भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 936

परिशिष्ट 'न' खस (तरंग : १ : ३१७ : पृष्ठ ३२० ) आजकल की खश जाति ही यहदृण वर्णित खश जाति है। खश का अपभ्रंश खस जाति- वाचक शब्द है। यह जाति पीर पंचाल पर्वतमाला के दक्षिण और पश्चिम रहती थी। ये सीमित क्षेत्र में रहते हैं। पीरपञ्चाल उपत्यका के दक्षिण-पश्चिम में वितस्ता की मध्य धारा और किश्तवार पूर्व के पर्वत के एक भाग में ये अपने को मुस्लिम राजपूत कहते हैं। हिन्दू खश जाति हिमालय के अन्य क्षेत्रों में रहती है। कुमायूँ की पहाड़ियों में बहुत लोग अपने को खश कहते हैं। राजपूत होने का दावा करते हैं। राजपुरी का खश सरदार राजपूतों में विवाह-शादी करता था। लोहर के खश सरदार सिंहराज ने काबुल के शाही राजाओं से विवाह सम्बन्ध स्थापित किया था ( रा० त० ६:१७५, १७७ ) । सिंहराज की कन्या दिद्दा रानी थी। उसने काश्मीर पर राज्य किया था। मनु ने ( १० : २२ ) में खशों को दूसरा नामकरण दिया है। उन्हें मनुस्मृति में ( १०.४ -४४ ) क्षत्रिय माना है। खश तथा खस दोनों पाठ मिलता है। नीलमत पुराण खश जाति का उल्लेख निम्न स्थानों पर करता है। गन्धर्व्या वाजिनः पुत्रा भद्राश्च सुरभेः सुताः । यक्षांश्च राक्षसांश्चैव खशायास्तनयाः स्मृताः ॥ 48 = ७२ × × × कद्रूः क्रोधा इरा श्वाषा विनता सुरभिः खशा । मुग्धाश्चैव तथा पूज्याः सुप्रभा च तथा जरा ॥ 583 = ७०३-७०४ × × × दार्वाभिसारगान्धारजुहुण्डरशकान् खशान् । तंगणान् पाण्डवान् मद्राञ्छन्तर्गिरिबहिर्गिरीन् ॥ 80 = १२२ × × × दार्वाभिसारगांधारजालन्धरशकाः खसाः । तंगणा भाण्डवाश्चैव आन्तर्गिरियहिर्गिरिः ॥ 139 = १८२ नीलमत में 'खशा' तथा 'खस' एक ही शब्द एवं अर्थवानक है। कल्हण ने खशों का प्रचुर वर्णन किया है। इस समय उन्हें खवशा कहते हैं। खखश मुसलमान भी हैं। वे राजपूत मुसलमान भी कहे जाते हैं। नीलमत में वर्णन किया गया है कि ब्रह्मा से वर मिलने पर जलोद्भव असुर दार्वाभिसार, गान्धार, जुहुण्डर, शक तथा खसों का नाश करने लगा। यह सब कश्मीर के सीमावर्ती जातियां एवं क्षेत्र हैं। एक मत है कि 'कस' शब्द से कश्मीर शब्द बना है यह ठीक नहीं है। 'कस' शब्द खश जाति के लिये व्यवहृत