राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट त ११५ तक स्थित थी । तत्पश्चात् वह चोलों तथा पाण्ड्यों के अधिकार सीमा में चला गया । पन्द्रहवीं शताब्दी में विजय नगर साम्राज्य के अन्तर्गत कर्णाटक का भूखण्ड आ गया था । विजय नगर साम्राज्य के शक्तिहीन होने पर सत्तरहवीं शताब्दी में यह प्रदेश तीन छोटे हिन्दू राज्यो में विभक्त हो गया था । उनको राजधानी क्रम से मदुरा, तंजोर तथा कांची थी । आरंगजेब की सेना ने सत्तरहवी शताब्दी के अन्त में इस प्रदेश पर आक्रमण किया था । जुलफिकार अली कर्णाटक का नवाब बनाया गया । तत्पश्चात् यह प्रदेश मुसलमानों, मराठों, फ्रांसीसियों तथा अंग्रेजों के संघर्ष का क्षेत्र बन गया । कर्णाटक का ज्ञान काश्मीरी लेखकों को था । प्राचीनकाल में कर्णाटक एवं कश्मीर में विचारों का आदान-प्रदान होता रहा है । कश्मीर निवासी ब्राह्मण कर्णाटक में आकर निवास करते थे । इसी प्रकार कर्णाट देशीय ब्राह्मण कश्मीर में पहुँचते थे । दोनों का एक दूसरे स्थान पर सम्मान तथा आदर होता रहा । कल्हण ने राज तरंगिणी में कर्णाटक का उल्लेख ( १ : ३००; ४ : १४१, १५२; ७ : ६७५, ९३५, ९३६, १११९, ११२४ में किया है। सर्वप्रथम कल्हण ने मिहिरकुल के प्रसंग में कर्णाटक का उल्लेख किया है। उसने श्री लंका आक्रमण से लौटते समय चोल, कर्णाट एवं लाट के राजाओं को व्यदारित किया था । ( त० १ : ३०० ) । 'कल्हण कर्णाट निवासियों के वेश भूषा तथा केश रखने की प्रथा का उल्लेख राजा ललितादित्य के दक्षिण विजय के सन्दर्भ ( ४ : १५१ ) में करता है । इसी प्रसंग में वह कर्णाटक की रानी देवी रट्टा का भी उल्लेख करता है। उस समय रट्टा नाम्नी चंचललोचना कर्णाट कामिनी विशाल दक्षिणापथ पर राज्य करती थी । असीमित प्रभावशालिनी इस देवी ने दुर्गा के समान विन्ध्याद्रि मार्ग को पर्याप्त किया विस्तृत एवं निष्कंटक बना दिया था। वह प्रणाम करते समय ललितादित्य के पाद कमल के नख दर्पण मण्डल में अपनी मूति देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई । उसके ताल वृक्षतले नारिकेल के रसोर्मि पान कर कावेरी तटवर्ती समीर से श्रान्ति दूर कर दिया । उस मलयाचल पर उसके आक्रमण भय से सरकते हुए सर्पों के व्याज भय से चन्दन वृक्ष के बाहु मण्डल से निपतित असि तुल्य लग रहे थे । वह उत्तरण प्रस्तर तुल्य द्वीप पुंजों पर निर्विघ्न चरण पाद रखकर कुल्या सदृश समुद्र का शीघ्र ही अनायास गतागत करने लगा । विजेताग्रणी सागर तरंग के निर्घोषों से जयमंगल गान श्रवण कर वहाँ से पश्चिम दिशा प्रस्थान किया ।' ( रा. त० : १५२-१५८ ) कश्मीर राजा कलश ( सन् १०६३-१०८१ ) के सन्दर्भ में कल्हण पुनः कर्णाट का उल्लेख कलश तथा हर्ष के संघर्ष के सन्दर्भ में करता है। कर्णाटक निवासी केशी उस संघर्ष में युद्ध करता राजविरोधी सैनिको द्वारा कश्मीर में मारा गया था । ( रा० ७ : ६७५ ) इस उद्धरण से यह प्रकट होता है कि कश्मीर की सेना में अथवा राजा के प्रश्रय में कर्णाटक निवासी थे । उनका वहाँ उचित स्थान तथा सम्मान था । कवि विल्हण के प्रसंग में पुनः कल्हण कर्णाटक का उल्लेख करता है। कश्मीरी राजा हर्ष ( सन् १०८९-११०१ ई० ) के समय में विल्हण कर्णाटक चला आया था । कल्हण कहता है—विल्हण कवि राजा कलश के शासन काल में कश्मीर देश त्याग कर कर्णाटक देश के राजा परमाडि के पास चला गया था । राजा परमाडि ने कवि विल्हण को अपनी राज सभा में विद्यापति पदपर नियुक्त किया था । विल्हण हाथी पर आरूढ़ होकर कर्णाटक देश के पर्वतीय प्रदेशों में भ्रमण करते समय समस्त कर्णाटक प्रदेश में केवल