भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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१२४ राजतरंगिणी दरद राज ने जरासन्ध के पक्ष में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी : एष्यत्के तु नृपतिर्दरदो नाम वीर्यवान् । रामं हलाग्रोप्रभुजं प्रत्ययात् सैन्यमध्यगम् ॥ ५५ ॥ × × × तद् युद्धमभवत् ताभ्यां रामस्य दरदस्य च । युधे लोकवरिष्ठाभ्यां कुशलाभ्यामिनौजसा ॥ ५७ ॥ योजयित्वा ततः स्कन्धे रामो दरदमाहवे । हलेन बलिनां श्रेष्ठो मुसलेनावपोधयत् ॥ ५८ ॥ स्वकायगतमूर्द्धा वै मुसलेनावपोधितः । पपात दरदो भूमौ दारिताब्धं इवाचलः ॥ ५९ ॥ रामेण निहते तस्मिन् दरदे राजसत्तमे । जरासंधस्य राज्ञस्तु रामेणासीत् समागमः ॥ ६० ॥ स्कन्द पुराण के देशो की तालिका मे दरद का स्थान १० वा तथा ग्राम-संख्या ३ लाख ५० हजार दी गयी है । महाभारत सभा पर्व ( ४४ : ८ ) में उल्लेख मिलता है । अर्जुन ने उत्तर दिशा दिग्विजय काल में दरद देश पर विजय प्राप्त किया था । इसी ( ५२ : १३ ) में उल्लेख है । वनवास काल में सुबाहु की राज- धानी जाते समय पाण्डव लोग दरद देश द्वारा गमन किये थे । हिमालय पर्वतीय जातिया तथा प्रदेश भारतीय राजनीति तथा युद्धों में भाग लेती रही है । इस अंचल के लोग वीर माने जाते रहे हैं । महाभारत उद्योग पर्व ( ४ : १५ ) में उल्लेख मिलता है कि पाण्डवो ने अपने पक्ष से युद्ध करने के लिए दरद लोगों को आमन्त्रित किया था । इस देश की जो भौगोलिक स्थिति महाभारत में दी गयी है वह आज भी मिलती है । इसे पूर्वोत्तर दिशा का देश माना है । कश्मीर के पूर्वोत्तर इनका क्षेत्र इस समय कम विस्तृत है । परन्तु महाभारत काल में प्रतीत होता है कि इसका विस्तार आज की अपेक्षा पूर्व दिशा की ओर अधिक था । ( भीष्म पर्व ९ : ६७ ) । दरद देश के योद्धा दुर्योधन की सेना में थे । उनकी ओर से युद्ध में भाग लिया था ( भीष्म पर्व ५१ : १६ ) । कथा है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने इस देश को जीता था ( द्रोण पर्व ७० : ११ ) । श्रीकृष्ण के विरुद्ध दरद लोगों ने जरासन्ध के पक्ष से युद्ध किया था । वहाँ का राजा उस युद्ध में मारा गया था । दरद देश के लोगों ने सात्यकि पर आक्रमण किया था । सात्यकि ने इन लोगो का संहार किया था । अनुशासन पर्व में इनके जाति के विषय में कहा गया है कि यह लोग क्षत्रिय थे परन्तु ब्राह्मणो के प्रति ईर्ष्या एवं द्वेष रखने के कारण शूद्र हो गये थे । दरद लोग उत्तरीय पश्चिमी भारत के अंचल में रहते थे । उत्तर-पश्चिमीय भारतीय क्षेत्र द्वारा विदेशी लोग भारत में आते थे । विदेशी लोग भारतीय आर्य परम्परा से भिन्न होते थे । विदेशियो के संसर्ग के कारण उत्तर-पश्चिम सीमान्त स्थित हिन्दुओं की परम्परा पर प्रभाव पड़ता था । वह प्रभाव उनके जीवन तथा आचरण को प्रभावित करता था । शीतल जलवायु तथा परिश्रमी जीवन के कारण शरीर गठन पुष्ट एवं स्वस्थ होता था । ये सुन्दर होते थे ।