाल वंश के शिलालेखों में इनका उल्लेख आता है । बृहद् संहिता खशों का कुलूत ( कुलू निवासी ) तंगणा, तथा काश्मीरा के साथ धर्मीकरण करती है ( १० : १२ ) । ऋग्वेद संहिता ( १ : ३१७ ) में खश जाति का उल्लेख मिलता है । ऋग्वेदकाल में गिलगित से करलो नदी तथा कालान्तर में नेपाल की पूर्वी सीमा तक खश जाति फैल गयी थी । खशा प्राचीनतम दक्ष प्रजापति तथा असिक्नी की कन्या थी । कश्यप प्रजापति को दी गयी थी । उससे यक्ष राक्षसादि हुए । मार्कण्डेय पुराण में 'कुरवो गुर्गणाः खशाः', 'वायु पुराण में 'क्षुपणास्तङ्गणाः खशाः', 'कुणपास्तंगणाः खशाः', 'शुथ्नास्तङ्गनाः खशाः' 'ध्रुवणास्तङ्गणाः रासाः' । ब्रह्माण्ड पुराण में 'कुपथास्तङ्गणाः खशाः', मत्स्य पुराण में 'कुपथा अप्यास्तथा', वामन पुराण में 'कुपथास्तङ्गणा खशाः', उल्लेख आता है । कुपथ किंवा अपथ : हिमालय में कोई स्थान था । खश देश का उल्लेख द्रोण पर्व में किया गया है । मत्स्य पुराण में बर्बर तथा