राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ राजतरंगिणी पिशाच एक वर्ग के माने जाते थे । उनमें तथा आर्य मानव में मुख्य भेद उनके रहन-सहन तथा व्यवहार में था । पिशाच जाति घुमन्तू जाति थी । उसका कोई निश्चित स्थान नही था । वे पशुओ के खाल पहनते थे । उनके केश लम्बे होते थे । वे खानाबदोश पर्वतीय जाति थे । उनके आचरण के विषय में ब्रह्माण्ड पुराण में उल्लेख मिलता है । हीना देवैस्त्रिभिः पादैर्गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः । गन्धर्वैस्त्र्यस्त्रिभिः पादैर्हीना गुह्यकराक्षसाः । ऐश्वर्यहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः । एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ।। ( ३ : ७ : १६७-१६८ ) पिशाचों ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था । पिशाचा दरदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह । मद्रका लडकाश्चैव सगणाः परतंगणाः । बाह्लिकाश्चिनिराश्चैव चोलाः पाण्ड्याश्च भारत । एते जनपदा राजन् दक्षिणं पक्षमाश्रिता ।। ६ : ५६ : ४९-५० । राजा दुर्योधन के पक्ष में पिशाच थे । त्रीणि सादिसहस्राणि दुर्योधनपुरोगमाः । शकाः काम्बोजबाह्लीका यवनाः पारदास्तथा । कुणिन्दास्तंगणाश्चैवाः पैशाचाश्च समन्दराः । अभ्यद्रवन्त शैनेयं शलभाः पावकं यथा । युक्ताश्च पर्वतीयानां रथाः पाषाणयोधिनाम् । शूरा पञ्चशते राज्ञा शैनेयं समुपाद्रवन् ।। ८ : ९० : १३ : १५ । द्वितीये दिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवो युधि । आसुरानकरोद् व्यूहान् पैशाचानथ राक्षसान् ।। ६ : १०४-११८ । प्रश्न उत्पन्न होता है । पिशाचों का जन्म स्थान तथा उनका प्रदेश कहाँ था । उनके निवास स्थान और जन्म भूमि के विषय में यथेष्ट प्रमाण प्राप्त हैं । उनसे उनके देश किंवा प्रदेश का निश्चित रूप प्रकट हो जाता है । वायु पुराण पिशाचों का स्थान मेरु पर्वत के दक्षिण दिशाचक्र निश्चित करता है : उनका सम्बन्ध कुबेर से स्थापित किया गया है । तामेरू, फारमोरक औरमिक के साथ पिशाचों का उल्लेख इसे प्रमाणित करता है कि ये इन्हीं क्षेत्रों के समीप के रहने वाले थे । एष शृंगो महा... गन्धर्वैर्पिशाचकाः । यक्षशैलोऽथ वै... । इत्येते देवचरिता... । दिक्पाला दक्षिणे .. ।। वायु पुराण ।