राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविल्हण को ही यह पद गौरव प्राप्त था कि वह राजा के सम्मुख छत्र धारण करता था।' (रा० ७ : ८३५-८३७) विल्हण की प्रसिद्ध रचना विक्रमांक देव चरित्र तत्कालीन कर्णाटक के इतिहास तथा वहाँ के सामा- जिक, राजनैतिक तथा आर्थिक स्थिति पर यथेष्ट प्रकाश डालता है। विल्हण, राजा अलूप का उल्लेख इसी सन्दर्भ में करता है। विल्हण कोंकण के राजा जयकेशिन का भी उल्लेख नाटक में करता है। कवि विल्हण ने कुन्तल देश को कर्णाटक देश का समानार्थी माना है। विक्रमादित्य षष्ठ को कुन्तलेश तथा कर्णाटेन्द्र कहा है। राजा हरिहर (सन १३०७ ई०) के एक शिलालेख से पता चलता है कि कुन्तल विषय कर्णाट देश में था। कल्हण ने कर्णाटक का पुनः उल्लेख राजा हर्ष के सन्दर्भ में किया है- 'किसी समय वह राजा (हर्ष) कर्णाटक देश के राजा परमाडि की चन्दला नामक सर्वांग सुन्दरी पत्नी को चित्र में देखकर उस पर मोहित हो गया। धूर्त विटगण विचार शून्य एवं मन्दमति राजाओं को मजाक मजाक में कुत्तों के समान छू-छू करके प्रोत्साहित एवं संघर्ष के लिये उत्तेजित कर देते हैं। उस निर्लज्ज राजा ने विटों के प्रोत्साहन से उत्तेजित होकर अपनी राजसभा में कर्णाटक सुन्दरी चन्दला की प्राप्ति हेतु परमाडि को पराजित करने की प्रतिज्ञा की। चन्दला न प्राप्ति काल तक कच्चे कपूर का सेवन न करने की प्रतिज्ञा की।*****कर्णाटक देश के राजा परमाडि का वध कर चन्दला की प्राप्ति द्वारा उसके आलिंगन का सुख भोग करना, कल्याणपुर में प्रविष्ट होकर विष्णला देवी का दर्शन करना, और उस राजा के उपवन में एकत्रित कर गुप्त रूप से रखी गयी अपरिमित सम्पत्ति को अपने आधीन करना इन सब कार्यों के पूर्ण होने तक परम प्रतापशाली महाराज हर्ष- देव ने धोतास कपूर चर्वण त्याग दिया।' (रा० त० ७: १११९-११२४ तथा ११२५-११३३) कल्हण काश्मीर राजा हर्ष के कर्णाटक के समान ही मुद्रा टंकणित कर चलाने का उल्लेख करता है-'राजा हर्ष को दाक्षिणात्यों की पद्धति अधिक रुचिकर थी अतएव उसने कर्णाटक शैली पर मुद्रा टंकणित करवायी। (रा० त० ७: ६२६) यदि कर्णाटक के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डाली जाय तो कश्मीर का सम्बन्ध अति निकट का प्रकट होता है। केवल कश्मीर में ही कर्णाटकवासियों का आदर नहीं होता था। कर्णाटक के राजाओं ने भी कश्मीर के ब्राह्मणों का सम्मान, तथा दान द्वारा आदर प्रदर्शन किया था। पाण्ड्य महादेवी ने बारहवीं शताब्दी में कश्मीर के प्रवरपुर (श्रीनगर) निवासी शारदा देवी के उपासकों को भूमि दान की थी। (एनसिएण्ट कोंकन भास्कर, आनन्द सलतोरे : पृष्ठ १६१) पन्द्रहवीं शताब्दी में कर्णाटक विजयनगरम् राज्य के अन्तर्गत आ गया। विजय नगर राज्य विस्तार के साथ कर्णाटक प्रदेश की सीमा दक्षिण में विस्तृत हो गयी थी। तल्ली कोट के युद्ध (सन् १६६५ ई०) के पश्चात् विजयनगर के राजा चन्द्रगिरी अर्थात् चित्तूर जिला तत्पश्चात् बेल्लोर जिला उत्तरीय अरकाट तक चले आये थे। उनकी राज्य सीमा सीमित हो गयी थी। लघु राज्य होने पर भी उन्हें कर्णाटक का राय कहा जाता था।