राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट 'घ' १२५ प्रकृति के साथ दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष करते रहने के कारण उनका स्वभाव लड़ाकू हो जाता था । अच्छे सैनिक समझे जाते थे । परस्पर संघर्ष करते रहते है। गोत्रीय प्रवृत्ति विदेशी तथा अन्य जातियो के आक्रमण तथा उनके भय के कारण जागृत रहती थी । इस प्रकार वे अपनी स्थिति और व्यक्तित्व रखने में सफल रहे । पुराकाल में यातायात तथा परिवहन सुगम नही था । कम सम्पर्क होने के कारण उत्तर-पश्चिम की जातियों के विषय में समय-समय पर विभिन्न धारणाएँ बनती और बिगड़ती रही है । उनकी भौगोलिक स्थिति के विषय में भी परस्पर विरोधी उल्लेख मिलते है । परन्तु एक बात में सभी एक मत है । वे पर्वतीय जाति थे । उनका निवास भारत के उत्तर-पश्चिम सीमान्त पर था । दरदों के प्रदेश, सीमा तथा क्षेत्र के सम्बन्ध में यदि कही अन्तर अथवा भिन्नता पुराकालीन ग्रन्थों में दिखाई पड़ती है तो उसका एकमात्र कारण ग्रन्थों का रचना-काल तथा तत्कालीन परिस्थितियों में इन पर्वतीय जातियों के विभिन्न राजनीतिक, भौगोलिक स्थिति दी थी । उत्साही, कर्मठ तथा वीर राजाओ अथवा नेताओ के काल में राज्य का विस्तार होता था । गौरव तथा महत्त्व बढ़ता था । उसके अभाव में राज्य की सीमा संकुचित होती थी । प्रदेश पतनोन्मुख होता था । अतएव दरदों की राज्य-सीमा के विषय में विभिन्न उल्लेख मिलते हैं। एक बात में सब एक मत हैं। वे कश्मीर के उत्तर पश्चिम सिन्धु घाटी में निवास करते थे । उनके राज्य की सीमा उन्नति काल में वर्तमान लेक साल्ट तक पहुँच जाती थी । अतएव उनके उत्तर-पूर्व में रहने का भी उल्लेख मिलता है । यह बात सर्वत्र मानी गयी है । इस समय जहां ददिस्तान अर्थात् कश्मीर का उत्तरीय पूर्वीय पर्वतीय भूभाग जो सिन्धु घाटी को छेंके हैं, वही उनका स्थान था । महाभारत तथा पुराणो में स्पष्ट उल्लेख मिलता है । वे भगवान् श्री कृष्ण के विरुद्ध जरासन्ध का पक्ष ले करके युद्ध करते थे । मथुरा नगर के घेरे में सम्मिलित हुए थे । बलराम ने युद्ध में दरदराज को मारा था । कौरव की ओर से खस, शक, यवन, त्रिगर्त तथा मालव के साथ महाभारत युद्ध में दरद भाग लिये थे । ( द्रोण पर्व १०:१८ ) मत्स्य पुराण में उल्लेख आता है । उनका देश गान्धार, शिवपुर, उसमा आदि औरस लोगों की तरह सिन्धु उपत्यका का एक भाग था ( २:१८४ ) । विष्णु पुराण उन्हें आभीर तथा कश्मीर से सम्बन्धित करता है ( १११:४५-५१ ) वे दरद किंवा दर्दुर पर्वत माला में रहते थे । अतएव उनका नाम दरद पड़ा । उनके इस अंचल में रहने के कारण पर्वतमालाओं का नाम दरद पर्वत पड़ सकता है । पाश्चात्य लेखक श्री स्टावों उन्हें दरदाई नाम से अभिहित करता है । श्री प्लेनी ने उन्हें दरदेई भी कहा है । श्री फिरोज उन्हें दरदाई नाम से सम्बोधित करता है। वह लम्पक ( लगमान ) तथा सेनि- स्टेन ( स्वात ) उपत्यका तथा सिन्धु उपत्यका के अधो भाग में उनका स्थान बताते है । वह कहता है । दरद देश की पर्वतमालाएँ विचित्र रूप से ऊँची है । यह पर्वत वर्तमान जिला दरदो है । पाक-कश्मीर युद्ध की विराम रेखा के कारण अधिकांश भाग पाकिस्तान के अनधिकृत अधिकार में है । राजतरंगिणी में दरदों का प्रायः उल्लेख किया गया है । उन्होंने कश्मीर के जीवन को प्रभावित किया था । दरद शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त किया गया है। महाभारत आदिपर्व में बाल्हीक देश के एक राजा का वर्णन है । वह सूर्य नामक असुर के अंश से उत्पन्न हुआ था । ( आदि पर्व ६७:५८ ) इनके कारण पृथ्वी भार से दब-सी गयी । ( सभा पर्व ४४:८ ) दरद की संज्ञा महाभारत में एक देश से भी दी गयी है । उत्तर दिग्विजय काल में अर्जुन ने इसे जीता था । ( सभा पर्व २७:२७ )