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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 903, कुल 984 में से

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पृष्ठ 903

९६ राजतरंगिणी ततः पूजा निकुम्भस्य कर्तव्या पूजारेण तु । आदित्यपुत्रो रेवन्तः साश्वैः पूज्यश्च मानवैः ॥ ३४२ = ४८९ x x x x तस्मिन्नहनि पूर्णार्द्धे निकुम्भस्यानुयायिनः । आविशन्ति नरान् सर्वान् पिशाचा घोरदर्शनाः ॥ ३१२ = ४९९-५०० x x x x तस्यां विप्र चतुर्दश्यां निकुम्भः शंकरं सदा । संपूजयति धर्मात्मा सानुयात्रो महाबलः ॥ 553 = ९०५-१०६ x x x x पूजनीयो निकुम्भस्तु पिशाचाधिपतिर्बली । पिशाचानां च दातव्या बलयश्च सुसंस्कृताः ॥ 355 = ६०७-१०८ x x x x चैत्रमासि सिते पक्षे पञ्चदश्यां द्विजोत्तम । योद्धुं याति निकुम्भस्तु पिशाचान्वालुकार्णवे ॥ 659 = ७८१ x x x x पिशाचं मृण्मयं कृत्वा काक्षं च द्विजसत्तमः गन्धैर्माल्यैस्तथा वस्त्रैरलङ्कारैश्च पूजयेत् ॥ भक्ष्यैश्च लोपिकापूपैर्मांसैः पानैस्तथैव च ॥ 66 = ७८३-७८४ x x x x निकुम्भे निर्गते ह्यद्य तथा चैवाप्यनागते । षण्मासमध्ये कर्तव्या यात्रा देवगृहे नृपैः ॥ 810 = १०१२-१०१३ x x x x अक्षोटनागपटकश्च श्येनो वह्लिकाध्वरी । क्षीरकुम्भो निकुम्भश्च विकुम्भः समरप्रियः ॥ 953 = ११०१-११०२ वर्णन आता है कि ये ६ मास हिमालय तथा ६ मास शाद्वल अर्थात् हरित भूमि में रहते थे । पिशाच का दैत्यों से सहयोग था । वे ६ योजन लम्बे बालुकार्णव के ओसिस में रहते थे । वर्णन किया गया है कि कुबेर ने पिशाचराज निकुम्भ को उक्त पिशाचों को नियन्त्रण में रखने के लिये आदेश दिया । निकुम्भ अपने पाँच कोटि पिशाचों के साथ उनसे युद्ध करता था । शेष समय वह हिमालय पर निवास करता था । कश्यप के शाप के कारण पिशाच ६ मास तक कश्मीर उपत्यका में निवास करते थे । चारों युगों के बीत जाने के पश्चात् वे कश्मीर उपत्यका से उत्पाटित हो गये और यहां नाग तथा मानव निवास करने लगे । हिमाचले तु षण्मासान् स सदा वसते सुखी । नी० ११० = २८३ नानादेशसमुत्थैस्तु ततः प्रभृति मानवैः । षण्मासान् वसते देशः षण्मासान् पिशिताशनैः । नी० २२७ = ३०२-३०३ राजतरंगिणी (४ : ७१०) में आश्वयुज का उल्लेख कल्हण ने किया है । पूर्णमासी के दिन करता

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