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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 904

परिशिष्ट ङ ९७ हैं। नीलमत में इस दिन के सम्बन्ध में एक प्रथा मिलती है। इस दिन लोग एक दूसरे पर कीचड़ फेंककर परिहास उत्सव मनाते थे कि पिशाच भय से भाग जाय। क्योंकि पिशाच इस दिन मानव घर में प्रवेश करना चाहता है। यह प्रथा लोग भूल गये हैं। लोप हो गयी है। कल्हण ने अश्वाज गाली प्रथा का उल्लेख (७ : १५५१) में किया है। अलबेरूनी ने एक प्रथा का उल्लेख किया है। इसको 'पुहपो' कहते थे। उस दिन लोग परस्पर परिहास करते थे। पशुओं से खेलते थे। श्री स्टीन ने प्रकट किया है। 'पुहपो' शायद पिशाच का अपभ्रंश बन गया है। ऋग्वेद में पिशाची शब्द का उल्लेख एक बार किया गया है। अथर्व वेद में पिशाच शब्द का उल्लेख प्रेत के अर्थ में किया गया है। उसे मानव शत्रु रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया है। (२:१८:१-५; २:१८:४; ४२०:६-९; ४: ३६ : ४; ४ : ३७ : १०; ५: २९: ४, ५, १४; ६ : ३२: २; ८ : २ : १२; १२ : १ : ५०) अथर्व वेद (१ : २५ : ९) में पिशाचों को मांस भोजी बताया गया है। गोपाद ब्राह्मण ( : १: १ : १०) में पिशाचों के सम्बन्ध में पिशाच वेद तथा आश्वलायन श्रौत सूत्र (१० : ७:६) में पिशाच विद्या का उल्लेख है। उन्हें किमिदिन तथा यातुधान अथर्व वेद में कहा गया है। तैत्तिरीय संहिता में वर्णन मिलता है। पिशाचों का उल्लेख असुरों तथा राक्षसों के साथ किया गया है। काठक संहिता (२७ : २४) में भी इसी प्रकार उल्लेख मिलता है। उन्हें देवों, मनुष्यों तथा पितरों का विरोधी बताया गया है। देवा मनुष्याः पितरस्तेऽन्यत आसन्न सुर । रक्षांसि पिशाचास्तेऽन्यतः । — तैत्तिरीय संहिता काण्ड २ प्रपाठक ४ अनुवाक १ जैमिनी ब्राह्मण में पिशाच को स्पष्ट मानव रूप की संज्ञा दी गयी है। इक्ष्वाकु राजा त्रयारुण की माता पिशाच कन्या थी। पिशाची वा इयं त्र्यारुणस्य जाया। यही बात पंचविंश ब्राह्मण तथा शातायन ब्राह्मण में मिलती है। बृहद्देवता में उन्हें मानव माना गया है। ये आर्यों के साथ विवाह सम्बन्ध करते थे : अविन्दन्त पिशाची तां जाया तस्य च भूपतेः। ५:१० पिशाचीमदहत्त्वां स यत्र चोपविवेश ॥ ५:२२ पुराणों में पिशाच वर्णन मिलता है। उन्हें राक्षस गन्धर्व और नाग जाति के साथ रखा गया है। ब्रह्माण्ड पुराण में उनके रूप तथा चरित्र का वर्णन किया गया है : कपिशायाञ्च कूष्माण्डाज्जज्ञिरे च पुनः पुनः । मिथुनेन पिशाचांश्च वर्णेन कपिशेन तु ॥ कपिशत्वात् पिशाचास्ते सर्वे च पिशिताशना.। युग्मानि षोडशाद्यानि चक्ष्मानस्तदन्यः ॥ (ब्रह्माण्डपुराण : ३ : ७ : ३, ४५) मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराण में नदियों के उल्लेख के। समय एक 'पिशाचिका' नदी का भी उल्लेख आया है। यह नदी कहां थी अभी निश्चय नहीं हो सका है। राक्षस, गन्धर्व, दैत्य एवं १३