राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ राजतरंगिणी किया गया है । खश तथा कश्मीर जाति जिसे 'कश्मीराह' कहा गया है सर्वथा भिन्न है । नीलमत गश जाति का अलग तथा स्वतन्त्र रूप से उल्लेख करता है ( नी० ४० ) राजतरंगिणी में अनेक स्थानों पर राजौरी अर्थात् राजपुरी के शासक रूप में गशो को वर्णन किया गया है । उन्हें राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। उसकी सेना खशा कही जाती थी । ( रा० त० ७:६७६, १२७१, १२७६, ८:८८७, १४६६ १८६८, १८६५ ) । राजपुरी के पूर्व अंचल के आम्स नदी की ऊर्ध्व उपत्यका मिलती है। इस नदी को आजकल पंजगब्बर कहते हैं। श्रीवर ने इसका उल्लेख (४.२१३) किया है । उसने इस नदी को पंचगह्वर लिखा है। उसे खशो का निवास-स्थान भी माना है। उमगे पूर्व के अंचल को वाजशाल कहते थे । यह वही आजकल का बनिहाल है। इसी के नीचे बनिहाल पास है । यहीं पर भिक्षाचर ने खश राजा भागिक के दुर्ग में शरण ली थी ( रा० त० ८.१६६५) । राजतरंगिणी ( ८.१७७ तथा १०७४ ) के वर्णन से प्रतीत होता है । वह उपत्यका जो बनिहाल और चन्द्रभागा नदी के मध्य है, उसे इस समय 'विचलारी' कहते हैं। पुरावृत्तकारो ने उसे विश्रालटा कहा है। यह क्षेत्र गशों से आबाद था । खशालय का भी वर्णन कल्हण ने ( रा० त० ४:५६, ५८, २८४, २६०, २६६ ) किया है । यहा खश जाति रहती थी । खशालय ही खेशल उपत्यका है। इसे कंदोर भी कहते हैं। वह दक्षिण-पूर्व में मारवल पास से कश्मीर के एक कोने से होतो किश्तवार तक चली जाती है। खशालय का पुराना नाम खशाली ( रा० त० ७:३०६ तथा थीवर ४:४५६ ) प्रतीत होता है । राजपुरी से पश्चिम घूमने पर पर्णोत्स अथवा राजतरंगिणी ( ६:३१२ ) में वर्णित प्रान्त है । उसमें एक व्यक्ति तुंग खश था । वह चरवाहा था । रानी दिद्दा के समय अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्री बन गया था । ( रा० त० ७:७७३ ) तुंग के वंशज रानी दिद्दा के पश्चात् कश्मीर के राजा हुए थे । उन्हें निम्न खश समझा जाता था । आधुनिक खख्ख जाति और खश एक ही है । कश्मीर में वितस्ता उपत्यका के अधोभागीय सरदार प्रायः इसी जाति के थे । खख्ख शब्द खश का अपभ्रंश है । वितस्ता उपत्यका के खखा सरदार कश्मीर में सिख राज के पूर्व अर्ध स्वतंत्र हैसियत रखते थे । अपने पडोसी बोम्व कबीले के साथ वे कश्मीर के लिए समस्या हो गये थे । उनका भयंकर क्रूर कर्म जो शेख इमा- मुद्दीन के समय ( १८४६ ) मे उन्होने किया था अभी तक लोगों को याद है । खश लोगो ने मध्ययुग में लूटपाट में प्रसिद्धि प्राप्त की थी । ( रा० त० ४.३२६ और ८:१८४५, २३८९ ) से यह बात सिद्ध होती है । श्रीवर ने जैनराज तरंगिणी ४:४४३, ४५२, ४६४, ५६६, ६३३, ६४. में इसी बात की कुपुष्टि की है। कश्मीर की मर्डुमशमारी १८६१ के रिपोर्ट पृष्ठ १४१ पर खखो की आबादी ४१४६ लिखी है । उनकी जाति मुस्लिम पर्वतीय राजपूतो की एक उपजाति मानी गयी है । पृष्ठ २०१ । खश जाति को मार्कण्डेय पुराण में पर्वताश्रयी जाति कहा गया है । यह जाति पर्वत में रहती थी । अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये । नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवो गुर्मणाः खशाः ॥ x x v